सौंदर्यशास्र~AESTHETICS

AESTHETICS - सौंदर्यशास्र

Definition of Arts - कला की परिभाषा:-

कला (आर्ट) शब्द इतना व्यापक है कि विभिन्न विद्वानों की परिभाषाएँ केवल एक विशेष पक्ष को छूकर रह जाती हैं। कला का अर्थ अभी तक निश्चित नहीं हो पाया है, यद्यपि इसकी हजारों परिभाषाएँ की गयी हैं। भारतीय परम्परा के अनुसार कला उन सारी क्रियाओं को कहते हैं जिनमें कौशल अपेक्षित हो। यूरोपीय शास्त्रियों ने भी कला में कौशल को महत्त्वपूर्ण माना है।

कला एक प्रकार का कृत्रिम निर्माण है जिसमे शारीरिक और मानसिक कौशलों का प्रयोग होता है।

इतिहास:-


कला शब्द का प्रयोग शायद सबसे पहले भरत के "नाट्यशास्त्र" में ही मिलता है। पीछे वात्स्यायन और उशनस् ने क्रमश: अपने ग्रंथ "कामसूत्र" और "शुक्रनीति" में इसका वर्णन किया।

"कामसूत्र", "शुक्रनीति", जैन ग्रंथ "प्रबंधकोश", "कलाविलास", "ललितविस्तर" इत्यादि सभी भारतीय ग्रंथों में कला का वर्णन प्राप्त होता है। अधिकतर ग्रंथों में कलाओं की संख्या 64 मानी गयी है। "प्रबंधकोश" इत्यादि में 72 कलाओं की सूची मिलती है। "ललितविस्तर" में 86 कलाओं के नाम गिनाये गये हैं। प्रसिद्ध कश्मीरी पंडित क्षेमेंद्र ने अपने ग्रंथ "कलाविलास" में सबसे अधिक संख्या में कलाओं का वर्णन किया है। उसमें 64 जनोपयोगी, 32 धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, सम्बन्धी, 32 मात्सर्य-शील-प्रभावमान सम्बन्धी, 64 स्वच्छकारिता सम्बन्धी, 64 वेश्याओं सम्बन्धी, 10 भेषज, 16 कायस्थ तथा 100 सार कलाओं की चर्चा है। सबसे अधिक प्रामाणिक सूची "कामसूत्र" की है।

यूरोपीय साहित्य में भी कला शब्द का प्रयोग शारीरिक या मानसिक कौशल के लिए ही अधिकतर हुआ है। वहाँ प्रकृति से कला का कार्य भिन्न माना गया है। कला का अर्थ है रचना करना अर्थात् वह कृत्रिम है। प्राकृतिक सृष्टि और कला दोनों भिन्न वस्तुएँ हैं। कला उस कार्य में है जो मनुष्य करता है। कला और विज्ञान में भी अंतर माना जाता है। विज्ञान में ज्ञान का प्राधान्य है, कला में कौशल का। कौशलपूर्ण मानवीय कार्य को कला की संज्ञा दी जाती है। कौशलविहीन या बेढब ढंग से किये गये कार्यों को कला में स्थान नहीं दिया जाता।

वर्गीकरण:-


कलाओं के वर्गीकरण में मतैक्य होना सम्भव नहीं है। वर्तमान समय में कला को मानविकी के अन्तर्गत रखा जाता है जिसमें इतिहास, साहित्य, दर्शन और भाषाविज्ञान आदि भी आते हैं।

पाश्चात्य जगत में कला के दो भेद किये गये हैं- उपयोगी कलाएँ (Practice Arts) तथा ललित कलाएँ (Fine Arts)। परम्परागत रूप से निम्नलिखित सात को 'कला' कहा जाता है-

· स्थापत्य कला (Architecture)

· मूर्त्तिकला (Sculpture)

· चित्रकला (Painting)

· संगीत (Music)

· काव्य (Poetry)

· नृत्य (Dance)

· रंगमंच (Theatre/Cinema)

