पल्लव कला~Pallava Sculpture
पल्लव कला~Pallava Sculpture
पल्लव वंश के नरेश कला प्रेमी थे। उन्होंने 7वीं सदी से 10वीं सदी तक राज किया. उनकी वास्तुकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण कांची तथा महाबलिपुरम में पाए जाते हैं। कुछ उदाहरण तंजौर प्रदेश तथा पुडुकोट्टई में भी मिलते हैं। मंदिर और मूर्तिकला के क्षेत्र में उनकी अपनी एक विशेष देन है। उन्होंने चट्टानों को काटकर और पत्थर ईंट के भी बड़े विशाल तथा सुन्दर मंदिर बनवाये जो आज तक भी विद्यमान हैं और अपनी श्रेष्ठ शैली एवं शिल्पकला के लिए विश्व-विख्यात हैं।
पल्लव कलाकारों ने वास्तुकला को धीरे-धीरे काष्ठकला ओर कन्दरा कला के प्रभाव से मुक्त करना प्रारम्भ किया। इस काल की प्रारम्भिक कृतियों में चाहे उन्हीं प्रणालियों का अवलम्बन किया गया है जिन्हें काष्टकार और कन्दरा-कलाकार अपनाते थे. परन्तु धीरे-धीरे उन प्रणालियों का परित्याग होने लगा।श्री नीलकंठ शास्त्री ने उनकी वास्तुकला तथा शिल्पकला की कोष्ठता की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि- "उनकी वास्तुकला तथा शिल्प- कला दक्षिण भारत की कला के इतिहास का सबसे अधिक गौरवपूर्ण अध्याय निर्मित करती है।"
पल्लव काल में भिन्न-भिन्न शैलियाँ और कला का स्थान:
पल्लव काल में भिन्न-भिन्न शैलियों के मन्दिरों का निर्माण हुआ जिन्हें परस्पर पृथक् करने की दृष्टि से चार वर्गों में विभकत किया जा सकता है तथा जिनका नामकरण चार विभिन्न पल्लव नरेशों के नाम पर किया गया है। ये शैलियां हैं-
महेन्द्रवर्मन प्रथम शैली:
इस शैली का विकास 600-640 ई. तक हुआ। इस शैली में मन्दिरों को मंडप कहा गया है क्योंकि इसके अंतर्गत स्तम्भ मंडप बने थे. ये ठोस चट्टानों को काटकर बनाए गए हैं। ये मंदिर अपनी सादगी से पहचाने जा सकते हैं। इस शैली में बने प्रमुख मंडपों में उन्दवल्लि (गुन्टूर जिला का आनन्तशयन का मंडप तथा भखकोंड़ (उत्तरी अर्काट जिला) के मंडप विशेष उल्लेखनीय हैं।
इस शैली का विकास 600-640 ई. तक हुआ। इस शैली में मन्दिरों को मंडप कहा गया है क्योंकि इसके अंतर्गत स्तम्भ मंडप बने थे. ये ठोस चट्टानों को काटकर बनाए गए हैं। ये मंदिर अपनी सादगी से पहचाने जा सकते हैं। इस शैली में बने प्रमुख मंडपों में उन्दवल्लि (गुन्टूर जिला का आनन्तशयन का मंडप तथा भखकोंड़ (उत्तरी अर्काट जिला) के मंडप विशेष उल्लेखनीय हैं।
मामल्ल शैली:
मामल्ल शैली को नरसिंहवर्मन (मामल्ल) ने चलाया था। उसने मामल्लपुर (महाबलिपुरम) नगर बसाया था तथा मामल्ल की उपाधि धारण की थी, इसलिए उस द्वारा चलाई शैली मामल्ल शैली कहलाती है. इस शैली के अन्तगंत दो प्रकार के मन्दिर बनाए गए हैं– मंडप तथा रथ. मंडपों की संख्या दस है. इस शैली के मंडप महेन्द्र वर्मन शैली से अधिक विकसित और अलंकृत हैं।
मामल्ल शैली को नरसिंहवर्मन (मामल्ल) ने चलाया था। उसने मामल्लपुर (महाबलिपुरम) नगर बसाया था तथा मामल्ल की उपाधि धारण की थी, इसलिए उस द्वारा चलाई शैली मामल्ल शैली कहलाती है. इस शैली के अन्तगंत दो प्रकार के मन्दिर बनाए गए हैं– मंडप तथा रथ. मंडपों की संख्या दस है. इस शैली के मंडप महेन्द्र वर्मन शैली से अधिक विकसित और अलंकृत हैं।
