खजुराहो~Khajuraho
खजुराहो~Khajuraho
खजुराहो महोबा से 54 किलोमीटर दक्षिण में, छतरपुर से 45 किलोमीटर पूर्व और सतना से 105 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है। 1838 में एक ब्रिटिश इंजीनियर कैप्टन टी.एस. बर्ट को अपनी यात्रा के दौरान अपने कहारों से इसकी जानकारी मिली। उन्होंने जंगलों में लुप्त इन मन्दिरों की खोज की और उनका अलंकारिक विवरण बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी के समक्ष प्रस्तुत किया। 1843 से 1847 के बीच छतरपुर के स्थानीय महाराजा ने इन मन्दिरों की मरम्मत कराई। जनरल अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने इस स्थान की 1852 के बाद कई यात्राएँ कीं और इन मन्दिरों का व्यवस्थाबद्ध वर्णन अपनी 'भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण' की रिपोर्ट (आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया रिपोर्ट्स) में किया। खजुराहों के स्मारक अब भारत के पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग की देखभाल और निरीक्षण में हैं।
चंदेल वंश द्वारा 950 - 1050 CE के बीच निर्मित, खजुराहो मंदिर भारतीय कला के सबसे महत्वपूर्ण नमूनों में से एक हैं। हिंदू और जैन मंदिरों के इन सेटों को आकार लेने में लगभग सौ साल लगे। मूल रूप से 85 मंदिरों का एक संग्रह, संख्या 25 तक नीचे आ गई है। एक यूनेस्को विश्व विरासत स्थल, मंदिर परिसर को तीन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है: पश्चिमी, पूर्वी और दक्षिणी। पश्चिमी समूह में अधिकांश मंदिर हैं, पूर्वी में नक्काशीदार जैन मंदिर हैं जबकि दक्षिणी समूह में केवल कुछ मंदिर हैं। पूर्वी समूह के मंदिरों में जैन मंदिर चंदेला शासन के दौरान क्षेत्र में फलते-फूलते जैन धर्म के लिए बनाए गए थे। पश्चिमी और दक्षिणी भाग के मंदिर विभिन्न हिंदू देवी-देवताओं को समर्पित हैं। इनमें से आठ मंदिर विष्णु को समर्पित हैं, छह शिव को, और एक गणेश और सूर्य को जबकि तीन जैन तीर्थंकरों को हैं। कंदरिया महादेव मंदिर उन सभी मंदिरों में सबसे बड़ा है, जो बने हुए हैं।
यहां मंदिरों में जड़ी हुई मिथुन प्रतिमाऐं सर्वोत्तम शिल्प की परिचायक हैं, जो कि दर्शकों की भावनाओं को अत्यंत उद्वेलित व आकर्शित करती हैं और अपनी मूर्तिकला के लिए विशेष उल्लेखनीय हैं। खजुराहो की मूर्तियों की सबसे अहम और महत्त्वपूर्ण ख़ूबी यह है कि इनमें गति है, देखते रहिए तो लगता है कि शायद चल रही है या बस हिलने ही वाली है, या फिर लगता है कि शायद अभी कुछ बोलेगी, मस्कुराएगी, शर्माएगी या रूठ जाएगी। और कमाल की बात तो यह है कि ये चेहरे के भाव और शरीर की भंगिमाऐं केवल स्त्री-पुरुषों में ही नहीं बल्कि जानवरों में भी दिखाई देते हैं। कुल मिलाकर कहा जाय तो हर मूर्ति में एक अजीब सी हलचल है।
चंदेल वंश द्वारा 950 - 1050 CE के बीच निर्मित, खजुराहो मंदिर भारतीय कला के सबसे महत्वपूर्ण नमूनों में से एक हैं। हिंदू और जैन मंदिरों के इन सेटों को आकार लेने में लगभग सौ साल लगे। मूल रूप से 85 मंदिरों का एक संग्रह, संख्या 25 तक नीचे आ गई है। एक यूनेस्को विश्व विरासत स्थल, मंदिर परिसर को तीन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है: पश्चिमी, पूर्वी और दक्षिणी। पश्चिमी समूह में अधिकांश मंदिर हैं, पूर्वी में नक्काशीदार जैन मंदिर हैं जबकि दक्षिणी समूह में केवल कुछ मंदिर हैं। पूर्वी समूह के मंदिरों में जैन मंदिर चंदेला शासन के दौरान क्षेत्र में फलते-फूलते जैन धर्म के लिए बनाए गए थे। पश्चिमी और दक्षिणी भाग के मंदिर विभिन्न हिंदू देवी-देवताओं को समर्पित हैं। इनमें से आठ मंदिर विष्णु को समर्पित हैं, छह शिव को, और एक गणेश और सूर्य को जबकि तीन जैन तीर्थंकरों को हैं। कंदरिया महादेव मंदिर उन सभी मंदिरों में सबसे बड़ा है, जो बने हुए हैं।
