गुप्त मूर्तिकला-हिंदू, बौद्ध और जैन~Gupta Sculpture-Hindu, Buddhist and Jain.
गुप्त मूर्तिकला-हिंदू, बौद्ध और जैन
Gupta Sculpture-Hindu, Buddhist and Jain
भारतीय इतिहास विभिन्न संस्कृतियों का दर्शन दिखाता है एवं मूर्तिकला भारत की विभिन्न एवं विविध संस्कृति को अपने में समाहित किये हुए है। भारतीय मूर्तिकला स्वयं में ही अद्भुत है। मूर्तिपूजा भारत की संस्कृति का एक अभिन्न अंग रहा है, अलग-अलग धर्मों से जुड़े अलग-अलग काल-खण्ड के दौरान हमें मूर्तियों का एक अलग रूप देखने को मिलता है। मूर्तियों की नक्काशी, उनकी बनावट, उनका रंग सब कुछ एक महान संस्कृति को परिलक्षित करता है। एवं भारत की ऐतिहासिक विरासत को दर्शाता है।इसी क्रम में अपने मूर्तिकला विशेषांक के अगले पड़ाव में हम गुप्तकालीन मूर्तिकला की मूर्तिकला एवं उससे जुड़ी संस्कृति का विश्लेषण करने का प्रयास करेंगे।गुप्त काल (319-550 ई.) भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग (गोल्डन पीरियड) कहलाता है। इतिहासकारों ने इसे क्लासिकल युग भी कहा है। इस युग में साहित्य और कला का विकास अप्रतिम विकास हुआ।गुप्त कला का विकास भारत में गुप्त साम्राज्य के शासनकाल में (२०० से ३२५ ईस्वी में) हुआ।इस काल की वास्तुकृतियों में मंदिर निर्माण का ऐतिहासिक महत्त्व है। बड़ी संख्या में मूर्तियों तथा मंदिरों के निर्माण द्वारा आकार लेने वाली इस कला के विकास में अनेक मौलिक तत्व देखे जा सकते हैं जिसमें विशेष यह है कि ईंटों के स्थान पर पत्थरों का प्रयोग किया गया। इस काल की वास्तुकला को सात भागों में बाँटा जा सकता है- राजप्रासाद, आवासीय गृह, गुहाएँ, मन्दिर, स्तूप, विहार तथा स्तम्भ।
चीनी यात्री फाह्यान ने अपने विवरण में गुप्त नरेशों के राजप्रासाद की बहुत प्रशंसा की है। इस समय के घरों में कई कमरे, दालान तथा आँगन होते थे। छत पर जाने के लिए सीढ़ियाँ होती थीं जिन्हें सोपान कहा जाता था। प्रकाश के लिए रोशनदान बनाये जाते थे जिन्हें वातायन कहा जाता था। गुप्तकाल में ब्राह्मण धर्म के प्राचीनतम गुहा मंदिर निर्मित हुए। ये भिलसा (मध्य-प्रदेश) के समीप उदयगिरि की पहाड़ियों में स्थित हैं। ये गुहाएँ चट्टानें काटकर निर्मित हुई थीं। उदयगिरि के अतिरिक्त अजन्ता, एलोरा, औरंगाबाद और बाघ की कुछ गुफाएँ गुप्तकालीन हैं। इस काल में मंदिरों का निर्माण ऊँचे चबूतरों पर हुआ। शुरू में मंदिरों की छतें चपटी होती थीं बाद में शिखरों का निर्माण हुआ। मंदिरों में सिंह मुख, पुष्पपत्र, गंगायमुना की मूर्तियाँ, झरोखे आदि के कारण मंदिरों में अद्भुत आकर्षण है।
गुप्तकाल में मूर्तिकला के प्रमुख केन्द्र मथुरा, सारनाथ और पाटिलपुत्र थे। गुप्तकालीन मूर्तिकला की विशेषताएँ हैं कि इन मूर्तियों में भद्रता तथा शालीनता, सरलता, आध्यात्मिकता के भावों की अभिव्यक्ति, अनुपातशीलता आदि गुणों के कारण ये मूर्तियाँ बड़ी स्वाभाविक हैं। इस काल में भारतीय कलाकारों ने अपनी एक विशिष्ट मौलिक एवं राष्ट्रीय शैली का सृजन किया था, जिसमें मूर्ति का आकार गात, केशराशि, माँसपेशियाँ, चेहरे की बनावट, प्रभामण्डल, मुद्रा, स्वाभाविकता आदि तत्त्वों को ध्यान में रखकर मूर्ति का निर्माण किया जाता था। यह भारतीय एवं राष्ट्रीय शैली थी। इस काल में निर्मित बुद्ध-मूर्तियाँ पाँच मुद्राओं में मिलती हैं- १. ध्यान मुद्रा २. भूमिस्पर्श मुद्रा ३. अभय मुद्रा ४. वरद मुद्रा ५. धर्मचक्र मुद्रा। गुप्तकाल चित्रकला का स्वर्ण युग था। कालिदास की रचनाओं में चित्रकला के विषय के अनेक प्रसंग हैं। मेघदूत में यक्ष-पत्नी के द्वारा यक्ष के भावगम्य चित्र का उल्लेख है।
