चोल मूर्तिकला~Chola Sculpture

चोल मूर्तिकला~Chola Sculpture 

दक्षिण भारत में चोल राजवंश का राज्यकाल (850 ई - 1250 ई) कला एवं स्थापत्य के सतत समृद्धि का युग था।चोलों का शासन 9वीं शताब्दी में शुरू हुआ जब उन्होंने सत्ता में आने के लिये पल्लवों को हराया। इनका शासन 13वीं शताब्दी तक पाँच से अधिक शताब्दियों तक चलता रहा।मध्यकाल चोलों के लिये पूर्ण शक्ति और विकास का युग था। यह राजा आदित्य प्रथम और परान्तक प्रथम जैसे राजाओं द्वारा संभव हुआ। चोल राजाओं ने अपनी विस्तृत विजयों से प्राप्त धन-सम्पदा का उपयोग दीर्घायु प्रस्तर मन्दिरों के निर्माण तथा कांस्य की मूर्तियों के निर्माण में किया। शिव का नटराज रूप में प्रस्तुतीकरण चोल काल तक पूर्ण रूप से विकसित हो चुका था। इसके बाद भी उनके इस स्वरूप की भिन्न-भिन्न कांस्य प्रतिमाएँ बनाई जाती रहीं । तमिलनाडु के तंजावुर (तंजौर ) क्षेत्र में शिव की प्रतिमाओं के नाना रूप विकसित हुए। 

उल्लेखनीय चोल मूर्तियां दक्षिण भारत में मंदिर की दीवारों को सुशोभित करती हैं। इनमें से अधिकांश मंदिर या तो भगवान शिव या भगवान विष्णु को समर्पित थे। इनको मंदिर वास्तु शास्त्र के अनुसार बनाया गया था। मंदिर की मूर्तियों के अलावा कांस्य की मूर्तियां भी चोल राजाओं के अधीन थीं। चोल मूर्तिकला का सबसे अच्छा उदाहरण नटराज (तांडव नृत्य मुद्रा में भगवान शिव) है।  इस काल की मूर्तियों में प्रायः भागवत , देवी भागवत , रामायण तथा शिवपुराण आदि में आख्यात अनेक लीलाओं का अंकन महत्वपूर्ण है। उपर्युक्त कलाशैली में निर्मित मूर्तियाँ अपेक्षाकृत लम्बी , काया पतली , शारीरिक अवयवों तथा मुद्राओं में सौम्यता दृष्टिगोचर होती है। इन मूर्तियों के वस्त्राभूषण में मर्यादा , कोमलता तथा भाव - संप्रेषण मोहक लगता है।  चोलों की देव प्रतिमायें एवं पौराणिक दृश्य अधिक सशक्त सजीव तथा आकर्षक हैं। चोल प्रतिमायें दो तरह की हैं - प्रस्तर प्रतिमायें तथा धातु प्रतिमायें। चोल प्रशासक अधिकांशतः शैव थे , फलतः शैव प्रस्तर प्रतिमाओं ( मूर्तियों ) का मर्तन ज्यादा किया गया और इन्ही की प्रधानता रही। चोल समय की धार्मिक मूर्तियों में महिषासुरमर्दिनी , दुर्गा , सरस्वती , उमा , पार्वती , निशुम्भसुदिनी , सीता , काली और भोगेश्वरी की मूर्तियों का अंकन किया गया है। इस काल में पत्थर की मूर्तियों के साथ कांस्य की मूर्तियां भी काफी मात्रा में प्राप्त हुई है।

चोल मूर्तिकला के प्रमुख बिंदु:
  • चोल मूर्तिकला का एक महत्त्वपूर्ण प्रदर्शन तांडव नृत्य मुद्रा में नटराज की मूर्ति है। हालाँकि सबसे पहले ज्ञात नटराज की मूर्ति, जिसे ऐहोल में रावण फड़ी गुफा में खोदा गया है, प्रारंभिक चालुक्य शासन के दौरान बनाई गई थी, चोलों के शासन के दौरान मूर्तिकला अपने चरम पर पहुँच गई थी।
  • 13वीं शताब्दी में चोल कला के बाद के चरण का चित्रण भूदेवी, या पृथ्वी की देवी को विष्णु की छोटी पत्नी के रूप में दर्शाने वाली मूर्ति द्वारा किया गया है। वह अपने दाहिने हाथ में एक लिली पकड़े हुए आधार पर एक सुंदर ढंग से मुड़ी हुई मुद्रा में खड़ी है, जबकि बायाँ हाथ भी उसी तरफ लटका हुआ है।
  • चोल कांस्य प्रतिमाओं को विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रतिमाओं में से एक माना जाता है।