आधुनिक काल में इनमें फोटोग्राफी, चलचित्रण, विज्ञापनऔर कॉमिक्स जुड़ गये हैं।

उपरोक्त कलाओं को निम्नलिखित प्रकार से भी श्रेणीकृत कर सकते हैं-

· साहित्य - काव्य, उपन्यास, लघुकथा, महाकाव्य आदि

· निष्पादन कलाएँ (performing arts) – संगीत, नृत्य, रंगमंच

· पाक कला (culinary arts) - बेकिंग, चॉकलेटरिंग, मदिरा बना

· मिडिया कला - फोटोग्राफी, सिनेमेटोग्राफी, विज्ञापन

· दृष्य कलाएँ - ड्राइंग, चित्रकला, मूर्त्तिकला

कुछ कलाओं में दृश्य और निष्पादन दोनों के तत्त्व मिश्रित होते हैं, जैसे फिल्म।

कला का महत्त्व:-

जीवन, ऊर्जा का महासागर है। जब अंतश्‍चेतना जाग्रत होती है तो ऊर्जा जीवन को कला के रूप में उभारती है। कला जीवन को सत्‍यम् शिवम् सुन्‍दरम् से समन्वित करती है। इसके द्वारा ही बुद्धि आत्‍मा का सत्‍य स्‍वरुप झलकता है। कला उस क्षितिज की भाँति है जिसका कोई छोर नहीं, इतनी विशाल इतनी विस्‍तृत अनेक विधाओं को अपने में समेटे, तभी तो कवि मन कह उठा-

साहित्‍य संगीत कला वि‍हीनः साक्षात् पशुः पुच्‍छ विषाणहीनः ॥

रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मुख से निकला “कला में मनुष्‍य अपने भावों की अभिव्‍यक्ति करता है ” तो प्लेटो ने कहा - “कला सत्‍य की अनुकृति के अनुकृति है।”

टालस्‍टाय के शब्‍दों में अपने भावों की क्रिया रेखा, रंग, ध्‍वनि या शब्‍द द्वारा इस प्रकार अभिव्‍यक्ति करना कि उसे देखने या सुनने में भी वही भाव उत्‍पन्‍न हो जाए कला है। हृदय की गइराईयों से निकली अनुभूति जब कला का रूप लेती है, कलाकार का अन्‍तर्मन मानो मूर्त ले उठता है चाहे लेखनी उसका माध्‍यम हो या रंगों से भीगी तूलिका या सुरों की पुकार या वाद्यों की झंकार। कला ही आत्मिक शान्ति का माध्‍यम है। यह ‍कठिन तपस्‍या है, साधना है। इसी के माध्‍यम से कलाकार सुनहरी और इन्‍द्रधनुषी आत्‍मा से स्‍वप्निल विचारों को साकार रूप देता है।

कला में ऐसी शक्ति होनी चाहिए कि वह लोगों को संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठाकर उसे ऐसे ऊँचे स्‍थान पर पहुँचा दे जहाँ मनुष्‍य केवल मनुष्‍य रह जाता है। कला व्‍यक्ति के मन में बनी स्‍वार्थ, परिवार, क्षेत्र, धर्म, भाषा और जाति आदि की सीमाएँ मिटाकर विस्‍तृत और व्‍यापकता प्रदान करती है। व्‍यक्ति के मन को उदात्‍त बनाती है। वह व्‍यक्ति को “स्‍व” से निकालकर “वसुधैव कुटुम्‍बकम्” से जोड़ती है।

कला ही है जिसमें मानव मन में संवेदनाएँ उभारने, प्रवृत्तियों को ढालने तथा चिंतन को मोड़ने, अभिरुचि को दिशा देने की अद्भुत क्षमता है। मनोरंजन, सौन्‍दर्य, प्रवाह, उल्‍लास न जाने कितने तत्त्वों से यह भरपूर है, जिसमें मानवीयता को सम्‍मोहित करने की शक्ति है। यह अपना जादू तत्‍काल दिखाती है और व्यक्ति को बदलने में, लोहा पिघलाकर पानी बना देने वाली भट्टी की तरह मनोवृत्तियों में भारी रुपान्‍तरण प्रस्‍तुत कर सकती है।

जब यह कला संगीत के रूप में उभरती है तो कलाकार गायन और वादन से स्‍वयं को ही नहीं श्रोताओं को भी अभिभूत कर देता है। मनुष्‍य आत्‍मविस्‍मृत हो उठता है। दीपक राग से दीपक जल उठता है और मल्‍हार राग से मेघ बरसना यह कला की साधना का ही चरमोत्‍कर्ष है। संगीत की साधना; सुरों की साधना है। मिलन है आत्‍मा से परमात्‍मा का; अभिव्‍यक्ति है अनुभूति की।

भाट और चारण भी जब युद्धस्‍थल में उमंग, जोश से सराबोर कविता-गान करते थे, तो वीर योद्धाओं का उत्‍साह दुगुना हो जाता था और युद्धक्षेत्र कहीं हाथी की चिंघाड़, तो कहीं घोड़ों की हिनहिनाहट तो कहीं शत्रु की चीत्‍कार से भर उठता था; यह गायन कला की परिणति ही तो है।

संगीत केवल मानवमात्र में ही नहीं अपितु पशु-पक्षियों व पेड़-पौधों में भी अमृत रस भर देता है। पशु-पक्षी भी संगीत से प्रभावित होकर झूम उठते हैं तो पेड़-पौधों में भी स्‍पन्‍दन हो उठता है। तरंगें फूट पड़ती हैं। यही नहीं मानव के अनेक रोगों का उपचार भी संगीत की तरंगों से सम्‍भव है। कहा भी है:

