भारत की पूर्व-ऐतिहासिक गुफा चित्रकारी ~ Pre- Historic Cave Painting of India.

Pre- Historic Cave Painting of India

भारत की पूर्व-ऐतिहासिक गुफा चित्रकारी 

भारतीय विद्वान् अनुमानतः कहते हैं कि लगभग 5 लाख वर्ष ई.पू. के आसपास यह देश मानव का निवास स्थान बना। चूँकि इस युग के लोग अपनी सभी आवश्यकताओं को केवल पाषाण (पत्थर) के उपकरणों की सहायता से ही पूरा करते थे इसलिए इस युग को पाषाण युग कहते हैं। अब तक जितने भी प्रमाण प्राप्त हुए हैं, उनके आधार पर 5 लाख ई.पू. से 2500 ई. तक के काल को भारतीय मानव की प्रगति का प्रागैतिहासिक युग माना जाता है। इस पाषाण काल को विद्वानों ने निम्न तीन भागों में (भारतीय मानव द्वारा प्रयोग किये गए पाषाण उपकरणों और जीवन पद्धति में समय-समय पर आये परिवर्तनों के आधार पर) विभाजित किया है।

भारत में 1963 ईस्वी में पुरापाषाण कालीन औजारों की खोज हुई रॉबर्ट ब्रूस फुट पहले व्यक्ति थे जिन्होंने की खोज की।

कला की उत्पत्ति कब और कैसे हुई इसके विषय में निश्चित रूप से हमारे पास कोई साक्ष्य नहीं है पर हम निश्चित तौर पर यह कह सकते हैं कि मानव जीवन के साथ ही कलाओं का जन्म हुआ होगा। प्रागैतिहासिक मानव ने सारी खोजे अचानक से हुई उदाहरण के लिए आग की खोज दो पत्थरों को रगड़ते हुए हुई। ऐसी ही कला का ज्ञान हुआ। जब हम गीले स्थान पर चलते हैं तो अपने पैरों के अवशेष छोड़ते है और अपनी छाया को देख कर हम उत्सुक हो जाते हैं। हो सकता है इसी को देखकर उसके मन में चित्र बनाने की जिज्ञासा जगी होगी। प्रागैतिहासिक काल की कला को तीन भागों में विभाजित किया गया है।

1. पूर्ण पाषाण काल- PALEOLITHIC AGE


2. मध्य पाषाण काल- MESOLITHIC AGE


3. उत्तर पाषाण काल-NEOLITHIC AGE

पूर्ण पाषाण काल


आरम्भ में माना जाता था कि पृथ्वी ईश्वर द्वारा बनाई गई है. परन्तु, वैज्ञानिकों ने इस धारणा को बदला. पहले मानव बन्दर की तरह झुककर हाथ और पैर दोनों से चलता था। बाद में वह सीधे खड़े होकर आज शाहरुख खान जैसे चलने लगा. दोनों हाथों के free हो जाने से वह इनसे अनेक काम करने लगा। बाद में तो मस्तिष्क से सोचने का काम करने लगा और आज विज्ञान हमारे सामने है।

इस का मानव पूर्ण रूप से जंगली जीवन व्यतीत करता था। उसका ज्यादातर समय भोजन की तलाश में ही व्यतीत होता था। इस युग के मानव ने आग की खोज की जो खोजो की श्रृंखला में उसका पहला कदम था। इस अवधि से हमे पशुओं की हड्डियों और शिकार के लिए प्रयोग में आने वाले हथियारों के साक्ष्य प्राप्त होते हैं इस समय का मानव पहाड़ो में निवास था। पेंटिंग की दृष्टि से कोई महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त नहीं जोते है। इस अवधि का मानव क्वर्टीजाईट मानव नाम से भी जाना जाता है। भारत में इस काल के मानव के साक्ष्य दक्षिण भारत से प्राप्त होते हैं।

PALEOLITHIC AGE FACTS

1. जिस समय आरंभिक मानव पत्थर का प्रयोग करता था, उस समय को पुरातत्त्वविदों ने पुरापाषाण काल नाम दिया है।

2. यह शब्द प्राचीन और पाषाण (पत्थर) से बना है।

3. यह वह कल था जब मनुष्य ने पत्थरों का प्रयोग सबसे अधिक किया।

4. पुरातत्त्वविदों के अनुसार, पुरापाषाण काल की अवधि बीस लाख साल पूर्व से बारह हजार साल पहले तक है।