गुप्तकालीन मूर्तिकला:
भारतीय कला के इतिहास में गुप्तकाल को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसका कारण यह रहा कि इस युग की कलाकृतियाँ शैली एवं संपूर्णता, सुंदरता एवं संतुलन जैसे कला तत्वों से सुसज्जित हैं। अन्य कलाओं की तरह इस काल में मूर्तिकला का भी सम्यक विकास हुआ। गुप्कालीन मूर्तिकार मूर्तिकला के मर्मज्ञ थे। उनकी मूर्तियों में गांभीर्य, कमनीयता, लालित्य व माधुर्य के दर्शन होते हैं।
गुप्त काल में सारनाथ के आस-पास एक नवीन शैली का उद्भव हुआ । इस शैली में क्रीम रंग के बलुआ पत्थर और धातु का प्रयोग किया गया था। इस शैली की मूर्तियों को विशुद्ध रूप से वस्त्र पहने हुए दिखाया गया है तथा इनमें किसी भी प्रकार की नग्नता नहीं है। इन मूर्तियों में बुद्ध के सिर के चारों ओर के आभामण्डल को गहनतापूर्वक अलंकृत रूप से प्रदर्शित किया गया है।
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| सुल्तानगंज (बिहार) की बुद्ध मूर्ति |
उदा.- सुल्तानगंज (बिहार) की बुद्ध मूर्ति। यह 7.5 फुट ऊँची है तथा इसे ताँबे से निर्मित किया गया है।
गुप्त शासक हिन्दू धर्म के पोषक थे, किंतु उन्होंने बौद्ध धर्म और जैन धर्म के लिए भी उदारता दिखायी। यद्यपि गुप्तकाल का प्रारंभिक दौर हिन्दू कला पर जोर देता है जबकि बाद का युग बौद्ध कला का शिखर युग है। दरअसल गुप्त मूर्तिकला की सफलता पूर्व मध्यकाल की प्रतीकात्मक छवि एवं कुषाण काल की कलात्मक छवि के मध्य निर्मित एवं संतुलन पर आधारित है। इस काल की मूर्तिकला में शारीरिक सौन्दर्य के स्थान पर आध्यात्मिक सौन्दर्य को प्रधानता दी गयी। जहाँ कुषाण काल में पारदर्शी वस्त्र विन्यास का प्रयोग मांसल सौन्दर्य को प्रकट करने के लिए किया जाता था, वहीं गुप्तकाल में इसका प्रयोग इसे आवृत्त करने के लिए किया जाने लगा। यही कारण है कि गुप्तकालीन मूर्तियों में आद्योपान्त आध्यात्मिकता, भद्रता एवं शालीनता दृष्टिगोचर होती है।
वैष्णव मूर्तियाँ: गुप्त धर्म से ब्राह्यण थे और उनकी भक्ति विशेष रूप से विष्णु में थी। अतः उनके समय में भगवान विष्णु की बहुसंख्यक प्रतिमाओं का निर्माण किया गया। मथुरा, देवगढ़ तथा एरण से प्राप्त मूर्तियाँ उल्लेखनीय हैं। इस काल की विष्णु मूर्तियाँ चतुर्भुजी हैं। उनके सिर पर मुकुट, गले में हार तथा कैयूर एवं कानों में कुण्डल दिखाया गया है। प्रलम्बबाहु (लटकती हुई भुजाओं वाली) मूर्ति का केवल धड़भाग ही अवशिष्ट है। यह चतुर्भुजी है, जिसमें अलंकृत मुकुट, कानों में कुण्डल, भुजाओं पर लटकती हुई वनमाला, गले में ग्रैवेयक आदि का अंकन अत्यन्त कलापूर्ण है।