इनमें से विशेष रूप से उल्लेखनीय है बारह मंडप, पंच पांडव तथा महर्षि मंडप. ये अपनी श्रेष्ठ स्थापत्य के लिए भी प्रसिद्ध है. इनमें देवताओं आदि को तथा पशुओं की मूर्तियां सर्वश्रेष्ठ रूपों में बनाई गयी हैं। इसी शैली के दूसरे प्रकार के रथ मन्दिर हैं। ये एक प्रस्तरीय मन्दिर (Monolithic temples) हैं। इन्हें सामान्यतया सप्त पगोड़ा (Seven pogodas) के नाम से जाना जाता है। यद्यपि इनकी संख्या आठ है, ये हैं – (1) द्रौपदी रथ (2) अर्जुन रथ (3) भीम रथ (4) धर्मराज रथ (5) सहदेव रथ (6) गणेश रथ (7) पिडारी रथ तथा (8) वलैयान कुट्टइ रथ।
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| Seven Pagodas~ Mahabalipuram |
इन मन्दिरों की कुछ प्रमुख विशेषताएं हैं– बहुत ही अलंकृत मुख्य द्वार, आठ कोण वाले सिंह स्तम्भ तथा अलंकार के लिए दीवारों पर राजा और रानी की मूर्तियां लगाई गई हैं। यद्यपि ये मन्दिर पांडवों के नाम पर बनाए गए हैं लेकिन वास्तव में ये शैव मन्दिर हैं। इन रथों का विकास बौद्ध विहार तथा चैत्यों से हुआ है. इनमें द्रौपदी रथ एक अलग शैली का है। इन रथों में से कुछ की छत पिरामिड के आकार की है और कुछ के ऊपर शिखर है। ये मन्दिर शिलाखण्डों को काट कर बनाए ग़ए हैं ओर काष्ठ निर्मित रथों की शकल पर बनाए जान पड़ते हैं। यह आश्चर्य की बात है कि इन मन्दिरों के निर्माताओं ने इन्हें अधूरा ही छोड़ दिया था।
राजसिंह शैली:
राजसिंह शैली का विकास पल्लव नरेश नरसिंहवर्मन द्वितीय, जिसने राजसिंह की उपाधि धारण की थी, के काल (680-720 ई०) में विकसित हुई थी। इस शैली के अन्तर्गत गुहा मन्दिरों (Rock-out temples) के स्थान पर पाषाणों तथा ईंटों की सहायता से मन्दिर बनाए गए। इसी शैली के मन्दिरों में सबसे प्रसिद्ध कांची का कैलाश-मन्दिर तथा महाबलिपुरम का समुद्रतट का मन्दिर (शोर टेम्पल) है।
राजसिंह शैली का विकास पल्लव नरेश नरसिंहवर्मन द्वितीय, जिसने राजसिंह की उपाधि धारण की थी, के काल (680-720 ई०) में विकसित हुई थी। इस शैली के अन्तर्गत गुहा मन्दिरों (Rock-out temples) के स्थान पर पाषाणों तथा ईंटों की सहायता से मन्दिर बनाए गए। इसी शैली के मन्दिरों में सबसे प्रसिद्ध कांची का कैलाश-मन्दिर तथा महाबलिपुरम का समुद्रतट का मन्दिर (शोर टेम्पल) है।
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| शोर टेम्पल~ महाबलिपुरम |
कांची के मन्दिर ईंट और पत्थर से बने हुए हैं। इनके शिखर बहुत ऊंचे ओर मंडप की छत चपटी है। श्री नीलकण्ठ शास्त्री के मतानुसार, "पल्लव शैली की सभी प्रमुख विशेषताएं इस मन्दिर में बड़े ही आकर्षक रूप में संग्रहीत मिलती हैं।"
पल्लव वास्तुकला की प्रमुख विशेषताएं हैं :
सिंह स्तम्भ, चाहर दीवारी, शिखर, मंडप के सुदृढ़ स्तम्भ, भीतर बने छोटे-छोटे कमरे, मूर्तियाँ तथा अन्य उपकरणों से सजावट आदि। ये सभी विशेषताएं कांची के कैलाश मन्दिर में दिखाई देती हैं। इसी शैली (राजसिंह शैली) का सबसे परिपक्व एवं प्रौढ़ उदाहरण बैकुंठपेरुमाल का मन्दिर है। यह कांची के कैलाश मन्दिर से बड़ा है ओर इसके मुख्य मार्ग – मठ द्वार मंडप तथा देवालय पृथक् भवन के रूप में नहीं है बल्कि उनको एक भली-भांति जुड़े हुए ढांचे में एक साथ मिला कर रखा गया है।