5. इस युग को तीन भागों में बाँटा गया है – आरंभिक, मध्य और उत्तर पुरापाषाण युग।

6. माना जाता है कि मनुष्य इस युग में सबसे अधिक दिनों तक रहा है।

7. इस युग में मनुष्य खेती नहीं करता था बल्कि पत्थरों का प्रयोग कर शिकार करता था।

8. इस युग में लोग गुफाओं में रहते थे।

9. इस युग में सबसे महत्त्वपूर्ण काम जो मानव ने सीखा, वह था आग को जलाना. आग का उपयोग विभिन्न कार्यों के लिए होने लगा।

10. दक्षिण भारत में कुरनूल की गुफाओं में इस युग की राख के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

11. पुरातत्त्वविदों ने पुणे-नासिक क्षेत्र, कर्नाटक के हुँस्गी-क्षेत्र, आंध्र प्रदेश के कुरनूल-क्षेत्र में इस युग के स्थलों की खोज की है. इन क्षेत्रों में कई नदियाँ हैं, जैसे – ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा भीमा, वर्धा आदि. इन स्थानों में चूनापत्थर से बने अनेक पुरापाषाण औजार (weapons) मिले हैं।

12. नदियों के कारण इन स्थलों के जलवायु में नमी रहती है. यहाँ गैंडा और जंगली बैल के अनेक कंकाल मिले हैं. इससे अनुमान लगाया गया है कि इन क्षेत्रों में इस युग में आज की तुलना में अधिक वर्षा होती होगी. ऐसा अनुमान इस आधार पर लगाया है कि गैंडा और जंगली बैल नमीवाले स्थानों में रहना पसंद करते हैं।

13. अनुमान लगाया जाता है कि इस युग का अंत होते-होते जलवायु में परिवर्तन होने लगा. धीरे-धीरे इन क्षेत्रों के तापमान में वृद्धि हुई।

14. इस युग का मनुष्य चित्रकारी करता था जिसका प्रमाण उन गुफाओं से मिलता है जहाँ वह रहता था।

मध्य पाशाण काल ​​(25000 से 10000 ईसा पूर्व तक)


पुरापाषाण काल लगभग एक लाख वर्ष तक रहा. उसके बाद मध्यपाषाण या मेसोलिथिक युग (Mesolithic Age) आया। बदले हुए युग में कई परिवर्तन हुए। जीवनशैली में बदलाव आया. तापमान में भी वृद्धि हुई. साथ-साथ पशु और वनस्पति में भी बदलाव आये. इस युग को मध्यपाषण युग (Mesolithic Age) इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह युग पुरापाषाण युग और नवपाषाण युग के बीच का काल है. भारत में इस युग का आरम्भ 8000 ई.पू. से माना जाता है। यह काल लगभग 4000 ई.पू. के आस-पास उच्च पुरापाषाण युग का अंत हो गया और जलवायु उष्ण और शुष्क हो गया। परिणामस्वरूप बहुत सारे मौसमी जलस्रोत सूख गए होंगे और बहुत सारे जीव-जन्तु दक्षिण अथवा पूर्व की ओर प्रवास कर गए होंगे, जहाँ कम से कम मौसमी वर्षा के कारण लाभकारी और उपयुक्त घनी वनस्पति बनी रह सकती थी। जलवायु में परिवर्तनों के साथ-साथ वनस्पति व जीव-जन्तुओं में भी परिवर्तन हुए और मानव के लिए नए क्षेत्रों की ओर आगे बढ़ना संभव हुआ।

यह काल पूर्व पाषाण और नव पाषाण के मध्य का समय है इस युग में कलात्मक अवशेषों का आभाव पाया जाता है। इस काल के विषय में बहुत कम जानकारी प्राप्त होती है।इस युग में प्राप्त औजारों को चमकिले और ज्यामितीय रूप प्रदान किया गया औजारों का आकार छोटा होता गया जिन्हे मैक्रोलिथ्स ने कहा जाता है जो मानव की सौन्दर्य बोधक ग्रंथियों के विकाश का परिचायक है।
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MESOLITHIC AGE FACTS

1. तापमान में बदलाव आया. गर्मी बढ़ी। गर्मी बढ़ने के कारण जौ, गेहूँ, धान जैसी फसलें उगने लगीं।

