राष्ट्रकूट मूर्तिकला~Rashtrakuta Sculpture

राष्ट्रकूट मूर्तिकला~Rashtrakuta Sculpture 

राष्ट्रकूट वंश ने 8वीं से 10वीं शताब्दी तक दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों पर शासन किया। उनकी चरम सफलता की स्थिति में उनके राज्य में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र और गुजरात के वर्तमान भारतीय राज्यों के कुछ हिस्सों के साथ-साथ पूरी तरह से कर्नाटक का आधुनिक राज्य शामिल था। कन्नड़ मूल के कारण इसका केंद्र कर्नाटक था। राष्ट्रकूट साम्राज्य में प्रशासन के कुछ क्षेत्रों की देखरेख करने के लिए महिलाएं भी थीं। 
राष्ट्रकूट मूर्तिकला महाराष्ट्र के एलोरा और एलिफेंटा में शानदार रॉक-कट गुफा मंदिरों में परिलक्षित होता है। राष्ट्रकूटों के शासन के दौरान निर्मित मुख्य संरचनाएँ चट्टान काट गुफाएँ थीं। ये गुफाएँ विभिन्न धार्मिक आस्थाओं से संबंधित थीं: बौद्ध, जैन और हिंदू (शैव और वैष्णव)।दूसरे राजा, कृष्ण प्रथम (लगभग 756 से 773) ने एलोरा में चट्टान को काटकर कैलाश मंदिर बनवाया। इस राजवंश का प्रसिद्ध शासक अमोघवर्ष प्रथम ने, जिनहोने लगभग 814 से 878 तक शासन किया, सबसे पुरानी ज्ञात कन्नड कविता कविराजमार्ग के कुछ खंडों की रचना की थी। उनके शासन काल में जैन गणितज्ञों और विद्वानों ने 'कन्नड' व 'संस्कृत' भाषाओं के साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनी वास्तुकला 'द्रविणन शैली' में आज भी मील का पत्थर मानी जाती है, जिसका एक प्रसिद्ध उदाहरण 'एल्लोरा' का 'कैलाशनाथ मन्दिर' है। अन्य महत्वपूर्ण योगदानों में 'महाराष्ट्र' में स्थित 'एलीफेंटा गुफाओं' की मूर्तिकला तथा 'कर्णाटक' के 'पताद्क्कल' में स्थित 'काशी विश्वनाथ' और 'जैन मन्दिर' आदि आते हैं।

एलोरा:-
पूर्वमध्यकाल में एलोरा महत्त्वपूर्ण कला केन्द्र रहा है। राष्ट्रकूट शासकों के काल में इस कला केन्द्र का विकास हुआ और यहाँ 34 गुफाओं का एक समूह है, जिनमें 17 ब्राह्मण, 12 बौद्ध और 5 जैन धर्म से संबंधित हैं। ये मूर्तियां राष्ट्रकूटों के कला प्रेम की साक्षी है। साथ ही तत्कालीन धार्मिक स्थिति, देव लक्षणों एवं स्थापत्य कला की विभिन्न विकसित शैलियों को भी अपने में संजोए हुए है।
एलोरा की गुफाएं पश्चिमी घाट के एलोरा पर्वत पर स्थित है और ये औरंगाबाद से 18 किलोमीटर दूर उत्तर पश्चिम की ओर स्थित है। औरंगाबाद से यहाँ सड़क मार्ग के द्वारा पहुंचा जा सकता है। इन गुफाओं के बहुत बड़े हिस्से पर मूर्तिकारों द्वारा ब्राह्मण , बौद्ध , तथा जैन धर्म से सम्बन्धित मूर्तियों को उकेरा गया है।
एलोरा का आश्चर्यजनक कैलाश मंदिर (रॉक-कट संरचना) राष्ट्रकूट वास्तुशिल्प उपलब्धि का प्रतीक है, इसकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:-
  • यह कर्नाटक द्रविड़ स्थापत्य शैली में निर्मित, महाराष्ट्र में एलोरा की गुफाओं में रॉक-कट हिंदू मंदिरों में सबसे बड़ा है।
  • मुख्य मंदिर, एक प्रवेश द्वार, नंदी मंडप और चारों ओर से घेरे हुए प्रांगण के साथ एक प्रांगण इस मंदिर के चार प्रमुख घटक हैं।
  • कैलाश मंदिर अपनी अद्भुत मूर्तियों के साथ उत्कर्ष वास्तुशिल्प का भी उदाहरण है। मूर्तिकला महिष राक्षस को देवी दुर्गा द्वारा मारे जाने का प्रतिनिधित्व करती है।
  • एक अन्य मूर्ति में रावण शिव के घर कैलाश पर्वत को स्थानांतरित करने का प्रयास कर रहा है। दीवारें भी रामायण के चित्रों से आच्छादित हैं। कैलाश मंदिर में द्रविड़ कला का प्रभाव अधिक है।