अपराजित शैली:
अपराजित शैली का प्रारम्भ पल्लव नरेश अपराजित (879- 897 ई०) के काल में हुआ। यह पल्लव काल के अन्तिम चरण की शैली है। तंजौर का राज मन्दिर इसी शैली में बना है। इसके अंतर्गत स्तम्भों के शीर्ष का अधिक विकास हुआ। मन्दिरों के शिखर ऊपर की ओर पतले होते चले गए और मन्दिरों के शिखर की गर्देन पहले की अपेक्षा अधिक स्थुल है। धीरे-घीरे इस शैली का स्थान चोल शैली ने ले लिया। पल्लव कला का प्रभाव दक्षिणी-पूर्वी एशिया के मन्दिरों में भी देखा जा सकता है।
अपराजित शैली का प्रारम्भ पल्लव नरेश अपराजित (879- 897 ई०) के काल में हुआ। यह पल्लव काल के अन्तिम चरण की शैली है। तंजौर का राज मन्दिर इसी शैली में बना है। इसके अंतर्गत स्तम्भों के शीर्ष का अधिक विकास हुआ। मन्दिरों के शिखर ऊपर की ओर पतले होते चले गए और मन्दिरों के शिखर की गर्देन पहले की अपेक्षा अधिक स्थुल है। धीरे-घीरे इस शैली का स्थान चोल शैली ने ले लिया। पल्लव कला का प्रभाव दक्षिणी-पूर्वी एशिया के मन्दिरों में भी देखा जा सकता है।
(2) नरसिंहवर्मन (630-647 ई०) के महाबलीपुरम के मंदिरों का पाँच रथों का समूह पाँच पांडव तथा द्रौपदी के नाम से विख्यात है। मामल्लपुरम का विशाल मंदिर समुद्र तट पर एक विशाल चट्टान को काटकर निर्मित किया गया है। यह मंदिर पल्लव कला की श्रेष्ठता का अद्वितीय उदाहरण है।
(3) मामल्लपुरम में ही 98 फीट लम्बी तथा 43 फीट चौड़ी पाषाण शिला पर अंकित गंगावतरण का दृश्य अत्यन्त आकर्षक एवं सजीव है। मुनि का शरीर तपस्या में लीन होने से अस्थि पंजर मात्र रह गया है। भागीरथी गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए इस तपस्या में लीन-मुनि का साथ समस्त दिव्य पार्थिव तथा जन्तु भी दे रहे हैं। पल्लवकालीन तक्षण कला का यह दृश्य भावपूर्ण तथा वास्तविक प्रतीत होता है। नरसिंहवर्मन शैली में अलंकार का विशेष महत्त्व है इस शैली की सभी कलाकृतियाँ अलंकृत तथा प्रभावोत्पादक ढंग से उत्तीर्ण की गई है प्रारम्भिक पल्लव कला के स्थान पर नरसिंहवर्मन शैली में कला की प्रौढ़ता का आभास अधिक होता है।
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| गंगावतरण (Descent of the Ganges)~ मामल्लपुरम |
(4) त्रिचनापल्ली में भी इसी प्रकार के मन्दिरों के साथ ही गुहा मन्दिरों का निर्माण किया गया है। गंगावतरण पल्लव कला की देन है। इनके साथ ही मन्दिर के प्रवेशद्वार का अलंकरण अत्यन्त सजीव ढंग से किया गया है। मामल्लपुरम में ब्रह्मा, विष्णु, महेश की त्रिमूर्ति एक ही पाषाण पर उत्कीर्ण है।
(5) पल्लव शैली की एक अन्य महत्त्वपूर्ण कृति काँची का कैलाश मन्दिर है। इसकी निर्माण शैली एक ही चट्टान से निर्मित मंदिरों से अलग है। इनमें एक मंदिर पर शिखर है और दूसरा मन्दिर प्रारम्भिक गुप्तकालीन मन्दिरों के समान विना शिखर का चौड़ी छतनुमा शिखर का बना हुआ है। काँची के कैलाश मंदिर में पल्लव नरेश तथा उनकी रानियों को भी तक्षण कला द्वारा मर्तियों के रूप में दिखाया गया है। कैलाश मन्दिर के शिखर निर्माण में पाषाण के साथ जुड़ाई के लिए चूने का प्रयोग किया गया है। यह पल्लव शैली अथवा द्रविड़ शैली के शिखर का सुन्दर नमूना है।
