चालुक्य मूर्तिकला~Chalukyan Sculpture
चालुक्य मूर्तिकला ~ Chalukyan Sculpture
चालुक्य वंश 6वीं और 12वीं शताब्दी के बीच दक्षिणी और मध्य भारत के बड़े हिस्से पर शासन किया। चालुक्यों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जा सकता। वे अपने को ब्रह्मा या मनु अथवा चंद्रमा का वंश मानते हैं। वे ऐतिहासिक दृष्टि से स्वयं को बहुत प्राचीन जताने के लिए कहते हैं कि उनके पूर्वज अयोध्या में राज्य करते थे।चालुक्यों ने कनााटक में बीजापुर क्तजले में वटापी / बादामी में अपनी राजधानी स्थापित की। वे धर्मनिष्ठ हिन्दू थे और उन्होंने धर्मशास्त्रों के अनुसार शासन किया। चीनी खोजकर्ता ह्वेन-त्सांग ने 639 ई. में चालुक्य साम्राज्य का दौरा किया था। बादामी लगभग 200 वर्षों तक चालुक्य राजधानी रहा। चालुक्य ब्राह्मण धर्मानुयायी थे तथा उनके कुल-देवता विष्णु थे। विष्णु तथा शिव के साथ-साथ अन्य पौराणिक देवी-देवताओं की पूजा का भी व्यापक प्रचलन था। वैदिक यज्ञों का भी अनुष्ठान होता था तथा ब्राह्मणों को दान दिये जाते थे। उन्होंने शिव, विष्णु और ब्रह्मा को समर्पित कई रॉक-कट गुफा मंदिरों और ईंट के संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण किया। पुलकेशिन प्रथम चालुक्य वंश का प्रथम वास्तविक शासक था ।चालुक्य शासन काल में मूर्तिकला की भी प्रगति हुई। बादामी में मिले तीन हिन्दू तथा एक जैन हॉलों में अनेक सुन्दर मूर्तियाँ मिलती हैं. हिन्दू हॉलों में एक गुफा में अनंत के वाहन पर बैठे हुए विष्णु की तथा नरसिंह की दो मूर्तियाँ बहुत सुन्दर हैं। विरूपाक्ष मंदिर की दीवारों पर शिव, नागिनियों तथा रामायण के दृश्यों की मूर्तियाँ बनिया गई हैं। एलोरा की अनेक मूर्तियाँ चालुक्यों के शासनकाल में बनाई गयी थीं।
अजंता और एलोरा की गुफाएँ अपनी सुन्दर चित्रकला के लिए विश्व-विख्यात हैं। ये दोनों राज्य चालुक्य राज्य में स्थित थे। विद्वानों की राय है कि इसमें से कई चित्र चालुक्य शासन काल में बनवाये गये। अजंता के एक चित्र में ईरानी दूत-मंडल को पुलकेसिन द्वितीय के समक्ष अभिवादन करते हुए दिखाया गया है। अनेक स्थानों पर गुफाओं की दीवारों को सजाने के लिए भी चित्र बनाए गए। इस चित्र में बहुत से लोगों को भगवान् विष्णु की उपासना करते हुए दिखाया गया है।
महत्वपूर्ण पत्थर मंदिरबादामी और ऐहोल में विष्णु मंदिर और बीजापुर जिले के पट्टडकल में विरुपाक्ष या शिव मंदिर हैं। बादामी में विष्णु मंदिर चालुक्य वंश के मगलेसा द्वारा बनाया गया था। गुफा मंदिरों में बादामी में शेष नाग, वराह भगवाम, नरसिंह की मूर्तियां शामिल हैं।
विरुपाक्ष मंदिर:
पट्टदकल में स्थित विरुपाक्ष मंदिर चालुक्यों का सबसे प्रमुख मंदिर परिसर है। इसे महाराज विक्रमादित्य द्वितीय की पत्नी लोकमहादेवी ने ७४५ ई. में अपने पति की कांची के पल्लव वंश पर विजय के स्मारक रूप में बनवाया था।तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी किनारे पर हेम कूट पहाड़ी की तलहटी पर बने इस मंदिर का गोपुरम 50 मीटर ऊंचा है।