वस्तुतः अवशिष्ट गुप्त मंदिर मूर्तिशिल्प की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैं। इस प्रसंग में देवगढ़ के दशावतार मंदिर का विशेष रूप से उल्लेख करना अभीष्ट होगा। इस मंदिर की दीवार पर शेषनाग की शैय्या पर विश्राम करते हुए विष्णु का अंकन है। उनकी नाभि से निकलते हुए कमल पर ब्रह्य, ऊपर आकाश में नन्दी पर सवार शिव-पार्वती, मयूर पर कार्तिकेय तथा ऐरावत पर इन्द्र को दिखाया गया है। बैठी हुई लक्ष्मी विष्णु का पैर दबा रही हैं। विष्णु के इस रूप को अनन्तशायी अथवा शेषशायी कहा गया है। कनिंघम के शब्दों में, मूर्तियों का चित्रंकन सामान्यतः ओजपूर्ण है तथा अनन्तशायी विष्णु का रेखांकन तो न केवल सहज, अपितु मनोहर और मुद्रा गौरवपूर्ण है।
गुप्त शासक हिन्दू धर्म के पोषक थे, किंतु उन्होंने बौद्ध धर्म और जैन धर्म के लिए भी उदारता दिखायी। यद्यपि गुप्तकाल का प्रारंभिक दौर हिन्दू कला पर जोर देता है जबकि बाद का युग बौद्ध कला का शिखर युग है। दरअसल गुप्त मूर्तिकला की सफलता पूर्व मध्यकाल की प्रतीकात्मक छवि एवं कुषाण काल की कलात्मक छवि के मध्य निर्मित एवं संतुलन पर आधारित है। इस काल की मूर्तिकला में शारीरिक सौन्दर्य के स्थान पर आध्यात्मिक सौन्दर्य को प्रधानता दी गयी। जहाँ कुषाण काल में पारदर्शी वस्त्र विन्यास का प्रयोग मांसल सौन्दर्य को प्रकट करने के लिए किया जाता था, वहीं गुप्तकाल में इसका प्रयोग इसे आवृत्त करने के लिए किया जाने लगा। यही कारण है कि गुप्तकालीन मूर्तियों में आद्योपान्त आध्यात्मिकता, भद्रता एवं शालीनता दृष्टिगोचर होती है।
वैष्णव मूर्तियाँ: गुप्त धर्म से ब्राह्यण थे और उनकी भक्ति विशेष रूप से विष्णु में थी। अतः उनके समय में भगवान विष्णु की बहुसंख्यक प्रतिमाओं का निर्माण किया गया। मथुरा, देवगढ़ तथा एरण से प्राप्त मूर्तियाँ उल्लेखनीय हैं। इस काल की विष्णु मूर्तियाँ चतुर्भुजी हैं। उनके सिर पर मुकुट, गले में हार तथा कैयूर एवं कानों में कुण्डल दिखाया गया है। प्रलम्बबाहु (लटकती हुई भुजाओं वाली) मूर्ति का केवल धड़भाग ही अवशिष्ट है। यह चतुर्भुजी है, जिसमें अलंकृत मुकुट, कानों में कुण्डल, भुजाओं पर लटकती हुई वनमाला, गले में ग्रैवेयक आदि का अंकन अत्यन्त कलापूर्ण है।
वस्तुतः अवशिष्ट गुप्त मंदिर मूर्तिशिल्प की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैं। इस प्रसंग में देवगढ़ के दशावतार मंदिर का विशेष रूप से उल्लेख करना अभीष्ट होगा। इस मंदिर की दीवार पर शेषनाग की शैय्या पर विश्राम करते हुए विष्णु का अंकन है। उनकी नाभि से निकलते हुए कमल पर ब्रह्य, ऊपर आकाश में नन्दी पर सवार शिव-पार्वती, मयूर पर कार्तिकेय तथा ऐरावत पर इन्द्र को दिखाया गया है। बैठी हुई लक्ष्मी विष्णु का पैर दबा रही हैं। विष्णु के इस रूप को अनन्तशायी अथवा शेषशायी कहा गया है। कनिंघम के शब्दों में, मूर्तियों का चित्रंकन सामान्यतः ओजपूर्ण है तथा अनन्तशायी विष्णु का रेखांकन तो न केवल सहज, अपितु मनोहर और मुद्रा गौरवपूर्ण है।
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| देवगढ़ के दशावतार मंदिर |
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| उदयगिरि की गुफा नंबर 5 |
