भारतीय चित्रकला की मुगल-पूर्व प्रवृत्तियाँ~ Pre-Mughal trends of Indian painting.
Pre-Mughal trends of Indian painting
भारतीय चित्रकला की मुगल-पूर्व प्रवृत्तियाँ
भारतीय चित्रकला के प्रकार :- इसी एक तल अथवा सतह पर पानी, तेल अथवा चर्बी में घोले गये अथवा सूखे रंगों से किसी आकृति के अंकन का चित्रण और उस अंकित स्वरूप को चित्र कहते हैं. ऐसा चित्रण भवन की भित्ति, प्रस्तर-फलक, काष्ठ, मिट्टी के बर्तन, चर्मपट, तालपत्र अथवा वस्त्र या कागज़ पर किया जा सकता है। भारतीय चित्रकला मोटे तौर पर चार प्रकार की जा रही है –
1. भित्ति चित्र – अजंता, बाघ, बादामी तथा सित्तन्नवासल की गुहा-भित्तियों पर इसके उदाहरण मिले हैं।
2. चित्रपट – चमड़े अथवा कपडे के टुकड़ों पर की गई चित्रकारी जिसे लटकाया जाता था।
3. चित्र फलक – पत्थर, धातु अथवा लकड़ी के टुकड़ों पर किया गया चित्रांकन।
4. लघु चित्र – बाद में पुस्तकों के पृष्ठों पर अथवा छोटे-छोटे कागज़ या वस्त्रों के टुकड़ों पर बनाए गये चित्र उन्हें प्रायः मिनिएचर पेंटिग कहा जाता है।\
चित्रांकन के प्रयोजन :-
प्रागैतिहासिक तथा ऐतिहासिक चित्रों और साहित्यिक विवरणों के आधार पर भारतीय चित्रांकन के मुख्य प्रयोजन निम्नलिखित बताये जा सकते हैं –
1. धार्मिक अभिव्यक्ति, पूजा-पाठ आदि
2. ऐतिहासिक दृश्यों का संरक्षण
3. जीवन की प्रमुख घटनाओं का संरक्षण
4. मृत व्यक्तियों की आकृतियों का संरक्षण
5. रसों का उद्यीपन और प्रेमाभिव्यक्ति
6. भवनों, राजमहलों तथा मंदिरों का अलंकरण
दक्कनी चित्रकला
मध्यकालीन भारत और उत्तर-मध्यकालीन भारत में दक्कनी चित्रकला भारत के दक्षिणी भाग में प्रभावी थी। दक्कनी पेंटिंग के विकास में आदिल शाही, निजाम शाही और कुतुब शाही शासकों का प्रभाव था। इब्राहिम आदिल शाह (द्वितीय) के शासन के दौरान बहुत सारे कलाकार फले-फूले, जो चित्रकला के महान प्रेमी थे। यह दुनिया के विभिन्न संग्रहालयों में इब्राहिम आदिल शाह के कई चित्रों की उपलब्धता से स्पष्ट है। दक्कनी चित्रकला को एक अवधारणात्मक और कला के मूल और विदेशी शैली के एक अत्यंत सम्मिलित मिश्रण के रूप में चित्रित किया जा सकता है।
दक्कनी चित्रकला का इतिहास:-
लघु चित्रकला पद्धति जो पहले बहमनी सल्तनत के बहमनी दरबार में विकसित हुई और बाद में अहमदनगर, बीजापुर, बीदर बेरार और गोलकुंडा की रियासतों में विकसित हुई, उसे दक्कनी चित्रकला कहा जाता है। 1570 का नुज़ुम-उल-उलूम पहला दक्कनी चित्रकला का चित्र बताया जाता है। राजस्थान और मध्य भारत के हिंदू शासकों का भी दक्कनी चित्रकला का योगदान था। भारत के अन्य हिस्सों में व्यापक रूप से चित्रकारी की कला बहुत प्रभावित थी। इब्राहिम आदिल शाह को नेपरस्टक संग्रहालय, प्राग और कोलकाता के गोयनका संग्रह में उपलब्ध कुछ अन्य चित्रों में एक संगीतकार के रूप में दिखाया गया था। हालांकि मुगल चित्रकला और दक्कनी चित्रकला ने यूरोपीय प्रभाव के कारण प्रकृतिवाद का विकास किया, फिर भी दोनों के बीच अंतर था।मुगल चित्रकला तकनीक में अधिक चमकदार थीं जबकि दक्कनी चित्रकला पूरी तरह से स्वदेशी तकनीकि पर आधारित थी।