(5) पल्लव शैली की एक अन्य महत्त्वपूर्ण कृति काँची का कैलाश मन्दिर है। इसकी निर्माण शैली एक ही चट्टान से निर्मित मंदिरों से अलग है। इनमें एक मंदिर पर शिखर है और दूसरा मन्दिर प्रारम्भिक गुप्तकालीन मन्दिरों के समान विना शिखर का चौड़ी छतनुमा शिखर का बना हुआ है। काँची के कैलाश मंदिर में पल्लव नरेश तथा उनकी रानियों को भी तक्षण कला द्वारा मर्तियों के रूप में दिखाया गया है। कैलाश मन्दिर के शिखर निर्माण में पाषाण के साथ जुड़ाई के लिए चूने का प्रयोग किया गया है। यह पल्लव शैली अथवा द्रविड़ शैली के शिखर का सुन्दर नमूना है।
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| काँची का कैलाश मन्दिर |
पल्लव शैली का विस्तार:
पल्लव कला को उनके स्थान पर कालान्तर में राज्य करे बाल चोल राजाओं ने भी ग्रहण कर उसको संरक्षण दिया तथा विकसित किया था। पल्लव शैली समुद्र पार कर जावा, सुमात्रा, अत्राम तथा कम्बोडिया तक व्याप्त हो गई थी। पल्लव शैली के शिखर युक्त मन्दिरों का निर्माण इन देशों में भी किया गया। इन मंदिरों में दक्षिण भारत की स्तम्भयुक्त मंदिर कला का अभाव है। आठवीं शताब्दी के पश्चात् अपराजित शैली की पल्लव कला के अन्तर्गत मन्दिरों की शैली में अन्तर हो गया था। इन मन्दिरों के निर्माण में शिखर की गर्दन अधिक स्तूल हो गई थी तथा गर्भगृह में प्रतिस्थापित लिंग ऊपर की ओर पतले हो गये थे। भारतीय तक्षण कला में दक्षिण भारत की पल्लव शैली को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। पल्लव कालीन संस्कृति पल्लव वंश की उत्पत्ति एवं मूल स्थान के बारे में कई मत प्रतिपादित किए गये हैं। जैसे-पार्थियन वंशज, नाग-चोल मिश्रित वंश आदि। अधिकांश विद्वानों ने इन मतों को अमान्य कर दिया। पल्लवों की उत्पत्ति का आधार जो भी रहा हो, यह निश्चित है कि प्रारम्भिक पल्लव नरेश बुद्ध थे जो कालान्तर में ब्राह्मण धर्म स्वीकार कर शिव तथा विष्णु के उपासक बन गये थे। पल्लव वंश का राज्यकाल 350 से 750 के मध्य प्रथम पल्लव नरेश सिंहवर्मन भारद्वाज गोत्र का था। सिंहवर्मन के बाद स्वान्दवर्मन ने चोलों को परास्त कर ‘धर्म महाराज’ की उपाधि धारण की थी। स्कन्द वमन ने अश्वमेध तथा राजसूय यज्ञों का परायण कर काँची को राजधानी बनाया था स्कन्द वर्मा का साम्राज्य कृष्णा नदी के पश्चिम में अरब सागर तक विस्तृत था। पल्लव शक्ति का विकास सिंहविष्णु के कार्यकाल में हुआ था । उसका उत्तराधिकारी महेन्द्रवर्मन प्रथम (600-630 ई०) प्रारम्भ में जैन मतावलम्बी था किन्तु बाद में शैव सम्प्रदायी बन गया था। अन्य महत्त्वपूर्ण नरेश नरसिंहवर्मन (630-668 ई०) था। यह दक्षिणापथ का सबसे शक्तिशाली देश बन गया था। यह वातापी विजयी (वातापीकोण्ड) कहलाता था।
पल्लवकालीन संस्कृति तथा साहित्य की निम्नलिखित विन्दुओं के अन्तर्गत समझा जा सकता है:
(1) कर तथा बहु-पल्लवकालीन व्यवस्था में ‘उम्र तथा ‘राहु का अत्यधिक महत्त्व था। और दक्षिण भारत की तमिल संस्कृति में कृषक ग्रामों की एक संगठित सभा थी। बुनियादी तौर पर ‘और (क्षेत्र) आयाम का एक आरामदायक क्षेत्र था। इसकी भूमि, साधन तथा स्रोतों के संचालन मुट्ठी भर जमींदारों (वेल्लोर) के हाथों में था। नामक क्षेत्रीय इकाई उस प्रकार के ग्रामों के समूह (ऊर) की मिलाकर नाहु अपवा नाट्टार नामक समा बनाते थे। यह नाट्टार सभ स्थानीय प्रशासन के क्षेत्र में अत्यन्त प्रभावशाली था। और धार्मिक गतिविधियों तक सीमित थे इनका कोई निजी राजनीतिक ढाँचा नहीं था।
(2) प्रशासन-पल्लवों की शासन व्यवस्था राजतन्त्रात्मक होकर भी रास्ता नहीं भी। राजा के परामर्श के लिए मंत्रिपरिषद् तथा अन्य अधिकारियों की महत्त्वपूर्ण समितियाँ गठित होती थीं। राज्य कई क्षेत्रों में विभक्त या जो कोट्टम कहलाते थे कई कोट्टम मिलकर एक मण्डल अथवा प्रान्त का निर्माण करते थे। प्रान्त के अधीन कई प्रामों की इकाइया नाह नामक संगठन होती थी। नाडु के अधीन ‘और अथवा ग्राम प्रशासन होता था। पल्लव काल में ग्रामीण शासन की स्वायत्तता एक विशेषता थी। ग्राम परिषद् ही सामाजिक, धार्मिक तथा गाँव के अन्य सामुदायिक कार्यों को संचालित करती थी ग्राम परिषद् प्राप्त कर संग्रह करती थी। ग्राम परिषद् न्यायालय का कार्य करती तथा अभिलेखों को सुरक्षित रखती थी।
(3) सामाजिक स्थिति-पल्लव काल के पूर्व ही आर्यों की सभ्यता का प्रसार दक्षिण भारत में हो गया था, किन्तु वर्ण तथा आश्रम व्यवस्था का प्रभाव अधिक व्याप्त नहीं हुआ था तमिल समाज व्यवसाय के आधार पर समुदायों में विभक्त था। प्रमुखतः दो समुदाय थे। एक भूमि जाते थे और बहुसंख्यक कृषक थे। इनकी संख्या अधिक थी। दूसरा समुदाय इन लोगों से कृषि कार्य कराता था। यह जमींदार वर्ग था।
(4) वस्त्र एवं आभूषण-पल्लवकालीन पुरुष एवं महिलाओं के वस्त्र परम्परागत तमिल संस्कृति के अनुसार ही सादे होते थे। पुरुष धोती तथा कभी-कभी पगड़ी धारण करते थे। महिला आभूषणों की ओर अधिक आकर्षित थीं। वे चूड़ियां हार, कन्दोरे तथा पायजेब के साथ विविध प्रकार के भुजबन्द धारण करती थीं।
(5) धार्मिक जीवन-प्रारम्भिक पल्लव नरेश बौद्ध थे, किन्तु बाद में ये ब्राह्मण धर्मावलम्बी बन गये थे। शिव तथा विष्णु दोनों ही परनवा कालीन समाज के आराध्य देव थे। पल्लव नरेश ब्राह्मण धर्म ग्रहण करने के बाद शैव सम्प्रदाय को मानने लगे थे हेनसांग के वर्णन के अनुसार, पल्लव काल में महायान सम्प्रदाय का प्रभुत्त्व अधिक था। जैन धर्म भी पल्लवों के समय खूब फला-फूला। प्रसिद्ध पल्लव नरेश प्रारम्भ में जैन मतावलम्बी थे। ह्वेनसांग के वर्णन के अनुसार, पल्लवों की राजधानी काँची की परिधि 6 मील थी। हेनसांग 640 ई० में काँची आया था। उसके मठ थे। अनुसार काँची में 80 मन्दिर तथा 100 से अधिक बौद्ध विद्याप्रेमी तथा सद्व्यवहार करने वाले लोग काँची में निवास करते थे कालान्तर में परवर्ती पल्लव राजाओं के समय वैष्णव मत का पल्लव प्रदेश में प्रचार-प्रसार अधिक हो गया था।