शिवलिंग मूर्तियाँ: विष्णु के अतिरिक्त इस काल की बनी शैव मूर्तियाँ, लिंग तथा मानवीय दोनों रूपों में ही मिलती हैं। लिंग में ही शिव के एक अथवा चार मुख बना दिए गये हैं। इस प्रकार के लिंग मथुरा, भीटा, कौशाम्बी, करमदण्डा, खोह, भूमरा आदि स्थानों से मिले हैं। इन मूर्तियों को ‘मुखलिंग’ कहा जाता है। इनमें शिव के सिर पर जटा-जूट, गले में रूद्राक्ष की माला तथा कानों में कुण्डल है। ध्यानावस्थित शिव के नेत्र अधखुले हैं तथा उनके होठों पर मन्द मुस्कान है। जटा-जूट के ऊपर अर्धचन्द्र विराजमान है। इन मुखलिंगों की रचना आकर्षक एवं कलापूर्ण है। शिव के अर्द्धनारीश्वर स्वरूप की मूर्तियों का निर्माण सर्वप्रथम इसी काल में हुआ। अर्द्धनारीश्वर रूप की दो मूर्तियाँ मथुरा संग्रालय में सुरक्षित हैं।
बुद्ध मूर्तियाँ: गुप्तकालीन मूर्तिशिल्प में बुद्ध धर्म का शांति आदर्श अत्यंत भव्यता से बुद्ध की मूर्तियों में अभिव्यक्त हुआ है। उनके चेहरे की भाव मुद्रा और मुस्कान उस परम समरसता की अनुभूति को दर्शाती है, जिसे उस महाज्ञानी ने प्राप्त किया था। इन मूर्तियों के शिल्प की हर रेखा में सौन्दर्य और भाव का परम्परागत स्वरूप दिखाया गया है। बुद्ध की मूर्तियाँ मथुरा और सारनाथ से मिली हैं।
बौद्ध मूर्तियाँ अभय, वरद, ध्यान, भूमिस्पर्श, धर्मचक्रप्रवर्तन आदि मुद्राओं में हैं। इनमें सारनाथ की दृष्टि मूर्ति अत्यधिक आकर्षक है। इसमें बुद्ध पद्मासन में विराजमान हैं तथा उनके सिर पर अलंकृत प्रभामण्डल है। उनके बाल घुंघराले तथा कान लम्बे हैं। उनकी दृष्टि नासिका के अग्रभाग पर टिकी है। यह धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा में है। वस्तुतः कलाकारों को बुद्ध के शांत तथा निःस्पृह भाव को व्यक्त करने में अद्भुत सफलता मिली है।
पाषाण के अतिरिक्त इस काल में धातुओं से भी बुद्ध मूर्तियाँ बनायी गयीं। गुप्तकाल की अनेक काँसे और तांबे की आकृतियाँ उपलब्ध हैं, जिनमें से अधिकांश बौद्ध हैं। इनमें सुल्तानगंज (बिहार) की मूर्ति विशेषरूप से उल्लेखनीय है। सुल्तानगंज से प्राप्त बुद्ध की प्रतिमा लगभग साढ़े सात फुट ऊँची है जो अब बरमिंघम के संग्रहालय में सुरक्षित है। ताम्रनिर्मित इस मूर्ति में है। संघाटि का घेरा पैरों तक लटक रहा है। यह मूर्ति भी अत्यंत सजीव तथा प्रभावशाली है। यह एक सुंदर आकृति है जो पारदर्शक अँगरखा पहने है।
बुद्ध मूर्तियाँ: गुप्तकालीन मूर्तिशिल्प में बुद्ध धर्म का शांति आदर्श अत्यंत भव्यता से बुद्ध की मूर्तियों में अभिव्यक्त हुआ है। उनके चेहरे की भाव मुद्रा और मुस्कान उस परम समरसता की अनुभूति को दर्शाती है, जिसे उस महाज्ञानी ने प्राप्त किया था। इन मूर्तियों के शिल्प की हर रेखा में सौन्दर्य और भाव का परम्परागत स्वरूप दिखाया गया है। बुद्ध की मूर्तियाँ मथुरा और सारनाथ से मिली हैं।
बौद्ध मूर्तियाँ अभय, वरद, ध्यान, भूमिस्पर्श, धर्मचक्रप्रवर्तन आदि मुद्राओं में हैं। इनमें सारनाथ की दृष्टि मूर्ति अत्यधिक आकर्षक है। इसमें बुद्ध पद्मासन में विराजमान हैं तथा उनके सिर पर अलंकृत प्रभामण्डल है। उनके बाल घुंघराले तथा कान लम्बे हैं। उनकी दृष्टि नासिका के अग्रभाग पर टिकी है। यह धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा में है। वस्तुतः कलाकारों को बुद्ध के शांत तथा निःस्पृह भाव को व्यक्त करने में अद्भुत सफलता मिली है।
