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जनवरी, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भुवनेश्वर और कोणार्क~Bhubaneshwar and Konark

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 भुवनेश्वर और कोणार्क~Bhubaneshwar and Konark भुवनेश्वर: ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर, भारत के सबसे प्राचीन शहरों में से एक है। यह कलिंग साम्राज्य की प्राचीन राजधानी थी और इस अवधि की स्थापत्य विरासत इसका सबसे बड़ा आकर्षण है। भुवनेश्वर नाम संस्कृत नाम त्रिभुवनेश्वर से लिया गया है जिसका तीन लोकों के भगवान, भगवान शिव से है। इस वजह से इस जगह के आसपास के कई मंदिर भगवान शिव के प्रति श्रद्धा रखते हैं। शहर में और उसके आसपास कई पुराने मंदिर हैं जो 8AD-12AD की अवधि में बेहद प्राचीन हैं, इस दौरान शैववाद ने काफी लोकप्रियता हासिल की थी। कई अन्य लोकप्रिय मंदिरों से आच्छादित होने के साथ ही भुवनेश्वर को प्रधानतः भगवान लिंगराज या त्रिभुवनेश्वर, जिन्हें भगवान शिव अवतार माना जाता है, का प्रमुख तीर्थस्थल है। 1956 में ओडिशा की राजधानी को कटक से भुवनेश्वर स्थानांतरित कर दिया गया था। इसका मूल नाम एकाम्र माना जाता है। कई पौराणिक संदर्भों और स्रोतों द्वारा इस क्षेत्र को एकमक्षेत्र और शैव पीठ के रूप में वर्णित किया गया है। इसका प्रमाण इसके ओल्ड टाउन क्षेत्र में और उसके आसपास स्थित कई मंदिरों में मिलता है...

मिट्टी~Clay

मिट्टी~Clay मिट्टी दुनिया का सारा मल, कूड़ा या हर तरह की गन्दगी को अपने अंदर समा लेती है और खुद अपने आप में शुद्ध हो जाती है। ज़मीन के अंदर जो कुछ भी दबा दिया जाता है वह मिट्टी बन जाता है।पृथ्वी के ऊपरी सतह पर मोटे, मध्यम और बारीक कार्बनिक तथा अकार्बनिक मिश्रित कणों को 'मृदा' मिट्टी कहते हैं। मृदा की ऊपरी सतह पर से मिट्टी हटाने पर प्राय:जो परत प्राप्त होती है उसे चट्टान [शैल]कहते है। कभी कभी थोड़ी गहराई पर ही चट्टान मिल जाती है।नदियों के किनारे तथा पानी के बहाव से लाई गई मिट्टी जिसको 'कछार मिट्टी'(जलोढ़ मिट्टी) कहते हैं, खोदने पर चट्टान नहीं मिलती। वहाँ नीचे के स्तर में जल का स्रोत मिलता है। सभी मिट्टियों की उत्पत्ति चट्टान से हुई है। जहाँ प्रकृति ने मिट्टी में अधिक हेर-फेर नहीं किया और जलवायु का प्रभाव अधिक नहीं पड़ा, वहाँ यह संभव है कि हम नीचे की चट्टानों से ऊपर की मिट्टी का संबंध क्रमबद्ध रूप से स्थापित कर सकें।खेतों की मिट्टी में चट्टानों के खनिजों के साथ-साथ, पेड़ पौधों के सड़ने से, कार्बनिक पदार्थ भी पाए जाते हैं। मिट्टी चाहे कोई सी भी किस्म की क्यों न हो लेकिन हो...

खजुराहो~Khajuraho

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खजुराहो~Khajuraho खजुराहो भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त में स्थित एक प्रमुख शहर है जो अपने प्राचीन एवं मध्यकालीन मंदिरों के लिये विश्वविख्यात है। यह मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित है। खजुराहो को प्राचीन काल में 'खजूरपुरा' और 'खजूर वाहिका' के नाम से भी जाना जाता था। यहां बहुत बड़ी संख्या में प्राचीन हिन्दू और जैन मंदिर हैं। मंदिरों का शहर खजुराहो पूरे विश्व में मुड़े हुए पत्थरों से निर्मित मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। खजुराहो को इसके अलंकृत मंदिरों की वजह से जाना जाता है जो कि देश के सर्वोत्कृष्ठ मध्यकालीन स्मारक हैं। भारत के अलावा दुनिया भर के आगन्तुक और पर्यटक प्रेम के इस अप्रतिम सौंदर्य के प्रतीक को देखने के लिए निरंतर आते रहते हैं। हिन्दू कला और संस्कृति को शिल्पियों ने इस शहर के पत्थरों पर मध्यकाल में उत्कीर्ण किया था। खजुराहो महोबा से 54 किलोमीटर दक्षिण में, छतरपुर से 45 किलोमीटर पूर्व और सतना से 105 किलोमीटर पश्‍चिम में स्‍थित है। 1838 में एक ब्रिटिश इंजीनियर कैप्टन टी.एस. बर्ट को अपनी यात्रा के दौरान अपने कहारों से इसकी जानकारी मिली। उन्होंने जंगलों में लुप्त ...