दक्कन चित्रकला की विशेषताएं:-
दक्कन चित्रकला एक स्वदेशी और विदेशी कला रूपों का एक अवधारणात्मक, अत्यधिक एकीकृत विलय है। विजयनगर पेंटिंग की समानता लंबी आकृतियों में देखी गई है, जबकि परिदृश्य के सामान्य उपयोग के साथ पुष्प पृष्ठभूमि फारसी प्रभाव दिखाती है। दक्कनी रंग समृद्ध और चमकदार होते हैं, और बहुत अधिक उपयोग सोने और सफेद रंग के होते हैं। बहुत ही अपरंपरागत रचना में इन चित्रों का अपना एक अलग गुण है। समृद्ध परिदृश्य रहस्यमय वातावरण, मणि जैसा रंग, सोने का भव्य उपयोग, उत्तम फिनिश, बड़े पौधों की प्रवीणता, पृष्ठभूमि में फूलों की झाड़ियाँ और विशिष्ट महल इन चित्रों की खास विशेषताएँ। मुंबई के प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम में पेंटिंग गैलरी में दक्कनी चित्रों के कुछ विशिष्ट उदाहरण हैं। इस गैलरी में यहां उपलब्ध 18 वीं शताब्दी के बूंदी के दक्कनी चित्रों के कुछ अन्य संग्रह हैं, जो प्रेम के विषय से संबंधित हैं। गैलरी की एक अन्य पेंटिंग मिरर (बूंदी, 18 वीं शताब्दी) में दिख रही महिला को दर्शाती है।
अहमदनगर चित्रकला
इस चित्रकला का संरक्षण अहमदनगर के हुसैन निजाम शाह द्वारा किया गया था। महत्वपूर्ण चित्र ‘तारिफ-ए-हुसैन शाही’ है।
बीजापुर चित्रकला
कलात्मक सृजनशीलता के केंद्र के रूप में बीजापुरकाफी उन्नत था। शुरुआती ज्ञात बीजापुर चित्रों में खगोल विज्ञान पर एक फारसी चित्र ‘नुजूम अल-उलुम’ है। संभवत: यह अली आदिल शाह I ’के लिए बनाया गया है।
गोलकुंडा चित्रकला
कुतुब शाही सहायता के तहत गोलकुंडा में प्रारंभिक चित्र इब्राहिम कुतुब शाह की संप्रभुता के कारण हैं। इन चित्रों में नाचती हुई लड़कियों को महत्वपूर्ण मेहमानों का मनोरंजन करते हुए दिखाया गया है। लगभग 1590 से सुल्तान मुहम्मद कुली कुतुब शाह की कुल्लियात भारत-फारस के कलात्मक साधनों को प्रभावी ढंग से संयोजित करने के लिए गोलकुंडा में राजसी समर्थन के तहत प्राथमिक सचित्र पांडुलिपियों में से एक है।
हैदराबाद चित्रकला
कुल 36 रागमाला चित्रों का एक सेट जिसे “जॉनसन रागमाला” कहा जाता है, कुछ को हैदराबादी चित्रकला का सबसे अच्छा और सबसे परिष्कृत उदाहरण माना जाता है।
भारत में मुगल चित्रकला 16वीं और 18वीं शताब्दी के बीच की अवधि का काल है। यह वह समय था जब मुगलों ने भारत के बड़े हिस्से पर शासन किया था। मुगल चित्रकला का विकास सम्राट अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के शासनकाल में हुआ। मुगल चित्रकला का रूप फारसी और भारतीय शैली का मिश्रण के साथ ही विभिन्न सांस्कृतिक पहलुओं का संयोजन भी है।