पाषाण के अतिरिक्त इस काल में धातुओं से भी बुद्ध मूर्तियाँ बनायी गयीं। गुप्तकाल की अनेक काँसे और तांबे की आकृतियाँ उपलब्ध हैं, जिनमें से अधिकांश बौद्ध हैं। इनमें सुल्तानगंज (बिहार) की मूर्ति विशेषरूप से उल्लेखनीय है। सुल्तानगंज से प्राप्त बुद्ध की प्रतिमा लगभग साढ़े सात फुट ऊँची है जो अब बरमिंघम के संग्रहालय में सुरक्षित है। ताम्रनिर्मित इस मूर्ति में है। संघाटि का घेरा पैरों तक लटक रहा है। यह मूर्ति भी अत्यंत सजीव तथा प्रभावशाली है। यह एक सुंदर आकृति है जो पारदर्शक अँगरखा पहने है।
गुप्तकालीन मूर्तिकला की विशेषता:
अजंता की गुफाएँ- अजंता, महाराष्ट्र के औरंगाबाद के पास वघोरा नदी के किनारे सहयाद्री पर्वतमाला पर चट्टानों को काटकर बनायी गयी गुफाओं की श्रृंखला है। इसमें कुल 29 गुफाएँ हैं, जिनमें से 25 का प्रयोग विहार या आवासीय स्थल के रूप में किया जाता था। शेष 4 गुफाओं का प्रयोग चैत्य या प्रार्थना स्थल के रूप में किया जाता है। अजंता की इन गुफाओं का निर्माण लगभग 200 ईसा पूर्व से लेकर 650 ईसवी के मध्य हुआ था। अजंता की गुफाओं में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा वाकाटक राजाओं के संरक्षण में चित्रकारी की गयी थी। इन राजाओं में प्रमुख राजा हरिसेन थे। अजंता की गुफाओं की दीवारों में चित्रकारी के लिए फ्रेस्को चित्रकारी तकनीक का प्रयोग किया गया था और ये प्रकृतिवाद से विशेष रूप से संबद्ध थे। इन चित्रों के लिए स्थानीय वनस्पति और खनिजों से रंग प्राप्त किये गये थे। इन चित्रों की समस्त रूपरेखा लाल रंग से बनायी गयी है। चित्रों के अंदर अन्य रंग भरे गये हैं। इन चित्रों की प्रमुख विशेषता नीले रंग की अनुपस्थिति है। अजंता की गुफाओं में गुफा न. 16 मरणासन्न राजकुमारी गुप्त काल की वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। अजंता की गुफाएँ मुख्य रूप से बौद्ध वाद से संबद्ध है। इन गुफाओं की चित्रकारी में महात्मा बुद्ध के जीवन एवं जातक कथाओं को दिखाया गया है। इन 29 गुफाओं में से 5 गुफाएँ हीनयान अवस्था मे एवं शेष 24 गुफाएँ महायान अवस्था में निर्मित की गयी हैं। अजंता की गुफाओं के बारे में चीनी बौद्ध यात्रियों फाह्यान और ह्वेनसांग के यात्रा विवरणों से जानकारी प्राप्त की जा सकती है।- गुप्त काल को रॉक कट गुफाओं के लिए भी जाना जाता था। एलोरा की गुफाओं की मूर्तियां, एलिफेंटा की गुफाओं की मूर्तियां और अजंता की गुफाएं देखने लायक हैं। पूर्ण रूप से आरंभिक गुप्त शैली में गुप्तकालीन मूर्तियों के सबसे पुराने नमूने मध्य प्रदेश राज्य के विदिशा और उदयगिरि गुफाओं के हैं, जो पास में मौजूद हैं। इसका निर्माण 4 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मथुरा परंपरा में किया गया था।
- गुप्त मूर्तिकला में तीनों धर्मों (बौद्ध, जैन, ब्राह्मण-हिन्दू धर्म) के अलावा गैर-धार्मिक विषयों की भी मूर्तियाँ बनाई गई हैं।
- सारनाथ, मथुरा और पाटलिपुत्र गुप्तकालीन मूर्तिकला के प्रमुख केन्द्र थे।