2. इस समय के लोग भी गुफाओं में रहते थे।

3. पुरातत्त्वविदों को कई स्थलों से मेसोलिथिक युग के अवशेष मिले हैं।

4. पश्चिम, मध्य भारत और मैसूर (कर्नाटक) में इस युग की कई गुफाएँ मिलीं हैं।

5. मध्यपाषाण युग में लोग मुख्य रूप से पशुपालक थे। मनुष्यों ने इन पशुओं को चारा खिलाकर पालतू बनाया। इस प्रकार मध्यपाषाण काल में मनुष्य पशुपालक बना।

6. इस युग में मनुष्य खेती के साथ-साथ मछली पकड़ना। शहद जमा करना, शिकार करना आदि कार्य करता था।

उत्तर पाशाण काल ( 10000 से 3000 ईसा पूर्व तक)

मध्यपाषाण काल के बाद नवपाषाण युग में मनुष्य के जीवन में बहुत अधिक परिवर्तन आया. इस युग में वह भोजन का उत्पादक हो गया अर्थात् उसे कृषि पद्धति का अच्छा ज्ञान हो गया. यह पाषाणयुग की तीसरी और अंतिम कड़ी है. भारत में 4,000 ई.पू. से यह यह शुरू हुआ और संभवतः 2500 ई.पू. तक चलता रहा. इस युग में मनुष्य का मस्तिष्क अधिक विकसित हो चुका था. उसने अपने बौद्धिक विकास, अनुभव, परम्परा और स्मृति का लाभ उठाकर अपने पूर्व काल के औजारों व हथियारों को काफी सुधार लिया. दक्षिण भारत और पूर्व भारत में अनेक स्थलों पर इस संस्कृति के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं. दक्षिण भारत में गोदावरी नदी के दक्षिण में ये साक्ष्य मिले हैं. इस युग में भारतीय मानव ने ग्रेनाइट की पहाड़ियों अथवा नदी तट के समीप बस्तियाँ स्थापित की थीं. पूर्वी भारत में गंगा, सोन, गंडक और घाघरा नदियों के डेल्टाओं में मानव रहता था।

नवपषाण काल की सबसे बड़ी उपलब्धि कृषि का विकास था कृषि के ज्ञान ने आदिमानव को एक जगह स्थाई रूप से बसने के लिए विवश कर दिया, खेती में सहायता के लिए जानवरों को पालतू बनाया और बस्तियों में रहने लगा। पहिए के पाने ने उसकी संभावनाओं को और अधिक बल दिया अब वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर शीघ्रता के साथ जा सकता था।

कुंभकारी द्वारा वह अब हाथ से बने बर्तनों का प्रयोग करने लगा उसके द्वारा बनाए गए औजार साफ और सुथरे होते थे इस काल के मानव ने सामूहिक प्रयास से शिकार करना सीख लिया था चित्रकला का प्रारंभ इसी युग से माना जा सकता है मानव ने इन चित्रों के माध्यम से अपने जीवन के कुछ आनंदमयी और भय से युक्त क्षणों को व्यक्त किया है इस काल के चित्र भारत के है। लगभग सभी भागों से प्राप्त होते हैं, लेकिन सुरक्षा के कारणों से प्रागैतिहासिक मानव पहाड़ों को छोड़ ना गया ।
 
NEOLITHIC AGE FACTS

1. उसे पता लग गया कि बीज से वनस्पति बनता है। वह बीज बोने लगा।

2. बीज बोने के साथ-साथ उसने सिंचाई करना भी सीखा।

3. वह अनाज के पकने पर उसकी कटाई कर उसका भंडारण करना सीख गया।

4. नवपाषाण काल (Neolithic Age) में मनुष्य कृषक और पशुपालक दोनों था।

5. कई स्थलों पर इस युग के अनाज के दानें मिलें हैं. इन दानों से पता लगता है कि उस समय कई फसलें उगाई जाती थीं।

6. उत्तर -पश्चिम में मेहरगढ़ (पाकिस्तान में), गुफकराल और बुर्जहोम (कश्मीर में), कोल्डिहवा और महागढ़ा (उत्तर प्रदेश में), चिरांद (बिहार में), हल्लूर और पैय्य्मपल्ली (आंध्र प्रदेश में) गेहूँ, जौ, चावल, ज्वार-बाजरा, दलहन, काला चना और हरा चना जैसी फसलें उगाने के प्रमाण मिले हैं।

7. इस युग में मनुष्य कृषिकार्य के कारण एक स्थान पर स्थाई रूप से रहना शुरू कर दिया. कहीं-कहीं झोपड़ियों और घरों के अवशेष मिले हैं।

8. बुर्जहोम में गड्ढे को घर बनाकर रहने के साक्ष्य मिले हैं. ऐसे घर को गर्तवास का नाम दिया गया।