(6) काँची का शिक्षा केन्द्र-पल्लवों की राजधानी ‘काँची शिक्षा तथा साहित्य का प्रमुख केन्द्र था। दक्षिण में पूर्वी तट पर वसव समुद्र को स्थिति अत्यन्त महत्वपूर्ण है यह स्थल पालार नदी के मुहाने पर (मद्रास के निकट) का समुद्री का क्षेत्र कहलाता है। मामल्लपुरम् भी यसव समुद्र में पार नदी के मुहाने पर स्थित है। वसव समुद्र के किनारे पर ही हेनसांग ने ‘काँची का वर्णन एक बन्दरगाह के रूप में किया है। यह पालार नदी की सहायक वेगवती नदी के तट पर स्थित है। यहाँ से पालार नदी के मार्ग से ही समुद्र तट तक पहुँचा जा सकता था। अत: पल्लवों के समय प्रमुख बन्दरगाहों से काँची का सीधा सम्बन्ध स्थापित था यही कारण है कि ह्वेनसांग ने काँची को भी बन्दरगाह कहा है। काँची हिन्दू आचार्यों तथा पंडितों का केन्द्र था। इसका प्रत्येक मन्दिर एक शिक्षा संस्था थी। नालन्दा विश्वविद्यालय का प्रमुख आचार्य धर्मपाल काँची से शिक्षित होकर ही नालन्दा गया था। काँची के आस-पास कई ब्राह्मण परिवार निवास करते थे। पल्लयों के समय दक्षिण भारत में रांची के प्रमुख शिक्षा केंद्र बन गया था। यही कारण है कि पल्लवों के काल में समाज शिक्षित था। काँची के शिक्षा केन्द्रों में कालियार तथा भैरवी की कविताओं तथा वराहमिहिर के सिद्धान्तों का रुचिपूर्वक अध्ययन किया जाता था।
(7) संस्कृत का वैभव-पल्लव शासनकाल में संस्कृत भाषा की पर्याप्त उन्नति हई जिससे संस्कृत के वैभव में वृद्धि हुई। इस काल के राजकीय अभिलेखों को छोड़ कर अन्य सभी अभिलेख संस्कृत में मिलते हैं।
(8) साहित्य-पल्लवों के शासनकाल तक आर्य सभ्यता दक्षिण में व्याप्त हो गई थी। वस्तु दक्षिण भारत के आयींकरण का स्पष्ट उल्लेख बोधानन्द ने ब्राह्मणों को दिए अनुदान में किया है। उनफे अनुसार उत्तरी भारत के धर्मशास्त्रों ने पल्लव राज्य में सत्ता स्थापित कर लो थी। संस्कृत का वैभव व्याप्त था। कालिदास, भारवि तथा वराहमिहिर के साहित्य का कांची के शिक्षा केन्द्रों में अध्ययन से यह प्रमाणित है। आर्यों के प्रभाव तथा संस्कृत साहित्य की पल्लव काल में प्रभुसत्ता स्यापित होने से पल्लव काल में सर्वश्रेष्ठ तमिल रचना हुई थी। वात्स्यायन, जिसने न्याय भाष्य की रचना की थी, काँची का महान् पण्डित यं। महान् बौद्ध आचार्य दिङ्नाग तथा कदम्य और राजकुल का विद्वान् मयूर वर्मा उच्च अध्ययन हेतु काँची गये थे। नालन्दा के प्रमुख आचार्य धर्मपाल काँच से ही नालन्दा आए थे। यही नहीं, सुदूर पूर्व के वृहत्तर भारतीय क्षेत्र काम्बोज तथा चम्पा में पाएगये संस्कृत अभिलेख पल्लव लिपि में उत्कीर्ण हैं। अतः सुदूर पूर्व के हिन्दू उपनिवेशों में भी पल्ल व साहित्य एवं कला का प्रसार हो गया था। काँची का महत्त्व दक्षिण भारत में नालन्दा के समकक्ष स्थापित हो गया था।
(9) विद्वानों को राजकीय संरक्षण-पल्लव राजा महेन्द्रवर्मन स्वयं उच्च कोटि कर विद्वान् और साहित्यकार था। महेन्द्रवर्मन ने ‘मत्तविलास नामक सामाजिक नाटक की रचना की थी। महेन्द्रवर्मन ने अपनी राजसभा में कई विद्वानों को प्रश्रय देकर सुशोभित किया था उस काल में संस्कृत और तमिल साहित्य में कई ग्रंथों की रचनाएँ हुई हैं। भारवि, अलंकार के रचयिता दण्डी तथा प्रसिद्ध विद्वान् मातृ दत्त पल्लव काल के प्रमुख साहित्यकार थे।