- गुप्तकालीन मूर्तियों की निर्मलता, अंग सौंदर्य, वास्तविक हाव-भाव एवं जीवंतता ने कला को ऊँचाई प्रदान की।
- सारनाथ से प्राप्त धर्म चक्र प्रवर्तन मुद्रा तथा सुल्तानगंज (बिहार) से प्राप्त 7.5 फीट ऊँची, 12 टन वज़नी बुद्ध की ताम्रमूर्ति अतिविशिष्ट हैं।
- गुप्तकाल में जैन धर्म पर हिन्दू प्रभाव बढ़ रहा था, इसलिये तीर्थंकर के बगल में इन्द्र, सूर्य, कुबेर आदि की मूर्तियाँ बनने लगीं।
- गुप्तकालीन जैन धर्म के अंतर्गत विशालकाय बाहुबली की मूर्तियाँ बननी शुरू हो गईं।
- गुप्तकाल में दशावतार की मान्यता आई। अत: इस दौर में सर्वाधिक मूर्तियाँ ब्राह्मण-हिन्दू धर्म से संबंधित ही बनीं।
- एलोरा (दशावतार मूर्तियाँ), खजुराहो, देवगढ़, आदि जगहों पर विष्णु के 10 अवतारों को मूर्त रूप दिया गया है। इनमें देवगढ़ की शेषसायी विष्णु मूर्ति प्रसिद्ध है।
- ढाका से प्राप्त मत्स्यावतार और कच्छपावतार मूर्ति, उदयगिरि की गुफा से प्राप्त मूर्ति, भूमरा (राजस्थान) से प्राप्त नर-नारायण और कृष्ण की रास-लीला मूर्ति, भिलसा के मंदिर से प्राप्त वाराह अवतार की मूर्ति तथा एलिपेंटा से प्राप्त विख्यात त्रिमूर्ति गुप्तकालीन मूर्तिकला की विशिष्टता के प्रमाण हैं।
- भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध मूर्ति (सारनाथ), 11 मानुषी बुद्ध मूर्ति (एलोरा) तथा बुद्ध के प्रथम उपदेश का चित्रण भी गुप्तकालीन मूर्तिकला के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं।
- हिन्दुकुश पर्वत शृंखला की बामियान घाटी (अफगानिस्तान) में ‘सिल्क रूट’ पर पहाड़ को काटकर बुद्ध की दो भव्य प्रतिमाएँ 6वीं-7वीं सदी में बनाई गईं जो गांधार कला का शीर्षस्थ नमूना था। इसे कट्टरपंथी तालिबान शासन ने मार्च 2001 में ध्वस्त कर दिया।
अजंता की गुफाओं की कुछ प्रमुख मूतियाँ नि. लि. हैं-
1. गुफा सं. 26 बुद्ध का महापरिनिर्वाण
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| अजंता गुफा सं. 26~बुद्ध का महापरिनिर्वाण |
2. गुफा स. 19 राजा नाग एवं उनकी पत्नी
चित्रकारी के तरीके- अजंता की गुफाओं में चित्रकारी करने के लिए तीन चरणीय तकनीक, फ्रेस्को विधि का प्रयोग किया जाता था। इसके प्रमुख तीन चरण निम्नलिखित हैं-
1. सर्वप्रथम गुफाओं की चट्टानों पर गोबर तथा धान की भूसी से मिश्रित गीली मिट्टी की परत को लगाया जाता है।
2. इसके ऊपर चूने का प्लास्टर का लेप चढ़ाया जाता है।
3. नम या गीली सतह पर रंग या रंजकों का प्रयोग किया जाता है। ये रंग रिस कर अंदर चले जाते हैं। इससे सतह दीर्घकालिक भित्ति चित्रों का निर्माण हो जाता है।
गुफा संख्या 1-12 बौद्ध शैली
गुफा संख्या 13-23 ब्राह्मणीय शैली
गुफा संख्या 30-34 जैन शैली (दिगंबर समुदाय)
एलोरा की गुफाओं में बौद्ध और ब्राह्मणीय शैली की गुफाओं का निर्माण राष्ट्रकूट शासकों के संरक्षण में किया गया था। जैन शैली की गुफाओं का निर्माण यादव राजवंशों के संरक्षण में किया गया था। ये गुफाएँ अजंता की गुफाओं की तुलना में अधिक नवीन है।
चित्रकारी के तरीके- अजंता की गुफाओं में चित्रकारी करने के लिए तीन चरणीय तकनीक, फ्रेस्को विधि का प्रयोग किया जाता था। इसके प्रमुख तीन चरण निम्नलिखित हैं-