बुद्ध की 10 विभिन्न मुद्राएं एवं हस्त संकेत और उनके अर्थ~10 different postures and hand signs of Buddha and their meanings.

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बुद्ध की 10 विभिन्न मुद्राएं एवं हस्त संकेत और उनके अर्थ। 10 different postures and hand signs of Buddha and their meanings.  भारतीय मूर्तिकला देवत्व का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व करती है, जिसका मूल और अंत, धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताओं के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। इसलिए बुद्ध के अनुयायी, बौद्ध ध्यान या अनुष्ठान के दौरान शास्त्र के माध्यम से विशेष विचारों को पैदा करने के लिए बुद्ध की छवि को प्रतीकात्मक संकेत के रूप में इस्तेमाल करते हैं। बुद्ध की 10 विभिन्न मुद्राएं एवं हस्त संकेत और उनके अर्थ: 1. धर्मचक्र मुद्रा इस मुद्रा का सर्वप्रथम प्रदर्शन ज्ञान प्राप्ति के बाद सारनाथ में बुद्ध ने अपने पहले धर्मोपदेश में किया था। इस मुद्रा में दोनों हाथों को सीने के सामने रखा जाता है तथा बायें हाथ का हिस्सा अंदर की ओर जबकि दायें हाथ का हिस्सा बाहर की ओर रखा जाता है। 2. ध्यान मुद्रा इस मुद्रा को “समाधि या योग मुद्रा” भी कहा जाता है और यह अवस्था “बुद्ध शाक्यमुनि”, “ध्यानी बुद्ध अमिताभ” और “चिकित्सक बुद्ध” की विशेषता की ओर इशारा करती है। इस मुद्रा में दोनों हाथों को गोद में रखा जाता है, दाये...

पल्लव कला~Pallava Sculpture

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पल्लव कला~Pallava Sculpture भारत की वास्तु कला में पल्लव कालीन स्थापत्य कला का अत्यन्त महत्त्व है। दक्षिण भारत में तक्षण कला का प्रारम्भ पल्लव कालीन मन्दिर स्थापत्य कला से हुआ था। दक्षिण भारत में पल्लव काल में गुफा मंदिर निर्माण शैली का विकास हुआ था। यह पल्लव शैली के नाम से प्रसिद्ध है तथा द्रविण शैली भी कहलाती है। पुरातत्त्वीय उत्खननों से प्रारम्भिक पल्लवकालीन कला का काल स्पष्ट होता है। पल्लवों ने अपनी कला को विकसित कर विशाल पाषाण मंदिरों का निर्माण किया था। पल्लवों की वास्तुकला पल्लव नरेशों के नाम से प्रसिद्ध है-महेन्द्रवर्मन शैली, मामल्ल शैली, राजसिंह, नन्दिवर्मन तथा अपराजित शैली आदि। पल्लव वंश के नरेश कला प्रेमी थे। उन्होंने 7वीं सदी से 10वीं सदी तक राज किया. उनकी वास्तुकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण कांची तथा महाबलिपुरम में पाए जाते हैं। कुछ उदाहरण तंजौर प्रदेश तथा पुडुकोट्टई में भी मिलते हैं। मंदिर और मूर्तिकला के क्षेत्र में उनकी अपनी एक विशेष देन है। उन्होंने चट्टानों को काटकर और पत्थर ईंट के भी बड़े विशाल तथा सुन्दर मंदिर बनवाये जो आज तक भी विद्यमान हैं और अपनी श्रेष्ठ शैली एवं शिल...