(गोपुरम अधिकतर आयताकार होते हैं, जिनके भूमि तल पर विराट काष्ठ द्वार होते हैं, जो अंदर का मार्ग प्रशस्त करते हैं, एवं खूब अलंकृत होते हैं। ऊपर का गोपुरम कई तलों में बंटा होता है, एवं ऊपर जाते जाते तंग होता जाता है। इसके सबसे ऊपर प्रायः ढोलक आकार का शिखर होता है, एवं उसके ऊपर विषम संख्या में कलश शोभा पाते हैं।) भगवान शिवजी के अलावा इस मंदिर में भुवनेश्वरी और पंपा की मूर्तियां भी बनी हुई हैं। इस मंदिर के पास छोटे-छोटे और मंदिर हैं जो कि अन्य देवी देवताओं को समर्पित हैं। विरुपाक्ष मंदिर विक्रमादित्य द्वितीय की रानी लोकमाह देवी द्वारा बनवाया गया था। द्रविड़ स्थापत्य शैली में ये मंदिर ईंट तथा चूने से बना है। इसे यूनेस्को की घोषित राष्ट्रीय धरोहरों में शामिल है। इसमें एक विशाल विनाम, मंडप और छोटे-छोटे मंदिर हैं। मंडप स्तंभ लक्ज़री रूप से गढ़े गए हैं और पट्टदकल में मंदिर वास्तुकला के उत्तरी और दक्षिणी दोनों दृष्टिकोणों का प्रतीक हैं। विरुपाक्ष मंदिर यहाँ का सर्वश्रेष्ठ मंदिर है। यह मंदिर कांची के कैलाशनाथ मंदिर से बहुत मिलता जुलता है। वही मंदिर इस मंदिर की प्रेरणा है। यही विरुपाक्ष मंदिर एल्लोरा में राष्ट्रकूट वंश द्वारा बनवाये गये कैलाशनाथ मंदिर की प्रेरणा बना। इस मंदिर की शिल्पाकृतियों में कुछ प्रमुख हैं लिंगोद्भव, नटराज, रावाणानुग्रह, उग्रनृसिंह, आदि।
विरुपाक्ष मंदिर:
पट्टदकल में स्थित विरुपाक्ष मंदिर चालुक्यों का सबसे प्रमुख मंदिर परिसर है। इसे महाराज विक्रमादित्य द्वितीय की पत्नी लोकमहादेवी ने ७४५ ई. में अपने पति की कांची के पल्लव वंश पर विजय के स्मारक रूप में बनवाया था।तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी किनारे पर हेम कूट पहाड़ी की तलहटी पर बने इस मंदिर का गोपुरम 50 मीटर ऊंचा है।(गोपुरम अधिकतर आयताकार होते हैं, जिनके भूमि तल पर विराट काष्ठ द्वार होते हैं, जो अंदर का मार्ग प्रशस्त करते हैं, एवं खूब अलंकृत होते हैं। ऊपर का गोपुरम कई तलों में बंटा होता है, एवं ऊपर जाते जाते तंग होता जाता है। इसके सबसे ऊपर प्रायः ढोलक आकार का शिखर होता है, एवं उसके ऊपर विषम संख्या में कलश शोभा पाते हैं।) भगवान शिवजी के अलावा इस मंदिर में भुवनेश्वरी और पंपा की मूर्तियां भी बनी हुई हैं। इस मंदिर के पास छोटे-छोटे और मंदिर हैं जो कि अन्य देवी देवताओं को समर्पित हैं। विरुपाक्ष मंदिर विक्रमादित्य द्वितीय की रानी लोकमाह देवी द्वारा बनवाया गया था। द्रविड़ स्थापत्य शैली में ये मंदिर ईंट तथा चूने से बना है। इसे यूनेस्को की घोषित राष्ट्रीय धरोहरों में शामिल है। इसमें एक विशाल विनाम, मंडप और छोटे-छोटे मंदिर हैं। मंडप स्तंभ लक्ज़री रूप से गढ़े गए हैं और पट्टदकल में मंदिर वास्तुकला के उत्तरी और दक्षिणी दोनों दृष्टिकोणों का प्रतीक हैं। विरुपाक्ष मंदिर यहाँ का सर्वश्रेष्ठ मंदिर है। यह मंदिर कांची के कैलाशनाथ मंदिर से बहुत मिलता जुलता है। वही मंदिर इस मंदिर की प्रेरणा है। यही विरुपाक्ष मंदिर एल्लोरा में राष्ट्रकूट वंश द्वारा बनवाये गये कैलाशनाथ मंदिर की प्रेरणा बना। इस मंदिर की शिल्पाकृतियों में कुछ प्रमुख हैं लिंगोद्भव, नटराज, रावाणानुग्रह, उग्रनृसिंह, आदि।
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| पट्टदकल में स्थित विरुपाक्ष मंदिर |
अजंता और एलोरा की गुफाएँ अपनी सुन्दर चित्रकला के लिए विश्व-विख्यात हैं. ये दोनों राज्य चालुक्य राज्य में स्थित थे। विद्वानों की राय है कि इसमें से कई चित्र चालुक्य शासन काल में बनवाये गये। अजंता के एक चित्र में ईरानी दूत-मंडल को पुलकेसिन द्वितीय के समक्ष अभिवादन करते हुए दिखाया गया है। अनेक स्थानों पर गुफाओं की दीवारों को सजाने के लिए भी चित्र बनाए गए। इस चित्र में बहुत से लोगों को भगवान् विष्णु की उपासना करते हुए दिखाया गया है। यह इतना सुन्दर है कि दर्शकगण आश्चर्यचकित रह जाते हैं।