संगीत है शक्ति ईश्‍वर की, हर सुर में बसे हैं राम।

रागी तो गाये रागिनी, रोगी को मिले आराम।।

संगीत के बाद ये ललित-कलाओं में स्‍थान दिया गया है तो वह है- नृत्‍यकला। चाहे वह भरतनाट्यम हो या कथक, मणिपुरी हो या कुचिपुड़ी। विभिन्‍न भाव-भंगिमाओं से युक्‍त हमारी संस्कृति व पौराणिक कथाओं को ये नृत्‍य जीवन्‍तता प्रदान करते हैं। शास्‍त्रीय नृत्‍य हो या लोकनृत्‍य इनमें खोकर तन ही नहीं मन भी झूम उठता है।

कलाओं में कला, श्रेष्‍ठ कला, वह है चित्रकला। मनुष्‍य स्‍वभाव से ही अनुकरण की प्रवृत्ति रखता है। जैसा देखता है उसी प्रकार अपने को ढालने का प्रयत्‍न करता है। यही उसकी आत्‍माभिव्‍यंजना है। अपनी रंगों से भरी तूलिका से चित्रकार जन भावनाओं की अभिव्‍यक्ति करता है तो दर्शक हतप्रभ रह जाता है। पाषाण युग से ही जो चित्र पारितोषक होते रहे हैं ये मात्र एक विधा नहीं, अपितू ये मानवता के विकास का एक निश्चित सोपान प्रस्‍तुत करते हैं। चित्रों के माध्‍यम से आखेट करने वाले आदिम मानव ने न केवल अपने संवेगों को बल्कि रहस्‍यमय प्रवृत्ति और जंगल के खूंखार प्रवासियों के विरुद्ध अपने अस्तित्व के लिए किये गये संघर्ष को भी अभिव्‍यक्‍त किया है। धीरे-धीरे चित्रकला शिल्‍पकला सोपान चढ़ी। सिन्‍धुघाटी सभ्‍यता में पाये गये चित्रों में पशु-पक्षी मानव आकृति सुन्‍दर प्रतिमाएँ, ज्यादा नमूने भारत की आदिसभ्‍यता की कलाप्रियता का द्योतक है।

अजन्‍ता, बाध आदि के गुफा चित्रों की कलाकृतियों पूर्व बौद्धकाल के अन्‍तर्गत आती है। भारतीय कला का उज्‍ज्वल इतिहास भित्ति चित्रों से ही प्रारम्‍भ होता है और संसार में इनके समान चित्र कहीं नहीं बने ऐसा विद्वानों का मत है। अजन्‍ता के कला मन्दिर प्रेम, धैर्य, उपासना, भक्ति, सहानुभूति, त्‍याग तथा शान्ति के अपूर्व उदाहरण है।

मधुबनी शैली, पहाड़ी शैली, तंजौर शैली, मुगल शैली, बंगाल शैली अपनी-अपनी विशेषताओं के कारण आज जनशक्ति के मन चिन्हित है। यदि भारतीय संस्‍कृति की मूर्त्ति कला व शिल्प कला के दर्शन करने हो तो दक्षिण के मन्दिर अपना विशिष्‍ट स्‍थान रखते हैं। जहाँ के मीनाक्षी मन्दिर, वृहदीश्‍वर मन्दिर, कोणार्क मन्दिर अपनी अनूठी पहचान के लिए प्रसिद्ध है।

यही नहीं भारतीय संस्‍कृति में लोक कलाओं की खुश्बू की महक आज भी अपनी प्राचीन परम्‍परा से समृद्ध है। जिस प्रकार आदिकाल से अब तक मानव जीवन का इतिहास क्रमबद्ध नहीं मिलता उसी प्रकार कला का भी इतिहास क्रमबद्ध नहीं है, परन्‍तु यह निश्चित है कि सहचरी के रूप में कला सदा से ही साथ रही है। लोक कलाओं का जन्‍म भावनाओं और परम्‍पराओं पर आधारित है क्‍योंकि यह जनसामान्‍य की अनुभूति की अभिव्यक्ति है। यह वर्तमान शास्त्रीय और व्‍यावसायिक कला की पृष्‍ठभूमि भी है। भारतवर्ष में पृथ्‍वी को धरती माता कहा गया है। मातृभूति तो इसका सांस्कृतिक व परिष्कृत रूप है। इसी धरती माता का श्रद्धा से अलंकरण करके लोकमानव में अपनी आत्‍मीयता का परिचय दिया। भारतीय संस्‍कृति में धरती को विभिन्‍न नामों से अलंकृत किया जाता है। गुजरात में “साथिया” राजस्‍थान में “माण्‍डना”, महाराष्‍ट्र में “रंगोली” उत्‍तर प्रदेश में “चौक पूरना”, बिहार में “अहपन”, बंगाल में “अल्‍पना” और गढ़वाल में “आपना” के नाम से प्रसिद्ध है। यह कला धर्मानुप्रागित भावों से प्रेषित होती है; जिसमें श्रद्धा से रचना की जाती है। विवाह और शुभ अवसरों में लोककला का विशिष्‍ट स्‍थान है। द्वारों पर अलंकृत घड़ों का रखना, उसमें जल व नारियल रखना, वन्‍दनवार बांधना आदि को आज के आधुनिक युग में भी इसे आदरभाव, श्रद्धा और उपासना की दृष्टि से देखा जाता है।