नटराज की मूर्ति, चोल

चोल वास्तुकला:
चोल वास्तुकला का इतिहास शानदार मंदिरों के साथ शुरू हुआ। प्रारंभिक चोल काल के दौरान आदित्य I और परांतक प्रथम द्वारा कई शैव और वैष्णव मंदिरों का निर्माण किया गया था। चोल मूर्तियों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इनमें प्रेम भावना नहीं थी। प्रारंभिक चोल मंदिरों की वास्तुकला में तुलनात्मक रूप से छोटी संरचनाएं शामिल थीं जो ईंटों के साथ बनाई गई थीं। तमिलनाडु में पुदुक्कोट्टई के पास विजयलचोलेश्वरम की मूर्ति इस तरह की कला का एक आदर्श उदाहरण है। कोरंगानाथ मंदिर की वास्तुकला और मूर्तिकला के अलावा अन्य भी इसी युग की है। मुवरकोविल मंदिर की मूर्तिकला एक और उत्कृष्ट उदाहरण है। राजराजा चोल ने चोल की मूर्तियों और स्थापत्य कला को बहुत बढ़ावा दिया। इस अवधि के कुछ प्रमुख मंदिर तंजौर में बृहदीश्वर मंदिर, गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर, तिरुवलीश्वरम मंदिर और शिव मंदिर हैं।
मध्य चोल काल के दौरान मंदिर पूरी तरह से ग्रेनाइट, एक कठोर चट्टान से बने थे। मूर्तियां जटिल रूप से बनाई गई थीं। देवी-देवताओं की सामान्य छवियों के अलावा, मूर्तिकला मूर्तिकला, छिद्रित खिड़कियां, पशु और अन्य भी आवर्तक रूपांकनों थे। इन मंदिरों की भव्यता और मूर्तिकला संदेह से परे प्रभावशाली है। ऐरावतेश्वर मंदिर की मूर्तिकला बाद के चोल काल की है। पत्थर के खंभे, गोपुरम और अच्छी तरह से खुदी हुई मूर्तियां चोल मंदिरों की मुख्य विशेषताएं हैं। यह विशेष मंदिर 12 वीं शताब्दी ईस्वी का है। चोल कांस्य की मूर्तियां भी अपने लिए एक विशेष जगह बनाती थीं। उनकी सुंदरता, लालित्य, अभिव्यंजक दृश्य और लयबद्ध आंदोलन ने इन मूर्तियों की विशेषता बताई। इस प्रकार, चोल मूर्तियां आज भी अपनी प्रतिभा के लिए जानी जाती हैं।

 चोल वास्तुकला के प्रमुख बिंदु:
  • चोल वास्तुकला (871-1173 ई.) मंदिर वास्तुकला की द्रविड़ शैली का प्रतीक था।
  • उन्होंने मध्ययुगीन भारत में कुछ सबसे भव्य मंदिरों का निर्माण किया।
  • बृहदेश्वर मंदिर, राजराजेश्वर मंदिर, गंगईकोंड चोलपुरम मंदिर जैसे चोल मंदिरों ने द्रविड़ वास्तुकला को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। चोलों के बाद भी मंदिर वास्तुकला का विकास जारी रहा।
तमिलनाडु के तंजावुर में स्थित बृहदीश्वर/बृहदेश्वर मंदिर अपने आप में एक अद्भुत और रहस्यमयी संरचना है। चोल साम्राज्य के ‘द ग्रेट लिविंग टेंपल्स’ में से एक भगवान शिव को समर्पित बृहदीश्वर मंदिर को महान चोल शासक राजराज चोल प्रथम ने बनवाया था। इसे पेरिया कोविल, राजराजेश्वर मंदिर या राजराजेश्वरम के नाम से भी जाना जाता है। द्रविड़ वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण है बृहदीश्वर मंदिर जो कि भारत के कुछ विशाल मंदिरों में से एक है।इस मंदिर के निर्माण में ‘ग्रेनाइट’ के चौकोर पत्थर के ब्लॉक्स को (आकार में घटते क्रम में) एक-दूसरे के ऊपर इस प्रकार जमाया गया कि वो आपस में फँसे रहें। इसे साधारण भाषा में ‘पजल टेक्निक (Puzzle Technique) कहा गया। मंदिर का मुख्य भाग (जो श्रीविमान कहलाता है) लगभग 216 फुट (66 मीटर) ऊँचा है। इसका मतलब हुआ कि पत्थर के ब्लॉक 216 फुट तक जमाए गए। ध्यान रखें कि यह सभी पत्थर मात्र एक-दूसरे के ऊपर रखे गए हैं न कि इन्हें किसी सीमेंट जैसे पदार्थ से (जैसा कि आजकल होता है) आपस में जोड़ा गया है। बृहदीश्वर मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसे बिना नींव के बनाया गया है। बृहदीश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है जो 8.7 मीटर ऊँचा है। इसके अलावा मंदिर में गणेश, सूर्य, दुर्गा, हरिहर, भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हैं।

बृहदेश्वर मंदिर


गंगैकोंडचोलपुरम तमिलनाडु के त्रिचिनापल्ली ज़िले में स्थित है।गंगैकोंडचोलपुरम चोल वंश के प्रतापी राजा राजेन्द्र चोल (1014-44ई.) की राजधानी थी।
उसकी सेनाएँ कलिंग को पार करके ओड्र उड़ीसा दक्षिण कौशल बंगाल और मगध होती हुई गंगा तक पहुँची थीं।
इस विजय के उपलक्ष्य में उसने 'गंगैकोण्ड' की उपाधि धारण की और गंगैकोण्डचोलपुरम 'गंगा विजयी चोल का नगर' नामक नगर बसाया। गंगैकोंडचोलपुरम नगर चोल राजाओं के शासन काल में बहुत उन्नत और समृद्ध था।
गंगैकोंडचोलपुरम पर राजेन्द्र चोल ने 1025 ई. में मन्दिर बनवाया। मन्दिर का शिखर भूमि से 150 फुट ऊँचा है।
मन्दिर की शैली तंजौर मन्दिर की शैली के ही समान है। अंतर मुख्यतः अधिक विस्तृत अलंकरण का है।
इसका मण्डप कम ऊँचा है, किन्तु इसमें 150 स्तम्भ हैं। इस मन्दिर में मार्दव, सौन्दर्य और विलास अधिक है।
कहा जाता है, कि राजेन्द्र चोल ने विभिन्न पराजित राज्यों के शासकों को गंगा से एक-एक कलश स्वयं ढोते हुये लाकर नये नगर में निर्मित जलाशयों में उड़ेलने का आदेश दिया। इस तरह जो जल धारा बनी उसे 'राजेन्द्र चोल का जलीय विजय- स्तम्भ' कहा गया।


गंगईकोंड चोलपुरम मंदिर


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