राजस्थानी चित्रकला-मेवाड़, बूंदी, कोटा, किशनगढ़, जोधपुर, जयपुर, बीकानेर, नाथद्वारा, मालवा~Rajasthani Painting –Mewar, Bundi, Kota, Kishangarh, Jodhpur, Jaipur, Bikaner, Nathadwara, Malwa.

 राजस्थानी चित्रकला-मेवाड़, बूंदी, कोटा, किशनगढ़, जोधपुर, जयपुर, बीकानेर, नाथद्वारा, मालवा

Rajasthani Painting –Mewar, Bundi, Kota, Kishangarh, Jodhpur, Jaipur, Bikaner, Nathadwara, Malwa.

राजस्थानी चित्रकला की शुरुआत 15वीं से 16वीं सदी के मध्य हुई थी। राजस्थान की वास्तुकला के अलावा, राजस्थान की दृश्य कला के सबसे उल्लेखनीय रूप मध्यकालीन युग में हिंदू और जैन मंदिरों पर स्थापत्य मूर्तिकला, धार्मिक ग्रंथों के चित्रण में, मध्ययुगीन काल के अंत में और मुगल के बाद की लघु पेंटिंग हैं। प्रारंभिक आधुनिक काल में, जहां विभिन्न विभिन्न दरबारी विद्यालयों का विकास हुआ, जिन्हें एक साथ राजपूत चित्रकला के रूप में जाना जाता है। दोनों ही मामलों में, राजस्थानी कला में गुजरात के पड़ोसी क्षेत्र की कई समानताएं थीं, दोनों "पश्चिमी भारत" के अधिकांश क्षेत्र का निर्माण करते हैं, जहां कलात्मक शैली अक्सर एक साथ विकसित होती है।
धीरे-धीरे यह बात प्रमाणित होती गई कि राजस्थानी शैली को राजपूत शैली में समावेशित नहीं किया जा सकता वरण इसके अन्तर्गत अनेक शैलियों का समन्वय किया जा सकता है। धीरे-धीरे राजस्थानी चित्रकला की एक शैली के बाद दूसरी शैली अपने कुछ क्षेत्रीय प्रभावों व उनपर मुगलों के आंशिक प्रभावों को लिए, स्वतंत्र रुप से अपना पहचान बनाने में सफल हो गयी। इनको हम विभिन्न नामों जैसे मेवाड़ शैली, मारवाड़ शैली, बूंदी शैली, किशानगढ़ शैली, जयपुर शैली, अलवर शैली, कोटा शैली, बीकानेर शैली, नाथ द्वारा शैली आदि के रुप में जाना जाता है।

राजस्थान में चित्रकला की 4 स्कूले हैं:
  • मेवाड़- उदयपुर, देवगढ़, चावण्ड़, नाथद्वारा उपशैलियों का सम्बन्ध मेवाड़ स्कूल से हैं।
  • मारवाड़- जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, अजमेर, नागौर, किशनगढ़ उपशैलियों का सम्बन्ध मारवाड़ स्कूल से हैं।
  • हाड़ौती- कोटा, बूँदी, झालावाड़ उपशैलियों का सम्बन्ध से हैं।
  • ढ़ूंढ़ाड- आमेर, उणियारा (टोंक), अलवर, करौली, शेखावाटी उपशैलियों का सम्बन्ध ढूंढ़ाड़ स्कूल से हैं।

राजस्थान की चित्रकला की विशेषताएं:
  • चटकीले रंगों का प्रयोग
  • नारी सौंदर्य
  • लोक कथाओं का चित्रण
  • भावों की प्रधानता

बूंदी शैली:

राव उम्मेदसिंह बूंदी शैली राजस्थान की विचारधारा का प्रारंभिक केंद्र था राव उम्मेदसिंह के समय बूंदी शैली का सर्वाधिक विकास हुआ। इस शैली का राव उम्मेदसिंह द्वारा जंगली सूअर का शिकार करते हुए एक चित्र प्रसिद्ध है जिसका निर्माण 1750 ई में हुआ। इस शैली में शिकार के चित्र हरे रंग में बनाये गये है।
प्रमुख चित्र – पशु-पक्षी के चित्र, फल-फूलों के चित्र, रागमाला (सर्वाधिक प्रमुख चित्र), दरबार, घुड़दौड़, हाथियों की लड़ाई, बसंत रागिनी, बारहमासा, वासुकसज्जा नायिका।
पुरुष आकृति – पतला शरीर, बड़ी मूछें, झुकी पगड़ी।
स्त्री आकृति -आम के पत्तों जैसी आँखे, लाल चुनरी, लम्बी बाहें।
बूंदी शाली में लाल व पीले रंगों का प्रयोग सर्वाधिक किया गया है।
इस शैली में प्रमुखत: खजूर के वृक्ष को चित्रित किया गया है।
वर्षा में नाचता हुआ मोर राजस्थान की विशेषता है तथा यह क्षेत्र इसके लिए प्रसिद्ध है।
बूंदी शैली मुख्यतः मेवाड़ शैली से प्रभावित थी।
प्रमुख चित्रकार – राजा रामसिंह, राव गोपीनाथ, छत्रसाल और बिशनसिंह आदि ने बूंदी शैली को विशेष प्रोत्साहन दिया
बूंदी शैली में मुख्यतः बत्तख, हिरण व शेर जैसे पशुओं को चित्रित किया गया है।

बूंदी शैली

कोटा शैली (हाड़ोती शैली):

महारावल रामसिंह व राजा उम्मेदसिंह कोटा शैली के आश्रयदाता थे।
रामसिंह ने कोटा शैली को स्वतंत्र अस्तित्व प्रदान किया।
प्रमुख चित्र – कृष्ण लीला, राग-रागिनियाँ, बारहमासा, दरबारी दृश्य, आखेट दृश्य
प्रमुख चित्रकार – गोविन्दराम, डालूराम, लच्छीराम, नूर मोहम्मद।
कोटा शैली में प्रमुखत: पशु-पक्षी में शेर व बत्तख का चित्रण मिलता है।
कोटा शैली का सर्वाधिक सर्वश्रेष्ठ उदाहरण ‘आखेट दृश्य’ है।
कोटा शैली में मुख्यतः नीले रंग की प्रधानता है।
कोटा शैली में मुख्यतः खजूर के वृक्ष को दर्शाया है।
कोटा शैली पर वल्लभ सम्प्रदाय का प्रभाव देखने को मिलता है।
महाराव रामसिंघ के समय बूंदी शैली से स्वतंत्र कोटा शैली का उद्भव हुआ।

हाड़ोती शैली

किशनगढ़ शैली:

किशनगढ़ शैली को प्रकाश में लाने का श्रेय एरिक डिक्सन व डॉ. फैयाज अली को जाता है। एरिक डिक्सन व कार्ल खंडालवाड़ा की अंग्रेजी पुस्तकों में किशनगढ़ शैली के चित्रों के सम्मोहन और उनकी शैलीगत विशिष्टताओं को विश्लेषित किया गया है।
पुरुष आकृति – समुन्नत ललाट, पतले अधर, लम्बी आजानुबाहें, छरहरे पुरुष, लम्बी ग्रीवा, मादक भाव से युक्त नृत्य, नुकीली चिबुक, कमर में दुपट्टा, पेंच बंधी पगड़ी, लम्बा जामा
स्त्री आकृति – लम्बी नाक, पंखुड़ियों के समान अधर, लम्बे बाल, लम्बी व सुराहीदार ग्रीवा, पतली भृकुटी (बत्तख, हंस, सारस, बगुला) के चित्र
किशनगढ़ शैली में गुलाबी व सफेद रंग की प्रधानता है, इस शैली में मुख्यतः केले के वृक्ष को चित्रित किया गया है।

किशनगढ़ शैली

जोधपुर शैली:

इस शैली पर मुगल शैली का प्रभाव हैं, जसवंत सिंह प्रथम का इस शैली का स्वर्णकाल काल रहा है।
इस शैली में चित्र राजकीय विषय के ऊपर बनाये गये है। इस शैली में अजंता शैली की परम्परा का निर्वाह किया गया है। मारवाड शैली के पूर्ण विकास का काल 16 वीं से 17 वीं सदी रहा है। यह शैली बाद में मुग़ल शैली सेइतनी से इतना प्रभावित हुई की अपनी सत्ता भी खो दी। मुग़ल शैली के प्रभाव के कारण इसमें विलासिता पूर्ण चित्र भी बनाये गये। यह शैली अंत में सामाजिक जीवन के प्रभाव में भी आई।
राव मालदेव (1531 से 1562 ई.)
मारवाड़ की कला एवं संस्कृति का सम्पूर्ण श्रेय राव मालदेव को ही जाता है, इससे पूर्व यह शैली मेवाड़ से पूर्णत: प्रभावित थी।
राव मालदेव समय चोखेलाव महल में मार्शल जैसे चित्र बनाये गये। जिसमे बल्लियों पर राम-रावण युद्ध के बारे में चित्रण किया गया जिसका मूल उद्देश्य पौराणिक गाथाओं का यशोगान करना था।
इनके समय मारवाड़ एक स्वतंत्र चित्र शैली के रूप में उभरा
चित्रकार – नारायण दास, शिवदास, अमरदास, किशन दास, देवदास भाटी, वीरजी,रतनजी भाटी।
विषय – ढोल मारु, नाथ चरित्र, सूरसागर, रागमाला सैट, पंचतंत्र, कामसूत्र।
प्रमुख रंग – पीला
विशेष – आकाश को सर्पिला कार व् लहरिया दार तरंगित बादलों के रूप में प्रदर्शित किया।

जोधपुर शैली

जयपुर (ढूंढाड़) शैली:

मछली के समान व मादक नेत्रों वाले स्त्री चित्र, कमर तक फैले बाल
इस शैली में हरे रंग की प्रधानता है।
प्रमुख चित्रकार – साहिबराम, सालिगराम, लक्ष्मण राम, साहिबराम
साहिबराम ने महाराजा ईश्वरसिंह का आदमकद चित्र बनाया।
शिवनारायण जी – तेल चित्र बनाने वाले प्रसिद्ध कलाकार
प्रमुख चित्र – बिहारी सतसई, गोवर्धन धारण, टोडी रागिनी, कृष्ण लीला, साधारण जन-जीवन, रास मण्डल, महाभारत, रामायण, महाराजा सवाई जगतसिंह की हवेली का भित्ति चित्र ,पुण्डरीक जी की हवेली का भित्ति चित्र।
जयपुर शैली में मुख्यतः पीपल के वृक्ष को दर्शाया गया है।
जयपुर शैली में पक्षी में मोर की अधिक प्रधानता है।

जयपुर (ढूंढाड़) शैली

बीकानेर शैली:

प्रमुख चित्र – कृष्ण लीला, भागवत गीता, भागवत पुराण, रागमाला , बारहमासा, रसिक प्रिया, रागरागिनी, शिकार महफ़िल, सामंती वैभव के दृश्य
पुरुष आकृति – दाढ़ी-मूंछों युक्त वीरता का भाव दिखाती हुई उग्र आकृति, बड़ी पगड़ी, फैला हुआ जामा, पीठ पर ढाल व हाथ में भाला लिए हुए।
स्त्री आकृति – इकहरी तन्वंगी नायिका, धनुषाकार भृकुटी, लम्बी नाक, उन्नत ग्रीवा एवं पतले अधर, तंग चोली, घेरदार घाघरा, मोतियों के आभूषण व पारदर्शी ओढ़नी
उस्ता कला – बीकानेर शैली के उद्भव का श्रेय उस्ता कलाकारों को जाता है। इसका जन्म बीकानेर में हुआ, तथा यहाँ के चित्रकार अपने चित्र पर अपना नाम व तिथि अंकित करते थे।
राजा अनूपसिंह – इनके समय में बीकानेर शैली का स्वर्ण काल देखने को मिलता है। इनके समय के प्रमुख चित्रकार अलीरजा, हसन व रामलाल थे।

बीकानेर शैली

नाथद्वारा शैली:

चित्रकार – नारायण, घीसाराम, चतुर्भुज, उदयराम, खूबीराम
विषय – कृष्णलीला, श्रीनाथ जी के विग्रह, राधा कृष्ण यशोदा के चित्र।
प्रमुख रंग – पीला, हरा।
पुरुष – पुष्ट शरीर, तिलक
स्त्री – तिरछी चकोर की आंखे, उरोजों का गोल उभार, मांसल शरीर, मंगल सूत्र
विशेष – पिछवाई चित्रण (मंदिर में मूर्ति के पीछे चित्र बनाना)

नाथद्वारा शैली



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