एलोरा में गुफा मंदिर शिव को समर्पित हैं और इसमें महेश, शिवलिंग और नंदी के चित्र शामिल हैं। गुफाओं में से एक दो मंजिला है। आंध्र प्रदेश के गुफा मंदिरों में गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, लिंग और नंदी के स्मारक हैं। बादामी में 3 ब्राह्मणकालीन गुफाओं में से दो विष्णु और एक शिव को समर्पित हैं।
बादामी गुफाओं को पहले “वातापी” के नाम से पुकारा जाता था। बादामी गुफाएं “कर्नाटक राज्य” की
बीजापुर जिले में स्थित है । माना जाता है कि बादामी गुफाएं ( वातापी) को “वत्यापिपुरम” के नाम से भी
जाना जाता है, यह गुफाएं चालुक्य वंश में बनाई गई थी। यह गुफाएं चट्टान काटकर “लाल पत्थर” से बनाई गई है ।
इन गुफाओं की खोज का श्रेय “स्टेला क्रेमरिश” को जाता है । बादामी गुफाओं की संख्या 4 है । बादामी गुफाएं
“जैन तथा ब्राह्मण धर्म” को समर्पित हैं । यहां तीन गुफाएं ब्राह्मण धर्म से संबंधित हैं और एक गुफा जैन धर्म से
संबंधित है । स्टेला क्रेमरिश ने इन चित्रों का अध्ययन किया,और बताया कि बादामी गुफा के चित्र शिव विवाह से
संबंधित है ।
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बादामी गुफाएं पहली गुफा - यह भगवान शिव को समर्पित है । इस गुफा में नटराज रूपी भगवान शिव की मूर्ति है जो 18' ऊंची है । |
गुफा संख्या एक को शैव गुफा के नाम से जाना जाता हैं। इस आकर्षित गुफा में खूबसूरत भगवान शिव की सशस्त्र नृत्य नक्काशी, भगवान गणेश की दो हाथो वाली नक्काशी, महिषासुर मर्दिनी, अर्ध नरेश्वर और शंकरनारायण आदि की नक्काशी शामिल हैं। गुफा का छत एक नाग आकृति की भाती प्रतीत होता हैं।
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| भगवान शिव की नटराज मूर्ति |
दूसरी शैलगुफा है जिसे मालेगिट्टी कहा जाता है, यह भगवान विष्णु को समर्पित है। इस गुफा की छत पर ब्रह्मा, विष्णु, शिव के चित्र बने हुए हैं। इसके अलावा छत पर अनंतनारायण, शिव, ब्रह्मा, विष्णु और अन्य अष्टदिक्पालों की दर्शनीय नक्काशी की गई हैं। इसका गर्भगह वर्गाकार है । मण्डप तथा बरामदे में एकाश्मक स्तम्भ लगे है।
गुफा संख्या तीन जोकि बादामी की सबसे बड़ी और सुन्दर गुफा हैं। पर्यटकों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करती हैं। गुफा संख्या III में शैव और वैष्णव से सम्बंधित नक्काशी देखने को मिलती है। केव्स-3 में त्रिविक्रम, नरसिम्हा, शंकरनारायण, भुवराहा, अनंतसयाना और हरिहर आदि को शानदार ढंग से उकेरा गया हैं। 578 ईस्वी के दौरान एक शिलालेख में मंगलेश द्वारा निर्माण के रिकॉर्ड की जानकारी मिलती हैं।
यह गुफा उस काल की गुफा मंदिरों की वास्तुकला और मूर्तिकला के भव्य रुप को प्रदर्शित करती है ।
यहां कई देवताओं के चित्र हैं और इसी गुफा में 578 ईसवी पूर्व के शिलालेख मिले हैं ।
यह गुफा उस काल की गुफा मंदिरों की वास्तुकला और मूर्तिकला के भव्य रुप को प्रदर्शित करती है ।
यहां कई देवताओं के चित्र हैं और इसी गुफा में 578 ईसवी पूर्व के शिलालेख मिले हैं ।
लाड खान मंदिर





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