आज भारत की वास्‍तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण “ताजमहल” है, जिसने विश्‍व की अपूर्व कलाकृत्तियों के सात आश्‍चर्य में शीर्षस्‍थ स्‍थान पाया है। लालकिला, अक्षरधाम मन्दिर, कुतुबमीनार, जामा मस्जिद भी भारतीय वास्‍तुकला का अनुपम उदाहरण रही है। मूर्त्तिकला, समन्‍वयवादी वास्‍तुकला तथा भित्तिचित्रों की कला के साथ-साथ पर्वतीय कलाओं ने भी भारतीय कला से समृद्ध किया है।

सत्‍य, अहिंसा, करुणा, समन्‍वय और सर्वधर्म समभाव ये भारतीय संस्‍कृति के ऐसे तत्त्व हैं, जिन्‍होंने अनेक बाधाओं के ‍बीच भी हमारी संस्‍कृति की निरन्‍तरता को अक्षुण्ण बनाए रखा है। इन विशेषताओं ने हमारी संस्कृति में वह शक्ति उत्पन्‍न की है कि वह भारत के बाहर एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया में अपनी जड़े फैला सके।

हमारी संस्‍कृति के इन तत्त्वों को प्राचीन काल से लेकर आज तक की कलाओं में देखा जा सकता है। इन्‍हीं ललित कलाओं ने हमारी संस्‍कृति को सत्‍य, शिव, सौन्‍दर्य जैसे अनेक सकारात्‍मक पक्षों को चित्रित किया है। इन कलाओं के माध्‍यम से ही हमारा लोकजीवन, लोकमानस तथा जीवन का आं‍तरिक और आध्‍यात्मिक पक्ष अभिव्‍यक्‍त होता रहा है, हमें अपनी इस परम्‍परा से कटना नहीं है ‍अपितु अपनी परम्‍परा से ही रस लेकर आधुनिकता को चित्रित करना है।

भारतीय मनीषियों के अनुसार कलाओं की सूची:-

कामसूत्र के अनुसार

"कामसूत्र" के अनुसार 64 कलाएँ निम्नलिखित हैं :

(1) गायन, (2) वादन, (3) नर्तन, (4) नाट्य, (5) आलेख्य (चित्र लिखना), (6) विशेषक (मुखादि पर पत्रलेखन), (7) चौक पूरना, अल्पना, (8) पुष्पशय्या बनाना, (9) अंगरागादि लेपन, (10) पच्चीकारी, (11) शयन रचना, (12) जलतंरग बजाना (उदक वाद्य), (13) जलक्रीड़ा, जलाघात, (14) रूप बनाना (मेकअप), (15) माला गूँथना, (16) मुकुट बनाना, (17) वेश बदलना, (18) कर्णाभूषण बनाना, (19) इत्र या सुगंध द्रव बनाना, (20) आभूषण धारण, (21) जादूगरी, इंद्रजाल, (22) असुंदर को सुंदर बनाना, (23) हाथ की सफाई (हस्तलाघव), (24) रसोई कार्य, पाक कला, (25) आपानक (शर्बत बनाना), (26) सूचीकर्म, सिलाई, (27) कलाबत्, (28) पहेली बुझाना, (29) अंत्याक्षरी, (30) बुझौवल, (31) पुस्तक वाचन, (32) काव्य-समस्या करना, नाटकाख्यायिका-दर्शन, (33) काव्य-समस्या-पूर्ति, (34) बेंत की बुनाई, (35) सूत बनाना, तुर्क कर्म, (36) बढ़ईगिरी, (37) वास्तुकला, (38) रत्नपरीक्षा, (39) धातुकर्म, (40) रत्नों की रंग परीक्षा, (41) आकर ज्ञान, (42) बागवानी, उपवन विनोद, (43) मेढ़ा, पक्षी आदि लड़वाना, (44) पक्षियों को बोली सिखाना, (45) मालिश करना, (46) केश-मार्जन-कौशल, (47) गुप्त-भाषा-ज्ञान, (48) विदेशी कलाओं का ज्ञान, (49) देशी भाषाओं का ज्ञान, (50) भविष्य कथन, (51) कठपुतली नर्तन, (52) कठपुतली के खेल, (53) सुनकर दोहरा देना, (54) आशुकाव्य क्रिया, (55) भाव को उलटा कर कहना, (56) धोखाधड़ी, छलिक योग, छलिक नृत्य, (57) अभिधान, कोशज्ञान, (58) नकाब लगाना (वस्त्रगोपन), (59) द्यूतविद्या, (60) रस्साकशी, आकर्षण क्रीड़ा, (61) बालक्रीड़ा कर्म, (62) शिष्टाचार, (63) मन जीतना (वशीकरण) और (64) व्यायाम।
शुक्रनीति के अनुसार-
"शुक्रनीति" के अनुसार कलाओं की संख्या असंख्य है, फिर भी समाज में अति प्रचलित 64 कलाओं का उसमें उल्लेख हुआ है। "शुक्रनीति" के अनुसार गणना इस प्रकार है :-