1. सर्वप्रथम गुफाओं की चट्टानों पर गोबर तथा धान की भूसी से मिश्रित गीली मिट्टी की परत को लगाया जाता है।
2. इसके ऊपर चूने का प्लास्टर का लेप चढ़ाया जाता है।
3. नम या गीली सतह पर रंग या रंजकों का प्रयोग किया जाता है। ये रंग रिस कर अंदर चले जाते हैं। इससे सतह दीर्घकालिक भित्ति चित्रों का निर्माण हो जाता है।
फ्रेस्को- यह भित्ति चित्रों के निर्माण की प्रमुख विधि है। इसके अंतर्गत नम या गीली सतह पर प्लास्टर चढ़ाकर चित्रकारी की जाती है। यह इतालवी पुनर्जागरण चित्रकारी से निकटता से संबंधित है।
उदाहरण- मरणासन्न राजकुमारी, उड़ती हुई अप्सराएँ आदि।
ऐलोरा की गुफाएँ- यह गुप्त काल की वास्तुकला का एक और उत्कृष्ट उदाहरण है। यह अजंता की गुफाओं से 100 किलो मीटर की दूरी पर स्थित है। ये गुफाएँ 34 गुफाओं का समूह है। इनमें से 17 गुफाएँ बाह्मणीय शैली, 12 गुफाएँ बौद्ध शैली एवं 5 गुफाएँ जैन शैली से निर्मित की गयी थीं। 5 वीं से 11वीं शताब्दी ईसवी के मध्य निर्मित इन गुफाओं का निर्माण विदर्भ, कर्नाटक और तमिलनाडु के शिल्पी संघों द्वारा किया गया था। इस कारण ये गुफाएँ कथानक और शिल्पनिर्माण तथा वास्तुशास्त्रीय पद्धति की दृष्टि से स्वाभाविक विविधता प्रदर्शित करती हैं। ये गुफाएँ वास्तुशास्त्रीय शैली और प्रदर्शन कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन गुफाओं में-उदाहरण- मरणासन्न राजकुमारी, उड़ती हुई अप्सराएँ आदि।
गुफा संख्या 1-12 बौद्ध शैली
गुफा संख्या 13-23 ब्राह्मणीय शैली
गुफा संख्या 30-34 जैन शैली (दिगंबर समुदाय)
एलोरा की गुफाओं में बौद्ध और ब्राह्मणीय शैली की गुफाओं का निर्माण राष्ट्रकूट शासकों के संरक्षण में किया गया था। जैन शैली की गुफाओं का निर्माण यादव राजवंशों के संरक्षण में किया गया था। ये गुफाएँ अजंता की गुफाओं की तुलना में अधिक नवीन है।
ऐलोरा की कुछ प्रमुख गुफाएँ निम्नलिखित हैं-
1. गुफा संख्या 10 विश्वकर्मा की गुफा (बढ़ई की गुफा) के नाम से जाती है। इस गुफा की दीवार में बुद्ध को धर्मचक्र मुद्रा में विराजमान दिखाया गया है तथा उनकी पीठ पर बोधिवृक्ष उकेरा गया है।
2. गुफा संख्या 14 'रावण की खाई' विषय पर आधारित है।
1. गुफा संख्या 10 विश्वकर्मा की गुफा (बढ़ई की गुफा) के नाम से जाती है। इस गुफा की दीवार में बुद्ध को धर्मचक्र मुद्रा में विराजमान दिखाया गया है तथा उनकी पीठ पर बोधिवृक्ष उकेरा गया है।
2. गुफा संख्या 14 'रावण की खाई' विषय पर आधारित है।
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| ऐलोरा गुफा संख्या 14 ~रावण की खाई |
3. गुफा संख्या 15 में दशावतार मंदिर है।
4. गुफा संख्या 16 में कैलाश मंदिर है। यह भगवान शिव को समर्पित है। इस गुफा का निर्माण राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम के संरक्षण में किया गया था। इसे एक चट्टान को काटकर बनाया गया था। इसमें एक आँगन भी है। कैलाश मंदिर की एक दीवार पर मूर्ति बनायी गयी है। जिसमें रावण को कैलाश पर्वत को हिलाते/उठाते हुए दिखाया गया है। यह भारतीय मूर्तिकला के उत्कृष्ट उदाहरणों में से एक है।
