पाल-सेना मूर्तिकला~Pala-Sena Sculpture
पाल-सेना मूर्तिकला
Pala-Sena Sculpture
बंगाल क्षेत्र में विकसित वास्तुशिल्प कला को पाल एवं सेन वास्तुशिल्प शैली के नाम से जाना जाता है। 8 वीं से 12 वीं शताब्दी ईसवी के मध्य विकसित इस वास्तुशिल्प कला को पाल एवं सेन शासकों ने संरक्षण प्रदान किया। पाल शासक मुख्य रूप से बौद्ध थे। उन्होंने बौद्ध धर्म की महायान परंपरा को आगे बढ़ाया।
(हीनयान बुद्ध की मूल शिक्षा का अनुसरण करते थे और महायान मंत्रों में विश्वास करते है) ये शासक बहुत सहिष्णु थे। इन्होंने दोनों धर्मों को संरक्षण प्रदान किया। पाल शासकों ने अपने शासनकाल में बहुत से विहारों, चैत्यों और स्तूपों का निर्माण करवाया।
सेन शासक हिन्दु थे। उन्होंने हिन्दु देवी-देवताओं के अंतर्गत मंदिर बनवाये और बौद्ध परंपरा को भी जीवंत रखा। अतः वास्तुकला की इस शैली में दोनों धर्मों से संबंधित वस्तुकला परिलक्षित होती है।
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| पाल मूर्तिकला |
पाल युग की पत्थर की मूर्तियां काले बैसाल्ट पत्थर की बनी हैं। सामान्यत: इन मूर्तियों में शरीर के अगले भाग को दिखाने पर ध्यान दिया जाता है। इनमें अलंकरण की प्रधानता है। इनमें बुद्ध एवं विष्णु की मूर्तियों की प्रधानता है। शैव एवं जैन धर्म का प्रभाव सीमित रहा है। सभी मूर्तियां अत्यंत सुंदर, अलंकार – प्रधान एवं कला की परिपक्वता को दर्शाती हैं। कलात्मक सुन्दरता का एक अन्य उदाहरण एक तख्ती है जिस पर ‘शृंगार करती हुई एक स्त्री’ को दिखाया गया है।
चित्रकला :
चित्रकला :
- 9वीं से 12वीं शताब्दी तक बंगाल में पाल वंश के शासकों धर्मपाल और देवपाल के शासन में विशेष रूप से विकसित होने वाली पाल शैली की चित्रकला की विषयवस्तु बौद्ध धर्म से प्रभावित रही है।
- प्रारम्भ में ताड़ पत्र और बाद में काग़ज़ पर बनाये जाने वाले चित्रों में वज्रयान बौद्ध धर्म के दृश्य चित्रित हैं।
- दृष्टांत शैली की प्रधानता वाली इस शैली ने तिब्बत और नेपाल की चित्रकला को भी प्रभावित किया है। इसका प्रमुख केन्द्र पूर्वोत्तर भारत ही रहा है।
- परंतु वर्तमान में इस शैली के चित्र देश के विभिन्न भागों में स्थित संग्रहालयों में भी देखे जा सकते हैं।
- पाल-काल में ताड़ – पत्र एवं दीवारों पर चित्र बनाने के उदाहरण मिले हैं। इनमें लाल, नीले, काले तथा उजले रंगों का प्राथमिक रंग और हरे, बैंगनी, हल्के गुलाबी तथा भूरे रंगों का द्वितीयक रंग के रूप में प्रयोग हुआ है। पाल चित्रकला पर तांत्रिक प्रभाव स्पष्ट झलकता है। चित्रकला का एक रूप भित्ति चित्र भी इस काल में चलन में था, जिसके नमूने नालंदा से प्राप्त हुए हैं। ये चित्र अब धुंधले पड़ चुके हैं किन्तु उनकी अजन्ता एवं बाघ की भित्ति-चित्रात्मक परंपराओं से समानता सुस्पष्ट है।
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| पाल चित्रकला शैली |
स्थापत्य कला : पाल स्थापत्य कला मुख्यतः ईंट पर आधारित थी । इनके साक्ष्य औदंतपुरी, नालंदा एवं विक्रमशिला महाविहार हैं। पाल शासक गोपाल द्वारा औदंतपुरी में एक महाविहार एवं मठ बनवाया गया था यद्यपि इसके अवशेष सुरक्षित नहीं हैं। नालंदा में मंदिर, स्तूप एवं विहार बनवाए गए। धर्मपाल ने नालंदा विश्वविद्यालय का पुनरुद्धार किया एवं उसका खर्च चलाने के लिए 200 गांवों की आमदनी उसे दान में दी तथा भागलपुर में ‘विक्रमशिला विश्वविद्यालय’ की स्थापना की जो कालांतर में नालंदा के बाद सबसे विख्यात विश्वविद्यालय के रूप में उभरा। यहां ईंट निर्मित मंदिर एवं स्तूप के अवशेष मिले हैं। इनमें पत्थर एवं मिट्टी की बनी गौतम बुद्ध की विशाल मूर्तियां हैं। जावा के शैलेन्द्र वंशी शासक बालपुत्रदेव ने पाल शासक देवपाल से अनुमति लेकर नालंदा में एक बौद्ध विहार का निर्माण कराया था।पाल शासकों के अधीन बनवाये गये स्मारक थे-