9. मेहरगढ़ में कई घरों के अवशेष मिले हैं, जो चौकोर और आयतकार हैं।

10. नवपाषाण युग में कृषक और पशुपालक एक साथ एक स्थान पर छोटी-छोटी बस्तियाँ बनाकर रहने लगे।

11. परिवारों के समूह ने जनजाति को जन्म दिया. जन्मजाति के सदस्यों को आयु, बुद्धिमत्ता और शारीरिक बल के आधार पर कार्य दिया जाता था।

12. ज्येष्ठ और बलशाली पुरुष को जनजाति का सरदार बनाया जाता था।

13. नवपाषाण काल (Neolithic Age) में जनजातियों की अपनी संस्कृति और परम्पराएँ होती थीं. भाषा, संगीत, चित्रकारी (Language, music, painting etc.) आदि से इनकी संस्कृति का ज्ञान होता है।

14. इस काल में लोग जल, सूर्य, आकाश, पृथ्वी, गाय और सर्प की पूजा (worship) विशेष रूप से करते थे।

15. इस काल में बने मिट्टी के बरतन कई स्थलों से प्राप्त हुए हैं. इन बरतनों पर रंग लगाकर और चित्र बनाकर उन्हें आकर्षक बनाने का प्रयास करते थे।

1880 इसवी मैं कार्लाइल अफ ने विंध्याचल पर्वत श्रेणी में मिर्जापुर के निकट कैमूर पहाड़ी से कुछ गुफा चित्रों की खोज की लेकिन वह इनकी सूचना मात्र दे सके, इसके बाद 1883 ईसवी में काकबर्न ने इन चित्रों का सचित्र लौंडिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल में प्रकाशित कराया। घोड़ा बंगर नामक स्थान से गैंडे के opet का दृश्य की रेखा अनु की प्रकाशित की गई भारतीय खोजियो में पंचानन मिश्र, अमरनाथ दत्त, प्रोफेसर कृष्णदत्त बाजपेई श्रीधर वालनकर और आर वी जोशी प्रमुख हैं।
 
प्रागैतिहासिक काल के प्रमुख गुफा चित्र


संगीत का आनंद लेते हुए प्रेमी युगल, पंचमढ़ी

पंचमढ़ी


1932 में जी आर हंटर ने सर्वप्रथम गुफाओं को देखा और ये गुफाएँ महादेव पर्वत माला में स्थित है जो पंडवों का निवास स्थान मानी जाती है उसी के नाम पर इन्हें पंचमढ़ी नाम से जाना जाता है महादेव पर्वत के चारों ओर इमली खोह में सांभर, बैल महिष का चित्र, मंडा देव की गुफा में शेर का आखेट का दृश्य, बाजार केव में विशालकाय बकरी का दृश्य, जम्मू दीप से शाही के opet का दृश्य प्राप्त हुआ है पंचमढ़ी में चित्रों की तीन तस्वीरें मिलती हैं ये चित्रों के अतिरिक्त अंतिम स्तर के चित्र हैं संगीत सामाजिक जीवन, संगीत-संगीत आदि विषय से संबंधित चित्रण किया गया है।
 
भीमबेटका
इस गुफा की खोजं जैन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीधर विष्णु वाकणकर ने की थी यहां पर कुल 600 गुफाएं हैं जिनमें से 275 में चित्र प्राप्त होते हैं यहां से चित्रों के 2 स्तर प्राप्त होते हैं पहले स्तर के चित्रों में शिकार, नृत्य और जंगली जानवरों का चित्रण। है जबकि दुसरे स्तर के चित्रों में जानवरों को मानव सहचर के रूप के में दिखाया गया है।



शहद एकत्र करते हुए, पंचमढ़ी

मंदसौर (सांकेतिक चित्र)


मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में मोरी नामक स्थान पर लगभग 30 गुफाएं प्राप्त हुई हैं जिनमें प्रतीकात्मक चित्रण किया गया है इन चित्रों में स्वास्तिक सूर्य चक्र अनंत कमल समूह पीपल की पत्तियों का प्रतिकात्मक चित्रण एवं देहाती बास की गाड़ी की झलक है।
 
होशंगाबाद (आदमगढ़)