नर्तन (नृत्य), (2) वादन, (3) वस्त्रसज्जा, (4) रूप परिवर्तन, (5) शैय्या सजाना, (6) द्यूत क्रीड़ा, (7) सासन रतिज्ञान, (8) मद्य बनाना और उसे सुवासित करना, (9) शल्य क्रिया, (10) पाक कार्य, (11) बागवानी, (12) पाषाणु, धातु आदि से भस्म बनाना, (13) मिठाई बनाना, (14) धात्वौषधि बनाना, (15) मिश्रित धातुओं का पृथक्करण, (16) धातु मिश्रण, (17) नमक बनाना, (18) शस्त्र संचालन, (19) कुश्ती (मल्लयुद्ध), (20) लक्ष्य वेध, (21) वाद्य संकेत द्वारा व्यूह रचना, (22) गजादि द्वारा युद्धकर्म, (23) विविध मुद्राओं द्वारा देव पूजन, (24) सारथ्य, (25) गजादि की गति शिक्षा, (26) बर्तन बनाना, (27) चित्रकला, (28) तालाब, प्रासाद आदि के लिए भूमि तैयार करना, (29) घटादि द्वारा वादन, (30) रंगसाजी, (31) भाप के प्रयोग-जलवाटवग्नि संयोगनिरोधै: क्रिया, (32) नौका, रथादि यानों का ज्ञान, (33) यज्ञ की रस्सी बाटने का ज्ञान, (34) कपड़ा बुनना, (35) रत्न परीक्षण, (36) स्वर्ण परीक्षण, (37) कृत्रिम धातु बनाना, (38) आभूषण गढ़ना, (39) कलई करना, (40) चर्मकार्य, (41) चमड़ा उतारना, (42) दूध के विभिन्न प्रयोग, (43) चोली आदि सीना, (44) तैरना, (45) बर्त्तन माँजना, (46) वस्त्र प्रक्षालन (संभवत: पालिश करना), (47) क्षौरकर्म, (48) तेल बनाना, (49) कृषिकार्य, (50) वृक्षारोहण, (51) सेवा कार्य, (52) टोकरी बनाना, (53) काँच के बर्त्तन बनाना, (54) खेत सींचना, (55) धातु के शस्त्र बनाना, (56) जीन, काठी या हौदा बनाना, (57) शिशुपालन, (58) दंडकार्य, (59) सुलेखन, (60) तांबूलरक्षण, (61) कलामर्मज्ञता, (62) नटकर्म, (63) कलाशिक्षण और (64) साधने की क्रिया।
अन्य

वात्स्यायन के "कामसूत्र" की व्याख्या करते हुए जयमंगल ने दो प्रकार की कलाओं का उल्लेख किया है – (1) कामशास्त्र से सम्बन्धित कलाएँ, (2) तंत्र सम्बन्धी कलाएँ। दोनों की अलग-अलग संख्या 64 है। काम की कलाएँ 24 हैं जिनका सम्बन्ध सम्भोग के आसनों से है, 20 द्यूत सम्बन्धी, 16 कामसुख सम्बन्धी और 4 उच्चतर कलाएँ। कुल 64 प्रधान कलाएँ हैं। इसके अतिरिक्त कतिपय साधारण कलाएँ भी बतायी गयी हैं।

प्रगट है कि इन कलाओं में से बहुत कम का सम्बन्ध ललित कला या फ़ाइन आर्ट्स से है। ललित कला – अर्थात् चित्रकला, मुर्त्तिकला आदि का प्रसंग इनसे भिन्न और सौंदर्यशास्त्र से सम्बन्धित है।









