मुगल चित्रकला का इतिहास:
o भारत की मुगल चित्रकला हुमायूँ के शासनकाल के दौरान विकसित हुई। जब वह अपने निर्वासन से भारत लौटा तो वह अपने साथ दो फारसी महान कलाकारों अब्दुल समद और मीर सैयद को लाया। इन दोनों कलाकारों ने स्थानीय कला कार्यों में अपनी स्थिति दर्ज कराई और धीरे-धीरे मुगल चित्रकला का विकास हुआ।
o कला की मुगल शैली का सबसे पूर्व उदाहरण ‘तूतीनामा पेंटिंग’ है। ‘टेल्स ऑफ-ए-पैरट जो वर्तमान में कला के क्लीवलैंड संग्रहालय में है। एक और मुगल पेंटिंग है, जिसे ‘प्रिंसेज़ ऑफ द हाउस ऑफ तैमूर’ कहा जाता है। यह शुरुआत की मुगल चित्रकलाओं में से एक है जिसे कई बार फिर से बनाया गया।
मुगल चित्रकला के विषय:-
o मुगल चित्रकला में एक महान विविधता है, जिसमें चित्र, दृश्य और अदालत जीवन की घटनाएँ शामिल हैं, साथ ही अंतरंग स्थानों में प्रेमियों को चित्रित करने वाले चित्र आदि होते हैं।
o मुगल चित्रकलाएँ अक्सर लड़ाई, पौराणिक कहानियों, शिफा के दृश्य वन्यजीव, शाही जीवन जैसे विषयों के आसपास घूमती हैं।
o पौराणिक कथाओं आदि मुगल बादशाहों की लंबी कहानियों को बयान करने के लिए भी ये चित्रकला एक महत्त्वपूर्ण माध्यम बन गई हैं।
मुगल चित्रकला का विकास:-
o बाबर के काल में मुगल चित्रकला-
o मुगल काल के चित्रों में बाबर के शासनकाल के दौरान कुछ भी विकास देखने को नहीं मिलता है, क्योंकि बाबर का शासन काल बहुत अल्पकालिक था।
o बिहजाद, बाबर के समय का महत्त्वपूर्ण चित्रकार था बिहजाद को ‘पूर्व का राफेल’ कहा जाता है।
o तैमूरी चित्रकला शैली को चरमोत्कर्ष पर ले जाने का श्रेय बिहजाद को जाता है।
o हुमायूँ काल में मुगल चित्रकला-
o हुमायूँ ने अफग़ानिस्तान के अपने निर्वासन के दौरान मुगल चित्रकला की नींव रखी। फारस में ही हुमायूँ की मुलाकात मीर सैय्यद अली एवं ख्वाज़ा अब्दुस्समद से हुई जिन्होंने मुगल चित्रकला का शुभारंभ किया।
o मीर सैय्यद अली हेरात के प्रसिद्ध चित्रकार बिहजाद का शिष्य था। मीर सैय्यद ने जो कृतियाँ तैयार की उसमें से कुछ जहाँगीर द्वारा तैयार की गई गुलशन चित्रावली में संकलित है।
o हुमायूँ ने इन दोनों को दास्ताने-अमीर-हम्ज़ा (हम्ज़ानामा) की चित्रकारी का कार्य सौंपा।
o हम्ज़ानामा मुगल चित्रशाला की प्रथम महत्त्वपूर्ण कृति है। यह पैगंबर के चाचा अमीर हम्ज़ा के वीरतापूर्ण कारनामों का चित्रणीय संग्रह है। इसमें कुल 1200 चित्रों का संग्रह है।
o मुल्ला अलाउद्दीन कजवीनी ने अपने ग्रंथ ‘नफाई-सुल-मासिरे में हम्ज़ानामा को हुमायूँ के मस्तिष्क की उपज बताया।
o अकबर के काल में मुगल चित्रकला-
o अकबर के समय के प्रमुख चित्रकार मीर सैय्यद अली, दसवंत, बसावन, ख्वाज़ा, अब्दुस्समद, मुकुंद आदि थे। आइने अकबरी में कुल 17 चित्रकारों का उल्लेख है।