5. गुफा संख्या 29 धूमर लेना के नाम से प्रसिद्ध है।
6. गुफा संख्या 21 रोमेश्वरम् मंदिर है।
7. जैन धर्म की प्रसिद्ध गुफाएँ इन्द्र सभा (गुफा 32) और जगन्नाथ सभा (गुफा 33) हैं।
बाघ की गुफाएँ- ये मध्य प्रदेश में बाघिनी नदी के तट पर स्थित 5वीं-6वीं शताब्दी में निर्मित 9 बौद्ध गुफाओं का समूह है। ये वास्तुशास्त्रीय रूप में अजंता की गुफाओं के समान है। यहाँ की प्रमुख गुफा 'रंग महल' है। इन गुफाओं की दीवारों पर निर्मित पेंटिंग आध्यात्मवादी के स्थान पर अधिक भौतिकवादी हैं।4. गुफा संख्या 16 में कैलाश मंदिर है। यह भगवान शिव को समर्पित है। इस गुफा का निर्माण राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम के संरक्षण में किया गया था। इसे एक चट्टान को काटकर बनाया गया था। इसमें एक आँगन भी है। कैलाश मंदिर की एक दीवार पर मूर्ति बनायी गयी है। जिसमें रावण को कैलाश पर्वत को हिलाते/उठाते हुए दिखाया गया है। यह भारतीय मूर्तिकला के उत्कृष्ट उदाहरणों में से एक है।
5. गुफा संख्या 29 धूमर लेना के नाम से प्रसिद्ध है।
6. गुफा संख्या 21 रोमेश्वरम् मंदिर है।
7. जैन धर्म की प्रसिद्ध गुफाएँ इन्द्र सभा (गुफा 32) और जगन्नाथ सभा (गुफा 33) हैं।
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| बाघ की गुफा~बुद्ध और बोधिसत्व मूर्तियाँ |
जूनागढ़ की गुफाएँ- ये गुजरात के जूनागढ़ में स्थित बौद्ध धर्म से संबद्ध गुफाएँ है। वास्तव में ये गुफाएँ नहीं हैं। यहाँ पर तीन भिन्न स्थल पाये गये हैं-
1. खपरा कोड़िया
2. बाला प्यारे
3. ऊपर कोट
इन गुफाओं की एक अद्वितीय विशेषता प्रार्थना स्थलों के सामने 30-35 फुट ऊँचे नगर दुर्ग की उपस्थिति है। इसे ऊपर कोट के नाम से जाना जाता है।
मंडपेश्वर की गुफाएँ- ये गुफाएँ मुंबई के निकट बोरिवली में स्थित हैं। इन्हें मोंटपेरिर के नाम से जाना जाता है। उत्तरवर्ती गुप्तकाल में इसे ब्राह्मण गुफा बनाया गया था। किन्तु बाद में इसे इसाई गुफा के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। इस गुफा से प्राप्त अवशेषों में प्रमुख मूर्तियाँ नटराज, सदा शिव और अर्द्धनारीश्वर की हैं। चर्च एवं उसकी समाधि पूर्ववर्ती भाग शिल्पों के ऊपर बनाया गया है।2. बाला प्यारे
3. ऊपर कोट
इन गुफाओं की एक अद्वितीय विशेषता प्रार्थना स्थलों के सामने 30-35 फुट ऊँचे नगर दुर्ग की उपस्थिति है। इसे ऊपर कोट के नाम से जाना जाता है।
उदयगिरी की गुफाएँ- ये गुफाएँ उड़ीसा की उदयगिरी-खण्डगिरी की गुफाएँ नहीं है। ये मध्य प्रदेश के विदिशा में स्थित है। इनका निर्माण गुप्त शासक चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा पाँचवी शताब्दी ईसवी के आरंभ में किया था। ये गुफाएँ अपनी दीवारों पर निर्मित मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है। वराह या विष्णु के सूअर अवतार की मूर्ति यहाँ की महत्वपूर्ण मूर्ति है। यहाँ की मूर्तियाँ हिन्दु धर्म की आरंभिक मूर्तियाँ हैं। यहाँ पर शिव, नरसिंह (अर्द्धनर, अर्द्धसिंह), नारायण (विश्राम करते हुए विष्णु ) और स्कंद को समर्पित गुफाएँ हैं।






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