Concept of Beauty in Art

कला में सौंदर्य की अवधारणा

कला ही जीवन है। कला का ज्ञान, मानव के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है, यह मनुष्य की मानसिक शक्तियों का विकास करके उसे पशुत्व से उपर उठाता है। भर्तृहरि का लिखा हुआ यह प्रसिद्ध श्लोक मानव जीवन में कला के महत्व पर प्रकाश डालता है--
साहित्य संगीत कला विहीन:
साक्षात् पशु: पुच्छ विषाण हीन:।।

अर्थात -जो मनुष्य साहित्य , संगीत अथवा किसी भी अन्य कला से विहीन है , वो साक्षात पुंछ और सींगो से विहीन जानवर की तरह है ।

जीवन में सत्य, शिव और सुंदर से साक्षात्कार कराने में इसका अमूल्य योगदान है। आत्मसंतोष एवं आनंद की अनुभूति भी इसके ज्ञानार्जन से ही होती है और इसके मंगलकारी प्रभाव से व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है। मानव का विवेकशील प्राणी होना यह प्रमाणित करता है कि वह सृष्टि की श्रेष्ठतम कलाकृति है। अपने जन्मकाल से ही मानव, जीवन की दो भिन्न प्रकार की विचारधाराओं पर चिंतन करता आया है। एक विचार का सीधा संबंध जीवन के स्थूल पक्ष से है तो दूसरे का सीधा संबंध जीवन के सूक्ष्म पक्ष से है। यह सच है कि ये दोनों विचार ही मानव जीवन के कर्मक्षेत्र के प्रेरणा स्रोत बने। जहाँ एक ओर आदिकाल से ही मानव जीवन-निर्वाह के लिए स्थूल आवश्यकताओं की ओर प्रयत्नरत रहा वहीं दूसरी ओर प्रकृति में व्याप्त सौंदर्य से अभिभूत होकर उसे और अधिक सुंदर बनाने के लिए प्रयास भी करता रहा। उसके प्रयास को ही उस युग की कला कहा जा सकता है।

प्राचीन काल के ग्रंथों में कला विषयक चर्चाएं और प्राप्त कला-सामग्री से यह साबित होता है कि मानव जीवन में सदा ही कला की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आदिम काल से ही मनुष्य हथियारों के गठन में निरंतर सौंदर्य का विकास करता आया है, उपयोग में आनेवाले मिट्टी के बर्तनों पर चित्रकारी और मिट्टी से पुती दीवारों पर तोता-मैना बनाता आया है। मानसिक तृप्ति और अपूर्व आनंद के लिए मानव अपने मन में अनेक कल्पनाओं का संसार रचता रहता है, जिसे बाद में फिर मूर्त रूप में ढाल लेता है।

सौंदर्य के प्रति आकर्षित होकर अपनी भावना को अभिव्यक्त करना ही कला है। अगर यह कहा जाए कि मानव जीवन की चिरसंगिनी कला है तो अत्युक्ति नहीं होगी, क्योंकि यह मानव जीवन के साथ अटूट रूप में बँधी हुई है। मनुष्य का तरीके से उठना-बैठना, चलना-बोलना, खाना-पहनना, सजना-सँवरना आदि भी तो एक प्रकार की कला ही है। अगर ध्यान देकर देखा जाए तो सुधर या सलीके से किया गया हर काम मानव को आकर्षित करता है। उस में एक प्रकार की सुंदरता होती है। लेकिन जब वही काम फूहड़ तरीके से किया जाता है तो वह मन को आकर्षित नहीं करता।

कला अपने अनेक सुंदर रूपों में मानव जीवन के रोम-रोम में बसी हुई है। कहीं वह प्रकृति की प्रचंड शक्तियों का प्रतीक बनकर मानव जीवन को सहारा देती है और चित्रकला के रूप में उसके द्वारा रची जाती है तो कहीं अपनी रमणीयता और करूणा से उसे भाव-विभोर कर हृदय में कविता की धारा बहा देती है और कहीं हवा के मंद-मंद झोकों की आवाज और झील-झरनों की झर-झर उसके दिल से कोयल की कूक बन झरने लगती है। इस तरह जीवन के साथ कलाकृति और उसके सौंदर्य का गहरा तालमेल है। एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती।

वैसे तो अपने सौंदर्यपूर्ण तत्व के कारण मनुष्य का प्रत्येक क्रियाकल्प कला कहलाता है, किंतु वास्तविक कला का जन्म तब हुआ जब मानव समाज के वर्ग समुदाय ने विभिन्न भावावेगों से प्रभावित होकर अपने अनुभवों को कलात्मक रूप में अभिव्यक्त किया। काव्य, संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला, वास्तुकला आदि इसी के अभिव्यक्त रूप हैं।