मंदिर स्थापत्य:
सामान्य रूप से यहां के मंदिर बलुआ पत्थर से निर्मित किए गए हैं, लेकिन चौंसठ योगिनी, ब्रह्मा तथा ललगुआँ महादेव मंदिर ग्रेनाइट (कणाष्म) से निर्मित हैं। ये मंदिर शैव, वैष्णव तथा जैन संप्रदायों से सम्बंधित हैं। खजुराहो के मंदिरों का भूविन्यास तथा ऊर्ध्वविन्यास विशेष उल्लेखनीय है, जो मध्य भारत की स्थापत्य कला का बेहतरीन व विकसित नमूना पेश करते हैं। यहां मंदिर बिना किसी परकोटे के ऊंचे चबूतरे पर निर्मित किए गए हैं। आमतौर पर इन मंदिरों में गर्भगृह, अंतराल, मंडप तथा अर्धमंडप देखे जा सकते हैं। खजुराहो के मंदिर भारतीय स्थापत्य कला के उत्कृष्ट व विकसित नमूने हैं, यहां की प्रतिमाऐं विभिन्न भागों में विभाजित की गई हैं। जिनमें प्रमुख प्रतिमा परिवार, देवता एवं देवी-देवता, अप्सरा, विविध प्रतिमाऐं, जिनमें मिथुन (सम्भोगरत) प्रतिमाऐं भी शामिल हैं तथा पशु व व्याल प्रतिमाऐं हैं, जिनका विकसित रूप कंदारिया महादेव मंदिर में देखा जा सकता है। सभी प्रकार की प्रतिमाओं का परिमार्जित रूप यहां स्थित मंदिरों में देखा जा सकता है।यहां मंदिरों में जड़ी हुई मिथुन प्रतिमाऐं सर्वोत्तम शिल्प की परिचायक हैं, जो कि दर्शकों की भावनाओं को अत्यंत उद्वेलित व आकर्शित करती हैं और अपनी मूर्तिकला के लिए विशेष उल्लेखनीय हैं। खजुराहो की मूर्तियों की सबसे अहम और महत्त्वपूर्ण ख़ूबी यह है कि इनमें गति है, देखते रहिए तो लगता है कि शायद चल रही है या बस हिलने ही वाली है, या फिर लगता है कि शायद अभी कुछ बोलेगी, मस्कुराएगी, शर्माएगी या रूठ जाएगी। और कमाल की बात तो यह है कि ये चेहरे के भाव और शरीर की भंगिमाऐं केवल स्त्री-पुरुषों में ही नहीं बल्कि जानवरों में भी दिखाई देते हैं। कुल मिलाकर कहा जाय तो हर मूर्ति में एक अजीब सी हलचल है।
खजुराहो के प्रमुख मंदिरें:
लक्ष्मण, विश्वनाथ, कंदारिया महादेव, जगदम्बी, चित्रगुप्त, दूल्हादेव, पार्श्वनाथ, आदिनाथ, वामन, जवारी, तथा चतुर्भुज इत्यादि।
खजुराहो मंदिरों की वास्तुकला
कंदरिया महादेव मंदिर:
कंदरिया महादेव मंदिर को गंडदेव के पुत्र सम्राट विद्याधर ने बनवाया। माना जाता है कि यह मंदिर ईस्वी 1025 से 1050 के बीच में बना है। मंदिर का निर्माणकाल १००० सन् ई. है तथा इसकी लंबाई १०२', चौड़ाई ६६' और ऊँचाई १०१' है। स्थानीय मत के अनुसार इसका कंदरिया नामांकरण, भगवान शिव के एक नाम कंदर्पी के अनुसार हुआ है।कंदरिया महादेव मंदिर खजुराहो के पश्चिमी मंदिर समूह का एक प्रमुख मंदिर है। यह इस समूह के सभी मंदिरों में से सबसे बड़ा और सुंदर मंदिर है। मंदिर शिव भगवान को समर्पित है जिसके गर्भ गृह में शिवलिंग विराजमान है। यह शिवलिंग संगमरमर से बना है। मंदिर की दीवारों पर बहुत ही सुंदर नक्काशी की गई है। इस मंदिर को सामने से देखने से ऐसा लगता है, कि जैसे हम किसी गुफा में प्रवेश कर रहे हैं। गुफा को कंदरा भी कहते हैं इसलिए इस का नाम कंदरिया महादेव मंदिर पड़ा। अर्थात कंदरा में रहने वाले शिव।कंदरिया महादेव मंदिर खजुराहो के सबसे सुंदर मंदिरों में से एक है। यह मंदिर संधार शैली और सप्त रथ शैली में बना है। यह खजुराहो का सबसे विकसित मंदिर भी है। इस मंदिर में अर्ध मंडप, मंडप, महामंडप, अंतराल और गर्भ गृह हैं। गर्भ गृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ भी बना है।यह मंदिर अति विकसित शैली संयुक्त मध्य भारत में बना अपनी तरह का शानदार मंदिर है। मंदिर ऊंची जगह पर निर्मित है। जिसमें आपको दो तोरण देखने के लिए मिलते हैं। ये मुख्य प्रवेश द्वार पर और मंडप पर लगे हैं। मंदिर की दीवारों पर भी कारीगरी की गई है। मंदिर में आपको एक सुंदर शिखर भी देखने को मिलता है।