पंचमढ़ी से 45 मील दूर नर्मदा नदी के तट पर कुछ गुफाओं की खोज मनोरंजन की घोषणा 1922 ईस्वी में की यहाँ आखेट के दृश्यों के अतिरिक्त जिराफ समूह, हाथी, विशालकाय महिष और जंगली मोर आदि के चित्र मिले हैं साथ ही केवल अलीश्वरवरहि सैनिकों के चित्र स्टैंसिल विधि। में यह किए गए हैं यहां से छलिंग लगाता हुआ बारहसिंघा का प्रसिद्ध चित्र प्राप्त हुआ है।

सिंघनपुर

सिंघनपुर मांढ नदी के किनारे 50 प्रतिबिंब गुफाएं मिली हैं इनकी खोज 1910 में डब्लू एंडरसन ने की बाद में अमरनाथ दत्त 1913 पारसी ब्रूक 1917 ने इन गुफा चित्रों का सचित्र पुन प्रकाशित किया गुफाओं के मुख्य चित्र, घायल भैंसा, असंयत गढ़न का कंगारू आदि चित्र दिखाए हैं। क्या इन स्थानों के अतिरिक्त रायसेन रीवा पन्ना छतरपुर कटनी नरसिंहपुर से ग्वालियर उदयगिरि धर्मपुरी चंबल नदी घाटी में पाषाणसर्वप्रथम प्रागैतिहासिक चित्रों की खोज उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर नामक स्थान पर हुई।

इसकी खोज 1880 ईस्वी में कार्लाइल ने की यह विंध्याचल पर्वत श्रेणी की कैमूर पहाड़ी पर सोन नदी के किनारे पर 100 से अधिक चित्र शिलाश्रय प्राप्त हुए हैं चित्रों का मुख्य विषय आखेट के साथ-साथ घरेलू जनजीवन जो अभी से यह प्रतीत होता है कि यह चित्र है पाषाण काल ​​के अंतिम चरण तक बनाए रखने जा रहे हैं प्रमुख गुफाओं में कोहबर विजयगढ़ भटरिया लिखूनिया कॉनडेवव बागापथरी घोड़ा मंगर आदि मिली है इनमें से घोड़ा मंगर से गैंडे के ऑपटेट का दृश्य महुएरिया से ऊंट के ओपेट का दृश्य भोटिया से सूअर के आखेट का दृश्य प्रसिद्ध है। यहाँ पर अधिकांश चित्र गेरू रंग से बने हैं।

बाँदा

बांदा में प्रागैतिहासिक चित्रों की खोज 1907 में सिल्वर राट ने की मानिकपुर के निकट प्राप्त एक शिलाश्रय से अश्वारोहियों का चित्र प्राप्त हुआ है यहां से प्राप्त पहिया रहित छकड़ा गाड़ी का चित्र विशेष प्रसिद्ध है
बिहार के गुहा चित्र

इस प्रदेश में चक्रधरपुर शाहाबाद आदि स्थानों से लेटे हुए शिकारी नृत्य करती हुई आकृतियां एवं प्रतिकात्मक चित्र प्राप्त हुए हैं

नोट:-

बिहार के विभाजन के पश्चात चक्रधरपुर वर्तमान में झारखंड में पड़ता झारखंड में चक्रधरपुर रेलवे स्टेशन पर स्थानीय महिलाओं द्वारा सोहराई चित्र बनाए गए जो झारखंड की संस्कृत का प्रतिनिधित्व करते हैं यहां पर 15 से अधिक जनजातियां पाई जाती है जिनके अलग अलग आर्ट फॉर्म है परंतु वर्तमान में यह परंपरा किताबों और संग्रहालय तक सीमित है ।

राजस्थान


चंबल नदी घाटी अलनिया भरतपुर तथा गागरोन से कुछ प्रागैतिहासिक चित्र प्राप्त हुए हैं जिनका का समय लगभग 5000 ईसापूर्व के आसपास का माना जाता है स्थानीय लोग अलनिया गुफा को सीता जी का मांडा भी कहते हैं

दक्षिण भारत के ऐतिहासिक चित्रों के केंद्र
बेल्लारी

बेल्लारी गुफा की खोज 1892 ईस्वी में एक अंग्रेज अधिकारी F फासेन्ट ने की। इससे पहले ब्रूसफुट नामक विद्वान ने 1863 में पल्लावरम नामक स्थान से प्रस्तर उपकरणों की खोज की थी यहां आखेट के अतिरिक्त की प्रतीकात्मक चित्रों की बहुलता मिलती है एक गुफा में षटकोण का चिन्ह भी प्राप्त हुआ है पारसी ब्राउन ने इन चित्रों को स्पेन की कोगुल गुफा के समान माना है।