ऐतरेय ब्राह्मण में कलाकृति के लिए दो बातों को आवश्यक बताया गया है। वह है कौशल और छंद अर्थात लय। इस तरह किसी भी चीज की कौशल युक्त तरीके से की गई भावपूर्ण छंदमय अभिव्यक्ति ही कला है।

प्राचीन कला में वही नागरिक सुसंस्कृत कहलाता था जिसे कलाओं का भी ज्ञान होता था। एक प्राचीन बौद्ध ग्रंथ में राजकुमार सिद्धार्थ और यशोधरा के विवाह के बारे में एक रोचक कथा है - राजकुमार सिद्धार्थ अनेक सुंदरी कन्याओं में से जब यशोधरा को पसंद करते हैं तो राजा शुद्धोधन यशोधरा के पिता दंडपाणि, जो एक सामान्य नागरिक थे, के पास अपने पुत्र का विवाह प्रस्ताव लेकर जाते हैं। इस प्रस्ताव से यशोधरा के पिता दंडपाणि खुश तो होते हैं, लेकिन वे कहते हैं कि अपनी कुल मर्यादा के अनुसार मैं अपनी कन्या का विवाह अशिल्पज्ञ राजकुमार के साथ करने में असमर्थ हूँ। और तब राजकुमार सिद्धार्थ को नवासी प्रतियोगिता जीतकर सुसंस्कृत और शिल्पज्ञ होने का प्रमाण देना पड़ा था।

इस दृष्टांत से यह पता चलता है कि प्राचीन समाज में कला का कितना ऊँचा स्थान था। यह अपने सौंदर्य का प्रभाव सीधे दर्शकों के हृदय पर डालती है। अपने इसी गुण के कारण प्राचीन काल से ही कला धर्म और विचारों के आदान-प्रदान के लिए एक सशक्त माध्यम बनी हुई है। विभिन्न धर्मों के प्रचार-प्रसार के लिए मिथकों आख्यानों, देवी-देवताओं, बिंबों, प्रतीकों आदि के रूप में चित्रकला, मूर्तिकला और स्थापत्य कला का प्रयोग किया गया है।

भारतीय इतिहास में गुप्त सम्राटों के राज्यकाल को स्वर्ण युग कहा जाता है। वह इसलिए कि उस युग में भारत की राजनीतिक प्रभुता के साथ-साथ साहित्य, चित्रकला, मूर्तिकला और वास्तुकला की समाज में पुन: अनुपम प्रतिष्ठा हुई। क्योंकि गुप्त युग से पहले की जो प्राचीन भारतीय संपदा विदेशियों के आक्रमण से नष्ट हो गई थी, वह गुप्त सम्राटों के संरक्षण में पुन: पनपी।

आज भी हमारे देश की नारियाँ अपने व्रत-संस्कारों और जीवन के मंगलकारी अवसरों पर नर-नारी और पशु-पक्षी के चित्र अपनी भावना और क्षमता के अनुसार बनाती है। इसी सिलसिले में कला-संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान का अत्यंत ही उर्वरभूमि मिथिला की कला को लिया जा सकता है। यहाँ कला के विविध पक्षों को धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन के क्रियाकल्पों से प्रत्यक्ष रूप में जोड़कर उसे जीवंतता दी गई है। इसलिए मैथिल नारी ललितकला की सभी विधाओं में जन्मजात सिद्धहस्त होती है। मैथिली इतिहासकार डॉ. उपेंद्र ठाकुर ने मिथिला चित्रकला में नारी वर्ग की सिद्धहस्तता को देखकर ही तो कहा है - "मिथिला की महिलाएँ जन्मजात पिकासो होती है।" यहाँ तक की समीक्षकों ने इसे जीवित चित्रकला की संज्ञा भी दी है।

अंतर्राष्ट्रीय जगत में नेपाल की पहचान कायम करने में यहाँ की मिथिला कलाकृतियों का प्रमुख हाथ है। आजकल इसने व्यवसाय का रूप ले लिया है। व्यावसायिक चित्र बनाने की होड़ में लोग इसकी सूक्ष्मता और प्रतीकात्मकता के मर्म को नहीं पहचान पाते हैं। जबकि सत्य तो यह है कि सामान्य रूप में मिथिलावासी की जीवनशैली को प्रतिबिंबित करने वाली इस कला में प्रचुर मात्रा में पतीक पाये जाते हैं। इस चित्रकला का प्रयोग पूजा करते वक्त जमीन पर बनाई जाने वाली अल्पना, कोहबर अर्थात केलिगृह में नव वर-वधू की भावना को जागृत कराने के उद्देश्य से प्रतीकात्मक रूप में बनाए जाने वाले चित्र, दिवारों पर अंकित देवी-देवताओं का चित्र आदि रूप में होता है।