यह मंदिर खजुराहो की रचनाओं का सबसे नवीनतम और सबसे अंतिम रचना माना जाता है, जिसकी स्थापना चंदेल वंश के शासनकाल में हुई। 1000 और 1150 ईसवीं के दौरान बना यह मंदिर, खजुराहो मंदिर के अन्य मंदिरों की तरह जो पहले बनाये गए थे, की तरह अलंकृत नहीं है। मंदिर का मुख्य हॉल काफी विशाल है और यह अष्टकोण के आकार में निर्मित है। मंदिर की छत पर खूबसूरत अप्सराओं की छवियां खुदी हुई हैं। मंदिर के खम्भे और दीवारें महिलाओं की कामुक मुद्राओं और पेड़ के आसपास नाचती हुई युवतियों वाली मूर्तियों से भरी पड़ी हैं। दूल्हादेव मंदिर को खजुराहो मंदिर के स्थापत्य और मूर्तिकला महारत के अंतिम चमक के रूप में जाना जाता है।मंदिर की एक खास विशेषता यह है कि मंदिर में स्थापित पवित्र शिवलिंग की सतह पर 999 लिंगों को खोद कर दर्शाया गया है। ऐसा माना जाता है कि इस शिवलिंग की एक परिक्रमा करना 1000 परिक्रमा के बराबर होती है। शिवलिंग के अतिरिक्त इस मंदिर में अन्य देवी देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित हैं जैसे, गणेश भगवान, देवी पार्वती और देवी गंगा जी की। 'वासाला' शब्द मंदिर के कई हिस्सों में अंकित किया गया है। ऐसा माना जाता है कि यह नाम मंदिर के प्रमुख मूर्तिकार का नाम था।
![]() |
| दूल्हादेव मंदिर, खजुराहो |
चतुर्भुज मंदिर खजुराहो स्थित एक प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर दक्षिणी मंदिर समूह में स्थित है। चतुर्भुज मंदिर सेवाग्राम गांव के बाहरी क्षेत्र में स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर की बाहरी दीवार मूर्तियों से सुसज्जित है। यह मंदिर बहुत खूबसूरत लगता है। मंदिर के गर्भ गृह में विष्णु भगवान की आकर्षक प्रतिमा देखने के लिए मिलती है। यह मंदिर एक ऊंचे मंडप (चबूतरे) पर बना हुआ है, और खूबसूरत लगता है। मंदिर के बाहर से ही विष्णु भगवान की अद्भुत प्रतिमा देखने के लिए मिलती है। इस मंदिर को चतुर्भुज के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इस प्रतिमा में विष्णु भगवान के चार हाथ है। यह प्रतिमा देखने में बहुत ही आकर्षक लगती है। यह प्रतिमा खड़ी हुई मुद्रा में है और बहुत सुंदर है। इस प्रतिमा का कुछ भाग मुस्लिम शासकों के द्वारा नष्ट कर दिया गया है। मगर प्रतिमा देखने में बहुत ही आकर्षक लगती है। विष्णु भगवान की इस प्रतिमा की विशेषता यह है कि इस प्रतिमा में आप लोगों को त्रिदेव के दर्शन करने के लिए मिल जाते हैं। इस प्रतिमा में भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा जी के दर्शन करने के लिए मिल जाते हैं। यह तीनों एक ही प्रतिमा में बनाए गए हैं।
चतुर्भुज मंदिर खजुराहो के अन्य मंदिरों से छोटा है। मगर यह मंदिर बहुत खूबसूरत है और इस मंदिर में भी आपको मूर्ति कला देखने के लिए मिलती है। इस मंदिर में शिव भगवान जी की बहुत ही आकर्षक प्रतिमा देखने के लिए मिलती है। यह अर्धनारीश्वर प्रतिमा है। इस प्रतिमा के नीचे ही आपको नरसिंह भगवान की नारी रूप में प्रतिमा देखने के लिए मिलती है। यह प्रतिमा भी बहुत आकर्षक है और इस मंदिर का मुख्य आकर्षण है। इस प्रतिमा की आप बारीकी देखेंगे, तब आपको यह प्रतिमा समझ में आएगी। मगर बहुत खूबसूरत है। मंदिर की दीवारों में आपको गंधर्व एवं विद्याधरओ की प्रतिमाएं देखने के लिए मिलती है। इस मंदिर में मिथुन प्रतिमाएं देखने के लिए नहीं मिलती हैं।![]() |