(1) कर तथा बहु-पल्लवकालीन व्यवस्था में ‘उम्र तथा ‘राहु का अत्यधिक महत्त्व था। और दक्षिण भारत की तमिल संस्कृति में कृषक ग्रामों की एक संगठित सभा थी। बुनियादी तौर पर ‘और (क्षेत्र) आयाम का एक आरामदायक क्षेत्र था। इसकी भूमि, साधन तथा स्रोतों के संचालन मुट्ठी भर जमींदारों (वेल्लोर) के हाथों में था। नामक क्षेत्रीय इकाई उस प्रकार के ग्रामों के समूह (ऊर) की मिलाकर नाहु अपवा नाट्टार नामक समा बनाते थे। यह नाट्टार सभ स्थानीय प्रशासन के क्षेत्र में अत्यन्त प्रभावशाली था। और धार्मिक गतिविधियों तक सीमित थे इनका कोई निजी राजनीतिक ढाँचा नहीं था।
(2) प्रशासन-पल्लवों की शासन व्यवस्था राजतन्त्रात्मक होकर भी रास्ता नहीं भी। राजा के परामर्श के लिए मंत्रिपरिषद् तथा अन्य अधिकारियों की महत्त्वपूर्ण समितियाँ गठित होती थीं। राज्य कई क्षेत्रों में विभक्त या जो कोट्टम कहलाते थे कई कोट्टम मिलकर एक मण्डल अथवा प्रान्त का निर्माण करते थे। प्रान्त के अधीन कई प्रामों की इकाइया नाह नामक संगठन होती थी। नाडु के अधीन ‘और अथवा ग्राम प्रशासन होता था। पल्लव काल में ग्रामीण शासन की स्वायत्तता एक विशेषता थी। ग्राम परिषद् ही सामाजिक, धार्मिक तथा गाँव के अन्य सामुदायिक कार्यों को संचालित करती थी ग्राम परिषद् प्राप्त कर संग्रह करती थी। ग्राम परिषद् न्यायालय का कार्य करती तथा अभिलेखों को सुरक्षित रखती थी।
(3) सामाजिक स्थिति-पल्लव काल के पूर्व ही आर्यों की सभ्यता का प्रसार दक्षिण भारत में हो गया था, किन्तु वर्ण तथा आश्रम व्यवस्था का प्रभाव अधिक व्याप्त नहीं हुआ था तमिल समाज व्यवसाय के आधार पर समुदायों में विभक्त था। प्रमुखतः दो समुदाय थे। एक भूमि जाते थे और बहुसंख्यक कृषक थे। इनकी संख्या अधिक थी। दूसरा समुदाय इन लोगों से कृषि कार्य कराता था। यह जमींदार वर्ग था।
(4) वस्त्र एवं आभूषण-पल्लवकालीन पुरुष एवं महिलाओं के वस्त्र परम्परागत तमिल संस्कृति के अनुसार ही सादे होते थे। पुरुष धोती तथा कभी-कभी पगड़ी धारण करते थे। महिला आभूषणों की ओर अधिक आकर्षित थीं। वे चूड़ियां हार, कन्दोरे तथा पायजेब के साथ विविध प्रकार के भुजबन्द धारण करती थीं।
(5) धार्मिक जीवन-प्रारम्भिक पल्लव नरेश बौद्ध थे, किन्तु बाद में ये ब्राह्मण धर्मावलम्बी बन गये थे। शिव तथा विष्णु दोनों ही परनवा कालीन समाज के आराध्य देव थे। पल्लव नरेश ब्राह्मण धर्म ग्रहण करने के बाद शैव सम्प्रदाय को मानने लगे थे हेनसांग के वर्णन के अनुसार, पल्लव काल में महायान सम्प्रदाय का प्रभुत्त्व अधिक था। जैन धर्म भी पल्लवों के समय खूब फला-फूला। प्रसिद्ध पल्लव नरेश प्रारम्भ में जैन मतावलम्बी थे। ह्वेनसांग के वर्णन के अनुसार, पल्लवों की राजधानी काँची की परिधि 6 मील थी। हेनसांग 640 ई० में काँची आया था। उसके मठ थे। अनुसार काँची में 80 मन्दिर तथा 100 से अधिक बौद्ध विद्याप्रेमी तथा सद्व्यवहार करने वाले लोग काँची में निवास करते थे कालान्तर में परवर्ती पल्लव राजाओं के समय वैष्णव मत का पल्लव प्रदेश में प्रचार-प्रसार अधिक हो गया था।