o मुगल काल के चित्रों ने अकबर के शासन काल में विकास में बड़े पैमाने का अनुभव किया। चूँकि अकबर महाकाव्यों, कथाओं में रुचि रखता था इसलिए उसके काल के चित्र रामायण, महाभारत और फारसी महाकाव्य पर आधारित है।
o अकबर द्वारा शुरू की गई सबसे प्रारंभिक पेंटिंग परियोजनाओं में से तूतीनामा महत्त्वपूर्ण थी। यह 52 भागों में विभाजित थी।
o दसवंत द्वारा बनाए गए चित्र रज़्मनामा नामक पांडुलिपि में मिलते हैं। अब्दुस्समद के राजदरबारी पुत्र मोहम्मद शरीफ ने रज़्मनामा के चित्रण कार्य का पर्यवेक्षण किया था। इसकी दो अन्य कृतियाँ हैं- ‘खानदाने तैमुरिया’ एवं ‘तूतीनामा’। रज़्मनामा पांडुलिपि को मुगल चित्रकला के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है।
o अकबर के समय में पहली बार ‘भित्ति चित्रकारी’ की शुरुआत हुई।
o बसावन, अकबर के समय का सर्वोत्कृष्ट चित्रकार था। वह चित्रकला में सभी क्षेत्रों, रंगों का प्रयोग, रेखांकन, छवि चित्रकारी तथा भू-दृश्यों के चित्रण का सिद्धहस्त था। उसकी सर्वोत्कृष्ट कृति है- एक मृतकाय (दुबले-पतले) घोड़े के साथ एक मजनू का निर्जन क्षेत्र में भटकता हुआ चित्र।
o अकबर के काल में पुर्तगाली पादरियों द्वारा राजदरबार में यूरोपीय चित्रकला भी आरंभ हुई। उससे प्रभावित होकर वह विशेष शैली अपनाई गई जिसमें चित्रों में करीब तथा दूरी का स्पष्ट बोध होता था।
o अकबर ने चित्रकार दसवंत को साम्राज्य का अग्रणी कलाकार घोषित किया था।
o अकबरकालीन चित्रकला में नीला, लाल, पीला, हरा, गुलाबी और सिंदूरी रंगों का इस्तेमाल हुआ। सुनहरे रंग का भी प्रचुरता से प्रयोग किया गया।
o इस काल में राजपूत चित्रकला का प्रभाव भी दिखाई देता है।
o जहाँगीर काल में चित्रकला-
o मुगल सम्राट जहाँगीर के समय में चित्रकारी अपने चरमोत्कर्ष पर थी। उसने ‘हेरात’ के ‘आगारज़ा’ नेतृत्त्व में आगरा में एक ‘चित्रशाला’ की स्थापना की।
o जहाँगीर ने हस्तलिखित ग्रंथों के विषयवस्तु को चित्रकारी करने की पद्धति को समाप्त किया और इसके स्थान पर छवि चित्रों,प्राकृतिक दृश्यों की पद्धति को अपनाया।
o जहाँगीर के समय के प्रमुख चित्रकारों में ‘फारुख बेग’, ‘दौलत’, ‘मनोहर’, ‘बिसनदास’, ‘मंसूर’ एवं अबुल हसन थे। ‘फारुख बेग’ ने बीजापुर के शासक सुल्तान ‘आदिल शाह’ का चित्र बनाया था।
o जहाँगीर चित्रकला का बड़ा कुशल पारखी था। जहाँगीर के समय को ‘चित्रकला का स्वर्ण काल’ कहा जाता है।
o मुगल शैली में मनुष्य को चित्र बनाते समय एक ही चित्र में विभिन्न चित्रकारों द्वारा मुख, शरीर तथा पैरों को चित्रित करने का रिवाज था। जहाँगीर का दावा था कि वह किसी चित्र में विभिन्न चित्रकारों के अलग-अलग योगदान को पहचान सकता है।
o शिकार, युद्ध और राज दरबार के दृश्यों को चित्रित करने के अलावा जहाँगीर के काल में मनुष्यों तथा जानवरों में चित्र बनाने की कला में विशेष प्रगति हुई। इस क्षेत्र में ‘मंसूर’ का नाम प्रसिद्ध था। मनुष्यों के चित्र बनाने का भी प्रचलन था।