| चतुर्भुज मंदिर, खजुराहो |
खजुराहो मूर्तिकला की विशेषताएं:
खजुराहो के मंदिर बहुत प्रसिद्ध है और इन मंदिरों की दीवारों पर बलुवे पत्थर से निर्मित मूर्तियां में बहुत सारे रहस्य छुपे हुए हैं। ऐसे रहस्य जो आप इन मूर्तियों को देखकर पता लगा सकते हैं। इन मूर्तियों को आप देखते हैं, तो आपको कुछ ना कुछ उस युग के बारे में पता चलता ही है। इस मंदिर में इतनी सारी मूर्तियां हैं, कि आपको एक मंदिर को देखने के लिए करीब एक से डेढ़ घंटा लग जाएगा। अगर आप इस मंदिर को बहुत ही बारीकी से देखें तो।सांस्कृतिक धरोहर के रुप में विद्यमान खजुराहो के मंदिर अपनी विशेषताओं के कारण न केवल भारत वर्ष, बल्कि संसार में विख्यात है। खजुराहो की शिल्प का विकास मूर्तियों के स्वरुप में किया गया है। मंदिरों की दीवारों के अंदर और बाहर, मूर्तियाँ इस तरह बनायी गई है कि ये आँखों का पेय बन गई है। कुछ मंदिरों में मूर्तिकारों ने मूर्तियों में भव्यता और विशालता भर दी है।
विश्वनाथ मंदिर में ६७४ मूर्तियाँ हैं, जबकि कदंरिया महादेव में ८७२ मूर्तियाँ है। वराह मंदिर में बराहदेव की मूर्ति पर हिंदू देवी- देवताओं की ६७२ मूर्तियाँ अंकित की गई है। कुछ मंदिर ऐसा है, जिसकी दीवारों पर कोई भी स्थान ऐसा नहीं है, जहाँ मूर्तियाँ न अंकित की गई है। यहाँ देवी- देवताओं, नाग- नागिनियों, नायिकाओं, अप्सराओं, पशुओं तथा मिथुन युग्मों का अनेक मुद्राओं में अंकन किया गया है। एक लय, एक गति, एक शोभा से भरी हुई, यह प्रतिमाएँ मन को मोह लेने वाली है। कहीं- कहीं देवी- देवताओं की मूर्तियों ९', लंबी और १४' ऊँची बनायी गई हैं। प्रत्येक मूर्ति का अपना सौंदर्य है। देवता, देवियाँ, अप्सराएँ, पुरुष और नारियाँ सौंदर्य के संसार में गतिमान हैं। प्रतिमाओं के शरीर की शिथिलता या यौवन के उभार पत्थरों से छलकते हुए बाहर आते दिखाई देते हैं। धर्म, संस्कृति, समाज, अर्थ और राजनीति से जुड़ी, यह प्रतिमाएँ अपने निर्माता की कहानी कहती दिखाई देती है। नारी के आभूषण हमारे कल का का आभास करते हैं। बालों के गुंथने या उनके पहरावे में कहीं मानिनी नायिका, कहीं मुग्धा, तो कहीं परकीया के मनभावन क्रिया- कलापों के दर्शन कराते हैं, तो कहीं स्नानागार से निकलकर श्रृंगार करती हुई तरुणी का आभास कराते हैं।
खजुराहो मानव संग्राहालय है या इसे स्री पुरुष प्रधान एक संस्था कहा जा सकता है। कलाकारों ने प्रकृति की छटा में सौंदर्य के साथ- साथ, उस समय के मनोरंजन और क्रीड़ाओं की ओर ध्यान दिया है। यहाँ की कलाकृतियाँ प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक आयु के व्यक्ति से संबंध जोड़ती दिखाई देती है।
खजुराहो के मंदिर धार्मिक सहिष्णुता के जीवंत प्रमाण है।
खजुराहो मानव संग्राहालय है या इसे स्री पुरुष प्रधान एक संस्था कहा जा सकता है। कलाकारों ने प्रकृति की छटा में सौंदर्य के साथ- साथ, उस समय के मनोरंजन और क्रीड़ाओं की ओर ध्यान दिया है। यहाँ की कलाकृतियाँ प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक आयु के व्यक्ति से संबंध जोड़ती दिखाई देती है।
खजुराहो के मंदिर धार्मिक सहिष्णुता के जीवंत प्रमाण है।




.jpg)



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें