अमरावती मूर्तिकला~Amaravati Sculpture.
अमरावती मूर्तिकला
अमरावती मूर्तिकला एक प्राचीन मूर्तिकला शैली है, जो दक्षिण-पूर्वी भारत में लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. से तीसरी शताब्दी ई.पू. तक सातवाहन वंश के शासनकाल में फली-फूली। यह शैली कृष्णा और गोदावरी नदियों के किनारे विकसित हुई हैं। यह अपने भव्य उभारदार भित्ति चित्रों के लिए जानी जाती है, जो संसार में कथात्मक मूर्तिकला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। यह मूर्तिकला अपनी विशिष्टता और उत्कृष्ट कला-कौशल के कारण काफ़ी प्रसिद्धि पा चुकी थी।
अमरावती शैली का विकास भारत के दक्षिणी भाग में सातवाहन शासकों के नेतृत्व में कृष्णा नदी के तट पर हुआ। पूर्व की दोनों शैलियों में जहाँ एकल मूर्ति पर बल दिया गया। वहीं अमरावती शैली की मूर्तियों में गतिशील मूर्तियों, आकृतियों और कथात्मक कला का विकास हुआ। इस शैली की मूर्तियों में 'त्रिभंग आसन' अर्थात तीन झुकावों वाले शरीर (body with three inclinations) का प्रयोग किया गया है।
अमरावती के विशाल स्तूप या स्मृति-टीले के खंडहरों के साथ-साथ यह शैली आंध्र प्रदेश के जगय्यापेट, नागार्जुनकोंडा और गोली में तथा महाराष्ट्र राज्य के 'तेर के स्तूप' के अवशेषों में भी देखी जाती है। यह शैली श्रीलंका (अनुराधापुरा में) और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई भागों में भी फैली हुई है।
अमरावती स्तूप
अमरावती स्तूप का निर्माण लगभग 200 ई.पू. में प्रारंभ किया गया था और उसमें कई बार नवीनीकरण तथा विस्तार हुए। यह स्तूप बौद्ध काल में बनाए गए विशाल आकार के स्तूपों में से एक था। इसका व्यास लगभग 50 मीटर तथा ऊंचाई 30 मीटर थी, जो अब अधिकांशत: नष्ट हो चुकी है। इसके कई पत्थर 19वीं सदी में स्थानीय ठेकेदारों द्वारा चूना बनाने के काम में ले लिए गए। बचे हुए अनेक कथात्मक उभरे चित्र फलक तथा सजावटी फलक अब चेन्नई के राजकीय संग्रहालय और लन्दन के ब्रिटिश म्यूजियम में है।
शैली की विभिन्न विशेषताएँ इस प्रकार हैं:-
आधार~अमरावती शैली
कालखंड~मौर्योत्तर काल
संरक्षण~सातवाहन राजाओं का
प्रभाव विस्तार~कृष्णा-गोदावरी की निचली घाटी में, अमरावती और नागार्जुनकोंडा में और उसके आसापास के क्षेत्रों में।
बाह्य प्रभाव~यह शैली भी स्वदेशी रूप से विकसित हुई
धार्मिक संबद्धता~मुख्य रूप से बौद्ध धर्म का प्रभाव
प्रयुक्त सामग्री~सफ़ेद संगमरमर का इस्तेमाल
बुद्ध मूर्ति की विशेषताएँ~मूर्तियाँ सामान्यत: बुद्ध के जीवन और जातक कलाओं की कहानियों को दर्शाती हैं।
मूर्तिकला भारतीय उपमहाद्वीप में हमेशा से कलात्मक अभिव्यक्ति का प्रिय माध्यम रही है। भारतीय मूर्तिकला का स्वरूप अधिक रोचक, सहज, धार्मिक और स्थानीयता से युक्त है। भारत में मूर्तिकला का विकास अन्य ललित कलाओं जैसे- स्थापत्य एवं चित्रकला के साथ ही हुआ। भारत में मूर्तिकला का विकास अनेक रूपों जैसे- मृण्मूर्तिकला, धातु मूर्तिकला, पाषाण मूर्तिकला आदि के रूप में हुआ।
सातवाहन काल के दौरान द्वितीय शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अमरावती मूर्तिकला का प्रादुर्भाव हुआ। इस मूर्तिकला का विकास अमरावती में होने के कारण इसे अमरावती मूर्तिकला शैली कहा गया। अमरावती दक्षिण भारत के गुंटूर ज़िले के पास स्थित है। अमरावती मूर्तिकला शैली बाह्य संस्कृतियों से प्रभावित नहीं थी, यह स्वदेशी शैली से विकसित हुई थी। यह मूर्तिकला आंध्र प्रदेश के जग्गबयापेट, नागार्जुन कोंडा तथा महाराष्ट्र में तेर के स्तूप के अवशेषों में देखी जा सकती है।
अमरावती मूर्तिकला में ज़्यादातर बुद्ध के जीवन की घटनाओें, पूर्वजन्म की कथाओं (जातक कथाओं) का चित्रण है। हाव-भाव तथा सौंदर्य की दृष्टि से अमरावती कला-शैली की मूर्तियाँ सभी मूर्तियों में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं।
इस कला में धार्मिक तत्त्वों के प्रभाव के रूप में बौद्ध का प्रभाव मुख्य रूप से दिखाई देता है जिसमें बुद्ध की व्यक्तिगत विशेषताओं पर कम बल दिया गया है। परंतु बौद्ध मूर्तियों में उनके जीवन एवं जातक कथाओं की कहानियाँ इस कला के धार्मिक पक्षों को व्यक्त करती हैं। अमरावती मूर्तिकला की कुछ मूर्तियों में स्त्रियों को उनके पाँव पूजते हुए दर्शाया गया है, यहाँ पाँवों का पूजन धार्मिक महत्त्व को व्यक्त करता है।
अमरावती मूर्तिकला में लिंगराज पल्ली से प्राप्त धम्मचक्र, बोधिसत्व तथा बौद्धमत के रत्नों को दर्शाने वाली एक गुंबजाकार पट्टी प्राप्त हुई है जिसमें बौद्ध, धम्म एवं संघ तीनों को निरूपित किया गया है।
- अमरावती मूर्तिकला में धार्मिक तत्त्वों के समावेश के साथ-साथ लोकोन्मुखी तत्त्व भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं।
- अमरावती, मूर्तिकला के माध्यम से पहली बार शारीरिक एवं भावनात्मक अभिव्यक्तियों में निकटता आई।
- अमरावती मूर्तिकला में आभूषणों की न्यूनतम संख्या स्त्रियों में आभूषणों के प्रति कम आकर्षण को इंगित करती है।
- अमरावती शैली में सजीवता एवं भक्तिभाव के साथ कुछ मूर्तियों में काम विषयक अभिव्यक्तियाँ देखने को मिलती हैं जो इसे लोकोन्मुखी बनाती हैं।
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