(6) काँची का शिक्षा केन्द्र-पल्लवों की राजधानी ‘काँची शिक्षा तथा साहित्य का प्रमुख केन्द्र था। दक्षिण में पूर्वी तट पर वसव समुद्र को स्थिति अत्यन्त महत्वपूर्ण है यह स्थल पालार नदी के मुहाने पर (मद्रास के निकट) का समुद्री का क्षेत्र कहलाता है। मामल्लपुरम् भी यसव समुद्र में पार नदी के मुहाने पर स्थित है। वसव समुद्र के किनारे पर ही हेनसांग ने ‘काँची का वर्णन एक बन्दरगाह के रूप में किया है। यह पालार नदी की सहायक वेगवती नदी के तट पर स्थित है। यहाँ से पालार नदी के मार्ग से ही समुद्र तट तक पहुँचा जा सकता था। अत: पल्लवों के समय प्रमुख बन्दरगाहों से काँची का सीधा सम्बन्ध स्थापित था यही कारण है कि ह्वेनसांग ने काँची को भी बन्दरगाह कहा है। काँची हिन्दू आचार्यों तथा पंडितों का केन्द्र था। इसका प्रत्येक मन्दिर एक शिक्षा संस्था थी। नालन्दा विश्वविद्यालय का प्रमुख आचार्य धर्मपाल काँची से शिक्षित होकर ही नालन्दा गया था। काँची के आस-पास कई ब्राह्मण परिवार निवास करते थे। पल्लयों के समय दक्षिण भारत में रांची के प्रमुख शिक्षा केंद्र बन गया था। यही कारण है कि पल्लवों के काल में समाज शिक्षित था। काँची के शिक्षा केन्द्रों में कालियार तथा भैरवी की कविताओं तथा वराहमिहिर के सिद्धान्तों का रुचिपूर्वक अध्ययन किया जाता था।
(7) संस्कृत का वैभव-पल्लव शासनकाल में संस्कृत भाषा की पर्याप्त उन्नति हई जिससे संस्कृत के वैभव में वृद्धि हुई। इस काल के राजकीय अभिलेखों को छोड़ कर अन्य सभी अभिलेख संस्कृत में मिलते हैं।
(8) साहित्य-पल्लवों के शासनकाल तक आर्य सभ्यता दक्षिण में व्याप्त हो गई थी। वस्तु दक्षिण भारत के आयींकरण का स्पष्ट उल्लेख बोधानन्द ने ब्राह्मणों को दिए अनुदान में किया है। उनफे अनुसार उत्तरी भारत के धर्मशास्त्रों ने पल्लव राज्य में सत्ता स्थापित कर लो थी। संस्कृत का वैभव व्याप्त था। कालिदास, भारवि तथा वराहमिहिर के साहित्य का कांची के शिक्षा केन्द्रों में अध्ययन से यह प्रमाणित है। आर्यों के प्रभाव तथा संस्कृत साहित्य की पल्लव काल में प्रभुसत्ता स्यापित होने से पल्लव काल में सर्वश्रेष्ठ तमिल रचना हुई थी। वात्स्यायन, जिसने न्याय भाष्य की रचना की थी, काँची का महान् पण्डित यं। महान् बौद्ध आचार्य दिङ्नाग तथा कदम्य और राजकुल का विद्वान् मयूर वर्मा उच्च अध्ययन हेतु काँची गये थे। नालन्दा के प्रमुख आचार्य धर्मपाल काँच से ही नालन्दा आए थे। यही नहीं, सुदूर पूर्व के वृहत्तर भारतीय क्षेत्र काम्बोज तथा चम्पा में पाएगये संस्कृत अभिलेख पल्लव लिपि में उत्कीर्ण हैं। अतः सुदूर पूर्व के हिन्दू उपनिवेशों में भी पल्ल व साहित्य एवं कला का प्रसार हो गया था। काँची का महत्त्व दक्षिण भारत में नालन्दा के समकक्ष स्थापित हो गया था।
(9) विद्वानों को राजकीय संरक्षण-पल्लव राजा महेन्द्रवर्मन स्वयं उच्च कोटि कर विद्वान् और साहित्यकार था। महेन्द्रवर्मन ने ‘मत्तविलास नामक सामाजिक नाटक की रचना की थी। महेन्द्रवर्मन ने अपनी राजसभा में कई विद्वानों को प्रश्रय देकर सुशोभित किया था उस काल में संस्कृत और तमिल साहित्य में कई ग्रंथों की रचनाएँ हुई हैं। भारवि, अलंकार के रचयिता दण्डी तथा प्रसिद्ध विद्वान् मातृ दत्त पल्लव काल के प्रमुख साहित्यकार थे।




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