बाईनाड के एडकल

केरल तमिलनाडु सीमा पर स्थित गुफाओं की खोज एफ फ़ासेन्ट ने 1901 में की यहां से भी बेल्लारी के समान है। बील्लास रंगम
यहां से पाषाण कालीन अवशेषों के अतिरिक्त प्रतिकात्मक चित्र भी प्राप्त हुए हैं।

प्रागैतिहासिक चित्रों की विशेषताएं
चित्रण विषय

प्रागैतिहासिक कालीन मानव का अधिकांश समय आखेट में व्यतीत होता था शिकार उसके विचारों एवं मस्तिष्क पर इतना हावी हो चुका था कि वह इनकी स्मृतियों को रेखाओं के माध्यम से पत्थरों पर उकेरता गया आदिम मानव भयंकर जानवरों की शक्ति के सामने अपने को तुच्छ पाता जैसे जैसे उसने अपने ज्ञान और विवेक से इनके ऊपर विजय प्राप्त की वैसे ही उसके द्वारा बनाए गए चित्रों में जानवरों का आकार छोटा होता गया मनुष्य की जीवनशैली में परिवर्तन के साथ ही विषयों में भी परिवर्तन आया जिन पशुओं का वह आखेट करता था उन्हें पालने लगा उनकी सहायता से कृषि करने लगा कृषि के आविष्कार ने मनुष्य की दिनचर्या में व्यापक परिवर्तन किए अब वह बस्तियों में स्थाई रूप से रहने लगा था इस समय के चित्रों के उदाहरण भीमबेटका से प्राप्त ग्राम्य जीवन, पंचपंचमढी से संगीत जा आनंद लेते हुये है।

चित्रण प्रविधि

आदि मानव ने चित्रों में रंग भरने के लिए रंगों को चरबी में मिलाकर किसी रेशेदार लकड़ी या नरकुल की कुची बनाकर चित्रों में भरा है रंगों को मिलाने के लिए जानवरों की हड्डियों का प्रयोग किया जाता था इस काल के मनुष्य ने खनिज रंगों का प्रयोग किया है इनमें लाल पीला काला प्रमुख हैं चित्रों के निर्माण के लिए सर्वप्रथम एक नुकीले पत्थर से आउटलाइन कर ली जाती थी तत्पश्चात उनमें रंग भरे जाते थे इनमें रेखांकन गलत होने पर सुधार की संभावना ना के बराबर थी।



जंगली भैंसा, होशंगाबाद


प्रागैतिहासिक काल से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण बिंदु

1 चित्रण का उद्देश्य अपने विचारों को व्यक्त करना था।

2 सभी प्रागैतिहासिक चित्र गुफाओं की छतों वह दीवारों पर बने हैं।
3 खनिज रंगों में गेरू रामरज हिरोजी चूना पत्थर खड़िया रसायनिक रंगों में कोयला वनस्पतिक रंगों में हरा रंग आता है 4 प्रायः गुफाओं में चित्रों के अनेक स्तर मिलते हैं चित्रों के निर्माण में सरल रूपों तथा ज्यामिति आकारों का प्रयोग हुआ है।
5 भारतीय प्रागैतिहासिक चित्रों की खोज का श्रेय कर्क बार्न एवं कार्लाइल महोदय को दिया जाता है।
6 दक्षिण भारतीय गुफा चित्रों की तुलना स्पेन की प्रागैतिहासिक गुफा चित्रों से किया गया है।
7 ज्यामितीय या प्रतीकात्मक चित्रों का विकास नवपाषाण युग काल के अंतिम समय में हुआ ।
8 प्रागैतिहासिक मानव द्वारा जादू टोने में विश्वास के साक्ष्य प्राप्त होते हैं जैसे स्वास्तिक चतुष्कोण षटकोण ।
9 चित्रों के निर्माण में कोनी रेखाओं का प्रयोग किया गया है।
10 सभी प्राप्त चित्रों को रेखा चित्रों को उचित मानना ​​होगा ।
11 विभिन्न लोककलाओं और जनजातियों की कलाओं में प्रागैतिहासिक कला के समान आज भी चित्रण देखा जा सकता है ।
12 विश्व स्तर: सर्वधर्म प्रागैतिहासिक चित्रों की खोज है। 1879 इसवी में अल्तामिरा में और 1880 ईस्वी में भारत में मिर्जापुर नामक स्थान पर हुआ ।

13 मध्य प्रदेश के कई गुफाओं मे क्षेपाकन पद्धति से चित्रण हुआ है।

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