कैलाश मंदिर, एलोरा 

ब्राह्मण देवी प्रतिमाएं :-
महिषासुरमर्दिनी:
एलोरा की रामेश्वर गुफा में महिषासुरमर्दिनी क चार भुजाएं दर्शायी गयी है। एक बायीं भुजा में जानवर की तुंड को पकड़ा हुआ है , जबकि दूसरी बायीं भुजा में कवच को लिये हुए है। दायें पैर से भैंसे की कमर को कुचला हुआ दिखाया गया है।
महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा का अंकन कैलाश मंदिर में किया गया है। महिषासुरमर्दिनी उन्मुक्ति में असुर और देवियों के मध्य युद्ध के वर्णन को दर्शाया गया है। देवी की अष्टभुजाओं का अंकन किया गया है जिनमें देवी द्वारा भिन्न - भिन्न प्रकार के शस्त्र धारण किए गए हैं जो देवी के सिर के चारों ओर प्रभावमण्डल बना रहे हैं। देवी को भैंसे रूपी असुर पर आक्रमण करते हुए दर्शाया गया है। देवी का वाहन शेर शत्रुओं पर झपट रहा है और देवी के गण उनका साथ दे रहे हैं।
देवी की इस प्रतिमा का अंकन कैलाश मंदिर में आठवीं शताब्दी में किया गया है। देवी के आठ हाथ हैं और उन्होंने अपने हाथों में अलग - अलग प्रकार के शस्त्र पकड़े हुए हैं। देवी को शेर पर बैठे हुए दर्शाया गया है। देवी का वाहन शेर अच्छाई का प्रतीक है। देवी की परिचारिकाएं शेर की प्रतिमा के नीचे खड़ी मुद्रा में हैं।

महिषासुरमर्दिनी, एलोरा गुफा

एलोरा की गुफा नं . 15 की पूर्वी दीवार पर सर्वअलंकारों से विभूषित चार भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी की मूर्ति अंकित की गई है। देवी के दाहिने पैर के नीचे महिष के मस्तक से निकलते हुए असुर के मानव रूप को दिखाया गया है। महिष के पीछे का भाग देवी के दाहिने पैर की ओर है। दाहिने पैर के समीप ही एक कटा हुआ मस्तक भी दिखाई दे रहा है।
एलोरा की गुफा नं . 27 की पूर्वी दीवार पर चतुर्भुजी देवी को दिखाया गया है। देवी का दाहिना पैर महिषासुर की पीठ पर है तथा दाहिनी ऊपरी भुजा में त्रिशूल है। एक दाहिनी भुजा में खड्ग है जो महिष की गर्दन पर प्रहार की मुद्रा में दिखाया गया है। देवी की एक बायी भुजा में खेटक है तथा अन्य एक बायी भुजा में महिष मुख है।
महिषासुरमर्दिनी की यह मूर्ति 10 वीं शताब्दी ई . की है जिसे राष्ट्रकूट शासक कृष्ण - प्प्प् के शासन के दौरान उकेरा गया है। यहां पर देवी की अष्टभुजाएं दर्शायी गई है। देवी की सबसे नीचली दायीं भुजा में असुर महिष की गर्दन को पकड़े हुए दिखाया गया है। देवी का वाहन शेर है जो अच्छी तरह से देवी के पास बैठा हुआ है। इस मूर्ति में दुर्गा महिषासुर को मारने की मुद्रा में है।
एलोरा गुफा नं . 14 में उत्तरी दीवार पर चतुर्भुजी दुर्गा की प्रतिमा उकेरी गयी है जिसमें देवी के एक दाहिने हाथ में त्रिशूल और एक दाहिना हाथ पैर पर अवस्थित है। देवी का चेहरा स्पष्ट नहीं दिखाई दे रहा है। प्रतिमा के ऊपरी भाग पर दो उड़ती मालाधर आकृतियों का अंकन किया गया है। देवी के वाहन शेर का मुख भग्न है ।