o जहाँगीर के निर्देश पर चित्रकार चित्रकार ‘दौलत’ ने अपने साथ चित्रकार ‘बिसनदास’, ‘गोवर्धन’ एवं ‘अबुल हसन’ के चित्र एवं स्वयं अपना एक छवि चित्र बनवाया।
o सम्राट जहाँगीर ने अपने समय के अग्रणी चित्रकार बिसनदास को फारस के शाह, उसके अमीरों के तथा उसके परिजनों के यथारूप छवि- चित्र बनाकर लाने के लिए फारस भेजा था। जहाँगीर के विश्वसनीय चित्रकार ‘मनोहर’ ने उस समय में कई छवि चित्रों का निर्माण किया।
o जहाँगीर के समय में चित्रकारों ने सम्राट के दरबार, हाथी पर बैठकर धनुष-बाण के साथ शिकार का पीछा करना, जुलूस, युद्ध स्थल एवं प्राकृतिक दृश्य, फूल, पौधे, पशु-पक्षी, घोड़े, शेर, चीता आदि चित्रों को अपना विषय बनाया।
o जहाँगीर के समय भी चित्रकारी के क्षेत्र में घटी महत्त्वपूर्ण घटना थी- मुगल चित्रकला की फारसी प्रभाव से मुक्ति। पर्सी ब्राउन के अनुसार, जहाँगीर के समय मुगल चित्रकला की वास्तविक आत्मा लुप्त हो गई। इस समय चित्रकला में भारतीय पद्धति का विकास हुआ। यूरोपीय प्रभाव जो अकबर के समय से चित्रकला प्रारंभ हुआ था वह अभी भी जारी रहा।
o अबुल हसन ने ‘तुजुके जहाँगीर’ में मुख्य पृष्ठ के लिए चित्र बनाया था। ‘उस्ताद मंसूर’ एवं अबुल हसन जहाँगीर के श्रेष्ठ कलाकारों में से थे। उन्हें बादशाह ने क्रमशः ‘नादिर-उल-अस्र’ एवं ‘नादिरुज्जमा’’ की उपाधि प्रदान की थी।
o उस्ताद मंसूर दुर्लभ पशुओं, विरले पक्षियों एवं अनोखे पुष्पों आदि के चित्रों को बनाने के चित्रकार थे। उसकी महत्त्वपूर्ण कृति में ‘साइबेरियन सारस’ एवं बंगाल का एक पुष्प है। उस्ताद मंसूर पक्षी चित्र विशेषज्ञ तथा अबुल हसन व्यक्ति चित्र विशेषज्ञ था। यूरोपीय प्रभाव वाले चित्रकारों में ‘मिश्किन’ सर्वश्रेष्ठ था।
o इस काल में एक छोटे आकार के चित्र बनाने की परंपरा शुरू हुई जिसे पगड़ी पर लगाया जा सके या गले में पहना जा सके। छवि चित्रों के प्रचलन के साथ-साथ चित्रकला में मुरक्कें शैली (एलबम) तथा अलंकृत हशियें का विकास हुआ।
o ईरान के शाह अब्बास का स्वागत करते जहाँगीर, दर्जिन मेरी का चित्र पकड़े हुए जहाँगीर, मलिक अंबर के कटे सिर को लात मारते हुए जहाँगीर, आदि जहाँगीर कालीन प्रमुख चित्र थे।
o शाहजहाँ के काल में चित्रकला-
o शाहजहाँ के समय में आकृति-चित्रण और रंग सामंजस्य में कमी आ गई थी। उसके काल में रेखांकन और बॉर्डर बनाने की उन्नति हुई।
o शाहजहाँ को देवी प्रतीकों वाली अपनी तस्वीर बनाने का शौक था जैसे- उसके सिर के पीछे रोशनी का गोला।
o प्रमुख चित्रकार:- अनूप, मीर हासिम, मुहम्मद फकीर उल्ला, हुनर मुहम्मद नादिर, चिंतामणि।
o शाहजहाँ का एक विख्यात चित्र भारतीय संग्रहालय में उपलब्ध है, जिसमें शाहजहाँ को सूफी नृत्य करते हुए दिखाया गया है।
