मुगल चित्रकला~Mughal Painting

 मुगल चित्रकला~Mughal Painting

भारत में मुगल चित्रकला 16वीं और 18वीं शताब्दी के बीच की अवधि का काल है। इस शैली की शुरूआत बाबर (1526-30) से मानी जाती है। यह वह समय था जब मुगलों ने भारत के बड़े हिस्से पर शासन किया था। मुगल चित्रकला का विकास सम्राट अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के शासनकाल में हुआ। मुगल चित्रकला का रूप फारसी और भारतीय शैली का मिश्रण के साथ ही विभिन्न सांस्कृतिक पहलुओं का संयोजन भी है। भारत की मुगल चित्रकला हुमायूँ के शासनकाल के दौरान विकसित हुई। जब वह अपने निर्वासन से भारत लौटा तो वह अपने साथ दो फारसी महान कलाकारों अब्दुल समद और मीर सैयद को लाया। इन दोनों कलाकारों ने स्थानीय कला कार्यों में अपनी स्थिति दर्ज कराई और धीरे-धीरे मुगल चित्रकला का विकास हुआ।
मुगल शैली का सबसे पूर्व उदाहरण ‘तूतीनामा पेंटिंग’ है। ‘टेल्स ऑफ-ए-पैरट जो वर्तमान में कला के क्लीवलैंड संग्रहालय में है। एक और मुगल पेंटिंग है, जिसे ‘प्रिंसेज़ ऑफ द हाउस ऑफ तैमूर’ कहा जाता है। यह शुरुआत की मुगल चित्रकलाओं में से एक है जिसे कई बार फिर से बनाया गया।
अकबर को चित्रकला और अपने दस्तावेजों के सुलेखन के लिए समर्पित एक पूरे विभाग जीसे "तस्वीरखाना"के रूप में औपचारिक कलात्मक स्टूडियो बनाया। जहाँ कलाकारों को वेतन पर रखा गया। अकबर चित्रकला को अध्ययन और मनोरंजन के साधन के रूप में देखता था। अकबर के समय में फ़ारस का प्रसिद्ध चित्रकार अब्दुस्समद भारत आया और यहाँ मुग़ल चित्रकला में सूक्ष्मचित्रण (मिनिएचर पेंटिंग) के क्षेत्र में कार्य किया।

अकबरनामा की एक पांडुलिपि 

मुगल चित्रकला जहांगीर के शासनकाल में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गयी । वह स्वभाव से प्रकृतिवादी था और वनस्पतियों और जीवों , यानी पक्षियों , पशुओं वृक्षों और फूलों के चित्रों को प्राथमिकता देता था। उसने "छविचित्र" में प्रकृतिवाद लाने पर बल दिया । इस अवधि में विकसित होने वाली एक अनूठी प्रवृत्ति चित्रों के चारों ओर अलंकृत किनारों/बार्डर की थी । जहाँगीर के समय में चित्रकारों ने सम्राट के दरबार, हाथी पर बैठ कर धनुष-बाण के साथ शिकार का पीछा करना, जुलूस, युद्ध स्थल एवं प्राकृतिक दृश्य फूल, पौधे, पशु-पक्षी, घोड़ें, शेर, चीता आदि चित्रों को अपना विषय बनाया। जहाँगीर के समय की चित्रकारी के क्षेत्र में घटी महत्त्वपूर्ण घटना थी - मुग़ल चित्रकला की फ़ारसी प्रभाव से मुक्ति। उसकी अपनी स्वयं की निजी कार्यशाला थी। उसकी चित्रशाला में अधिकांशतः लघुचित्रों (मिनिएचर) की रचना की गई और इनमें से सबसे प्रसिद्ध जेबरा, शतुर्मुर्ग और मर्गे के प्राकृतिक चित्र थे। उसके काल के सबसे प्रसिद्ध कलाकारों में से एक उस्ताद मंसूर था। उस्ताद मंसूर जटिल से जटिल चेहरे की आकृतियां भी उतारने में विशेषज्ञ था। उस्ताद 'मंसूर' दुर्लभ पशुओं, बिरले पक्षियों एवं अनोखे पुष्प आदि के चित्रों को बनाने का चित्रकार था। उसकी महत्त्वपूर्ण कृति में 'साइबेरिया का बिरला सारस' एवं बंगाल का एक पुष्प है। 'उस्ताद मंसूर' पक्षी-चित्र विशेषज्ञ तथा 'अबुल हसन' व्यक्ति-चित्र विशेषज्ञ था। उस्ताद मंसूर एवं अबुल हसन जहाँगीर के श्रेष्ठ कलाकारों में से थे।
यूरोपीय प्रभाव वाले चित्रकारों में 'मिशकिन' सर्वश्रेष्ठ था। अयार-ई-दानिश नाम पुस्तक उनके शासनकाल के दौरान लिखी गई थी।


उस्ताद मंसूर -डोडो (1628-33)




टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

क्ले पोर्ट्रेट के प्लास्टर ऑफ पेरिस वेस्ट मोल्ड प्रक्रिया ~ PLASTER OF PARIS WASTE MOULD PROCESS OF A CLAY PORTRAIT :-

राजस्थानी चित्रकला-मेवाड़, बूंदी, कोटा, किशनगढ़, जोधपुर, जयपुर, बीकानेर, नाथद्वारा, मालवा~Rajasthani Painting –Mewar, Bundi, Kota, Kishangarh, Jodhpur, Jaipur, Bikaner, Nathadwara, Malwa.

पहाड़ी चित्रकला - बसोहली, गुलेर, कांगड़ा, गढ़वाल~Pahari Painting – Basohli, Guler, Kangra, Garhwal.