दुर्गा, एलोरा गुफा

गजलक्ष्मी :
एलोरा गुफा नं . 14 में गजलक्ष्मी को द्वि - पंखुड़ी वाले कमल पुष्प पर ललितासन मुद्रा में विराजमान दर्शाया गया है। देवी गले में हार , कानों में कुण्डल , बाजूबन्द और मुकुट से सुसज्जित है। चार हाथों वाली दो आकाशीय परिचारिकाएं चारों ओर घड़े पकड़े हुए चित्रित की गई है। परिचारिकाओं के ऊपर के दो गज गजलक्ष्मी पर पानी की बौछार करते हुए प्रदर्शित किये गए हैं।

महालक्ष्मी, एलोरा गुफा


एलिफेंटा की गुफाएँ:-
एलीफैन्टा मुम्बई के गेटवे ऑफ इंडिया सागर तट से 11 किलोमीटर दूरी पर एक छोटा - सा द्वीप है। शैलकृत (रॉक-कट) एलीफ़ेंटा गुफ़ाओं का निर्माण 5वीं से 6वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में हुआ था। विदेशी आगन्तुओं में इस द्वीप को सर्वप्रथम पुर्तगालियों ने देखा तथा यहाँ खड़ी एक विशाल हाथी प्रतिमा के नाम पर इसका नाम एलिफैन्टा रख दिया। एलिफेंटा में कुल सात गुफाएं हैं। इसका ऐतिहासिक नाम घारपुरी है। इसका वास्तविक नाम यहाँ बसने वाली एक जनजाति के नाम पर था। समुद्री द्वीप की पहाड़ी को काटकर निर्मित की गई यह गुफा अपने अद्वितीय मूर्ति शिल्प तथा आस - पास की दृश्यावली के कारण अपना विशिष्ट स्थान रखती है। यहाँ कुल सात गुफाएँ हैं। मुख्य गुफा में २६ स्तंभ हैं, जिसमें शिव को कई रूपों में उकेरा गया हैं। यहाँ भगवान शंकर की नौ बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ हैं जो शंकर जी के विभिन्न रूपों तथा क्रियाओं को दिखाती हैं। 
इसकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:-
  • एलिफेंटा की गुफाएँ, एक द्वीप पर स्थित है, जिसे मुंबई के पास श्रीपुरी के नाम से जाना जाता है।
  • इसका नाम हाथी की बड़ी सी मूर्ती की उपस्थिति के कारण एलिफेंटा रखा गया था।
  • एलोरा की गुफाओं और एलिफेंटा की गुफाओं में कई समानताएँ हैं जो कारीगरों की निरंतरता को प्रदर्शित करती हैं।
  • एलिफेंटा गुफाओं के प्रवेश द्वार में विशाल द्वार-पालक मूर्तियाँ शामिल हैं।
  • गर्भगृह के चारों ओर प्राकार को घेरने वाली दीवार पर नटराज, गंगाधर, अर्धनारीश्वर, सोमस्कंद और त्रिमूर्ति की मूर्तियाँ हैं।
एलिफेंटा की गुफाएँ

इनमें शिव की त्रिमूर्ति प्रतिमा सबसे आकर्षक है। यह मूर्ति २३ या २४ फीट लम्बी तथा १७ फीट ऊँची है। इस मूर्ति में भगवान शंकर के तीन रूपों का चित्रण किया गया है। इस मूर्ति में शंकर भगवान के मुख पर अपूर्व गम्भीरता दिखती है। यह मूर्ति शिव के तीन पहलुओं को दर्शाती है: निर्माता, संरक्षक और विध्वंसक, जिनको क्रमशः, अघोरा या भैरव (बायाँ आधा भाग), तप्तपुरुष या महादेव (केंद्रीय पूर्ण चेहरा), और वामदेव या उमा (दायाँ आधा भाग) के रूप में दर्शाया गया है।

शिव की त्रिमूर्ति प्रतिमा, एलिफेंटा


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