o इस काल के चित्रों के विशेष विषयों में यवन सुंदरियाँ, रंग महल, विलासी जीवन और ईसाई धर्म शामिल हुए। स्याह कलम चित्र बने, जिन्हें कागज की फिटकरी और सरेस आदि के मिश्रण से तैयार किया जाता था। इनकी खासियत बारीकियों का चित्रण था जैसे- दाढ़ी का एक-एक बाल दिखाना, रंगों को हल्की घुलन के साथ लगाना।
o शाहजहाँ के जो भी चित्र बने उन सब में प्रायः उसे सर्वोत्तम वस्त्र और आभूषण धारण किए चित्रित किया गया।
o इस दौर के एकल छवि चित्रों में यह विशेषता देखने में आती है कि गहराई और संपूर्ण दृश्य विधान प्रकट करने के लिये चित्रों की पृष्ठभूमि में दूर दिखाई देने वाला धुंधला नगर दृश्य हल्के रंगों में चित्रित किया गया।
o गुलिस्ताँ तथा सादी का बुस्तान, दरबारियों के बीच ऊँचे आसन पर विराजमान शाहजहाँ, पिता जहाँगीर और दादा अकबर की संगति में शाहजहाँ, जिसमें अकबर ताज शाहजहाँ को सौंप रहा है आदि शाहजहाँ कालीन प्रमुख चित्र है।
o औरंगजेब कालीन चित्रकला
o औरंगजेब ने चित्रकला को इस्लाम के विरुद्ध मानकर बंद करवा दिया था। किंतु उसके शासन काल के अंतिम वर्षों में उसने चित्रकारी में कुछ रूचि ली जिसके परिणाम स्वरूप उसके कुछ लघु चित्र शिकार खेलते हुए, दरबार लगाते हुए तथा युद्ध करते हुए प्राप्त होते हैं।
o औरंगजेब के के बाद चित्रकार अन्यत्र जाकर बस गए जहाँ अनेक क्षेत्रीय चित्रकला शैलियों का विकास हुआ।
o मनूची ने लिखा है कि “औरंगजेब की आज्ञा से अकबर के मकबरे वाले चित्रों को चूने से पोत दिया गया था।”
o मुगल चित्रकला की विशेषताएँ:-
o मुग़ल शैली के चित्रों के विषय- दरबारी शानो-शौकत, बादशाह की रुचियाँ आदि रहे।
o प्रकृति के घनिष्ठ अवलोकन और उत्तम तथा कोमल आरेखण पर आधारित सुरम्य प्रकृतिवाद मुगल शैली की एक विशेषता है। यह सौंदर्य के गुणों से परिपूर्ण है।
o मुगल चित्रकला में अधिक महीन काम किया गया है। महीन एवं नुकीली तूलिका से बहुत बारीक रेखा खींचने का अद्भुत कौशल यहाँ देखने को मिलता है। इसके अलावा अलंकरण पर भी बहुत बारीक काम किया गया। यहाँ तक कि कपड़ों की बेल-बूटे-भवनों की नक्काशी और फर्श की कारीगरी पर भी विशेष ध्यान दिया गया है।
o इस काल के अधिकतर चित्र कागज पर बनाए गए हैं। इसके अलावा कपड़े, भित्ति और हाथी दाँत पर भी चित्र बनाए गए हैं।
o चित्रकारों ने संध्या और रात्रि के चित्रांकन में भी रूचि ली है। ऐसे चित्रों में चाँदी और स्वर्ण रंग भरे गए हैं।
o मुगल काल में एक चश्मी चेहरे के अंकन की एक सामान्य परिपाटी का पालन किया गया।
o मुगल शैली का रंग विधान प्रचलित भारतीय परंपरा और ईरानी परंपरा से भिन्नता रखता है। इस शैली में लाजवर्दी और सुनहरे रंग का इस्तेमाल किया गया है। इन रंगों को बनाने में विशेष कौशल भी दिखता है। कूची या ब्रश को प्रायः गिलहरी के बालों से बनाया गया है।
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