पाल-सेना मूर्तिकला~Pala-Sena Sculpture

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पाल-सेना मूर्तिकला Pala-Sena Sculpture पाल वंश बंगाल का प्रसिद्द और शक्तिशाली वंश था। गोपाल इस वंश का संस्थापक था जिसे जनता ने बंगाल की गद्दी के लिए चुना था। इस प्रकार मध्यकालीन भारत का यह एक लोकतान्त्रिक वंश था जिसे जनता द्वारा चुना गया था। बंगाल में फैली अव्यवस्था और अराजकता की स्थिति को पल वंश के शासकों ने एक विशाल और शक्तिशाली राज्य के रूप में बदल दिया। इस ब्लॉग बंगाल के में पाल वंश के विषय में विस्तार से चर्चा करेंगे। बंगाल क्षेत्र में विकसित वास्तुशिल्प कला को पाल एवं सेन वास्तुशिल्प शैली के नाम से जाना जाता है। 8 वीं से 12 वीं शताब्दी ईसवी के मध्य विकसित इस वास्तुशिल्प कला को पाल एवं सेन शासकों ने संरक्षण प्रदान किया। पाल शासक मुख्य रूप से बौद्ध थे। उन्होंने बौद्ध धर्म की महायान परंपरा को आगे बढ़ाया।  (हीनयान बुद्ध की मूल शिक्षा का अनुसरण करते थे और महायान मंत्रों में विश्वास करते है)  ये शासक बहुत सहिष्णु थे। इन्होंने दोनों धर्मों को संरक्षण प्रदान किया। पाल शासकों ने अपने शासनकाल में बहुत से विहारों, चैत्यों और स्तूपों का निर्माण करवाया। सेन शासक हिन्दु थे। ...

गुप्त मूर्तिकला-हिंदू, बौद्ध और जैन~Gupta Sculpture-Hindu, Buddhist and Jain.

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 गुप्त मूर्तिकला-हिंदू, बौद्ध और जैन Gupta Sculpture-Hindu, Buddhist and Jain भारतीय इतिहास विभिन्न संस्कृतियों का दर्शन दिखाता है एवं मूर्तिकला भारत की विभिन्न एवं विविध संस्कृति को अपने में समाहित किये हुए है। भारतीय मूर्तिकला स्वयं में ही अद्भुत है। मूर्तिपूजा भारत की संस्कृति का एक अभिन्न अंग रहा है, अलग-अलग धर्मों से जुड़े अलग-अलग काल-खण्ड के दौरान हमें मूर्तियों का एक अलग रूप देखने को मिलता है। मूर्तियों की नक्काशी, उनकी बनावट, उनका रंग सब कुछ एक महान संस्कृति को परिलक्षित करता है। एवं भारत की ऐतिहासिक विरासत को दर्शाता है। इसी क्रम में अपने मूर्तिकला विशेषांक के अगले पड़ाव में हम गुप्तकालीन मूर्तिकला की मूर्तिकला एवं उससे जुड़ी संस्कृति का विश्लेषण करने का प्रयास करेंगे।गुप्त काल (319-550 ई.) भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग (गोल्डन पीरियड) कहलाता है। इतिहासकारों ने इसे क्लासिकल युग भी कहा है। इस युग में साहित्य और कला का विकास अप्रतिम विकास हुआ।गुप्त कला का विकास भारत में गुप्त साम्राज्य के शासनकाल में (२०० से ३२५ ईस्वी में) हुआ।इस काल की वास्तुकृतियों में मंदिर निर्माण का ऐतिहा...

कुषाण काल ​​- गांधार और मथुरा मूर्तिकला~Kushan Period – Gandhara and Mathura Sculpture.

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कुषाण काल ​​- गांधार और मथुरा मूर्तिकला Kushan Period – Gandhara and Mathura Sculpture कुषाण प्राचीन भारत के राजवंशों में से एक था। कुछ इतिहासकार इस वंश को चीन से आए युएझ़ी लोगों के मूल का मानते हैं। सम्राट कनिष्क भारत में आकर यहां की बौद्ध संस्कृति का हिस्सा बन गए भारत में सर्वप्रथम भगवान बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण कुषाण काल में ही हुआ इसमें गंधार व मथुरा शिल्पकला का उदय कुषाण काल में ही हुआ ।कनिष्क कुषाण वंश का प्रमुख सम्राट कनिष्क भारतीय इतिहास में अपनी विजय, धार्मिक प्रवृत्ति, साहित्य तथा कला का प्रेमी होने के नाते विशेष स्थान रखता है।कुषाण वंश का प्रथम शासक (कुषाण वंश का संस्थापक) “कुजुल कडफीसेस” को माना जाता है और कुषाण वंश का कार्यकाल 15 ईस्वी से 151 ईस्वी तक माना जाता हैं. वासुदेव II कुषाण वंश का अंतिम शासक था। कुषाण वंश की स्थापना 15 ईस्वी में हुई थी। कुषाण वंश के प्रथम शासक “कुजुल कडफीसेस” ने यवन, काबुल, सिंध, कंधार, पेशावर और शक राजाओं को पराजित करते हुए इस वंश की स्थापना की। कुषाण वंश (kushan vansh) के सबसे प्रतापी और प्रसिद्ध राजा हुए जिनका नाम था कनिष्क।कुछ इतिहासकार इ...