पाल शासकों के संक्षरण में नालंदा, जगद्दल, ओदंतपुरी एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालयों का विकास हुआ। पाल शासकों ने सोमपुर महाविहार नामक भव्य मठ की स्थापना की थी।
पाल वंश के तीसरे राजा, देवपाल को पाल वंश के सभी राजाओं में सबसे शक्तिशाली माना जाता है। कहा जाता है कि उनके जनरल लुसेना या लाबासेना ने असम और कलिंग पर विजय प्राप्त की थी।देवपाल के शासनकाल के दौरान नालंदा विश्वविद्यालय की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई थी और देवपाल के संरक्षण के कारण नालंदा बौद्ध धर्म और संस्कृति के अध्ययन का केंद्र बन गया था। देवपाल ने बौद्ध धर्म के एक महान शिक्षक और विद्वान इंद्रदेव को नालंदा विश्वविद्यालय का कुलाधिपति नियुक्त किया।
सेन शासकों ने ढाकेश्वरी मंदिर बनवाया था।
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| बांग्लादेश की ढाकेश्वरी मंदिर |
सेन वास्तुकला शैली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. बाँस की झोपड़ियों की छतों के समान भवनों की छतों को वक्राकार या ढलुआ बनाया जाता था। इसे लोकप्रिय रूप से बंग्ला छत कहा जाता है। आगे चलकर इसे मुगल वास्तुकता द्वारा अपना लिया गया।
2. पक्की ईंटें एवं मिट्टी जिन्हें टेराकोटा कहा जाता था, भवन निर्माण में प्रयुक्त की जाने वाली प्रमुख सामग्री थी।
3. मंदिरों के शिखर लंबे एवं वक्राकार होते हैं। उनके शीर्ष पर विशाल ओडिसा शैली सदृश आमलक बनाये जाते थे।
4. मंदिरों की मूर्तियाँ प्रमुख रूप से प्रस्तर एवं धातुओं में निर्मित की जाती थीं। पाषाण मुख्य निर्माण सामग्री थी।
5. इस शैली के मंदिरों की मूर्तियाँ अपनी अत्यधिक चमकदार फिनिसिंग के लिए प्रसिद्ध हैं।
उदाहरण- बराकर का सिद्धेश्वर महादेव मंदिर, विष्णुपुर (पश्चिम बंगाल) के आसपास के मंदिर आदि।
2. पक्की ईंटें एवं मिट्टी जिन्हें टेराकोटा कहा जाता था, भवन निर्माण में प्रयुक्त की जाने वाली प्रमुख सामग्री थी।
3. मंदिरों के शिखर लंबे एवं वक्राकार होते हैं। उनके शीर्ष पर विशाल ओडिसा शैली सदृश आमलक बनाये जाते थे।
4. मंदिरों की मूर्तियाँ प्रमुख रूप से प्रस्तर एवं धातुओं में निर्मित की जाती थीं। पाषाण मुख्य निर्माण सामग्री थी।
5. इस शैली के मंदिरों की मूर्तियाँ अपनी अत्यधिक चमकदार फिनिसिंग के लिए प्रसिद्ध हैं।
उदाहरण- बराकर का सिद्धेश्वर महादेव मंदिर, विष्णुपुर (पश्चिम बंगाल) के आसपास के मंदिर आदि।
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| बराकर का सिद्धेश्वर महादेव मंदिर |
दसवीं शताब्दी ईस्वी के अंत में पाल साम्राज्य अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया।ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य में दो भाइयों, सामंत सेन और हेमंत सेन ने काशीपुरी में एक छोटे से राज्य की स्थापना की।
विजय सेन सेन राजवंश के पहले स्वतंत्र और शक्तिशाली राजा थे। उसने राधा के स्थानीय राजाओं, पूर्वी बंगाल के वर्मा वंश और उत्तरी बंगाल के पालों को कैसे हराया था, यह ज्ञात नहीं है। सेना के तहत भी, वास्तुकला ने एक महान सुधार दर्ज किया। कला, वास्तुकला और मूर्तिकला जो पाल और सेना के संरक्षण में विकसित हुई थी, ज्यादातर मुस्लिम आक्रमण के दौरान नष्ट हो गई है।



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