वि. सं. २०४६ साल में क्लयर बुर्केट नामक एक अमेरिकी महिला इस कला से अत्यधिक प्रभावित हुई और उन्होंने इसे व्यावसायिक रूप देने की कोशिश की। इसके अलावा यूएनडीपी और दक्ष मैथिल महिलाओं ने भी जनकपुरधाम में जनकपुर नारी विकास केन्द्र की स्थापना कर इसके व्यावसायिक रूप को आगे बढ़ाया। आज मिथिला पेंटिग में सिद्धहस्त लोग शोहरत के साथ-साथ यथेष्ट मात्रा में धनार्जन भी कर रहे हैं। अत: कला की सौंदर्यानुभूति हमें सिर्फ मानसिक तृप्ति देकर आनंदित ही नहीं करती बल्कि आर्थिक संबल भी देती है। भौतिकतावादी मार्क्स ने भी जीवन के इस सौंदर्य से भरे कलात्मक पहलू की अवहेलना नहीं की वरन् इसे जीवन का अविभाज्य हिस्सा माना है।

कोई भी कलाकृति चाहे वह चित्र हो या काव्य, अभिनय, संगीत, नृत्य आदि; वह अपने सौंदर्य से हमारे अंतर्मन पर ऐसा प्रभाव डालता है कि उससे शारीरिक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न होती हैं जिससे वह हमें पहली ही नज़र में आत्मविभोर कर परमसुख और संतोष प्रदान करता है। महान दार्शनिक अरस्तु ने भी कला के इस गुण को स्वीकार कर नाटकों के संदर्भ में कहा है कि नाटक का मुख्य कार्य तो हमारी भावनाओं का शुद्धिकरण है अर्थात् आत्मा की शुद्धि। सौंदर्य का सामान्य अर्थ बाह्य सौंदर्य या रूप सौंदर्य हो सकता है, पर इसका वास्तविक अर्थ आत्मिक सौंदर्य ही है। ग्रीक लोगों का भी विश्वास है कि सौंदर्य ही नैतिक भलाई है और यह मानव के आध्यात्मिक कल्याणकारी आचरण में निहित है। इसी तरह महान कवि कालिदास भी सौंदर्य का अर्थ जीवन में सदाचार का अभ्युदय करना मानते हैं।

इस तरह हम कह सकते हैं कि बिना सौंदर्य की कलाकृति भी कल्पना करना निरर्थक है। क्योंकि जिस वस्तु में सौंदर्य नहीं है वह कालकृति कहलाने लायक नहीं हैं। सौंदर्य और कलाकृति एक दूसरे के पूरक हैं। अत: सौंदर्य है वहीं कला है और जहाँ कला है वहीं सौंदर्य हैं।

भारतीय साहित्य एवं साहित्य-शास्त्र में सौन्दर्य का विशेष महत्त्व रहा है। वैदिक एवं साहित्य-ग्रन्थों में सौन्दर्य शब्द की चर्चा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप में होती रही है। ग्रन्थों में सौन्दर्य को रमणीयता, कमनीयता, शोभा, कान्ति, चमत्कार एवं रस आदि। नामों से सम्बोधित किया जाता रहा है। सौन्दर्य शब्द का शाब्दिक अर्थ है सुन्दर होने का भाव। मानव ने कला और सौन्दर्य शब्दों का प्रयोग व्यापक रूप में किया है। कला और सौन्दर्य में मानवता के गुण विश्लेषण का लक्षण पाया जाता है। मानवता का पहला गुण विवेक द्वारा सौन्दर्य को समझना है। सौन्दर्य एक भावना एवं एक मानसिक अवधारणा है, क्योंकि व्यक्ति को बुद्धि वस्तुओं के रूप को विश्लेषण के द्वारा सुन्दर या कुरूप मानती है। जब हम किसी वस्तु को देखते हैं तो हमारी बुद्धि द्वारा उस वस्तु के रूप विश्लेषण से हमारे मन पर जो प्रभाव पड़ते हैं, उनमें एक प्रभाव सुन्दरता का भी है जिसके आधार पर हम उस वस्तु को सुन्दर कहते हैं और इसी सुन्दरता के अनुभव के आधार पर हम वस्तु में निहित एक सामान्य सौन्दर्य-गुण को कल्पना करते हैं। इसलिये एक वस्तु किसी के लिये सुन्दर है तो कोई दूसरा उसे कुरूप भी कह सकता है, क्योंकि व्यक्तियों की रागात्मक (प्रेम एवं ईष्या) मानसिकता एवं विवेकपूर्ण विभिन्नताएं होती हैं जिनके आधार पर व्यक्ति उस वस्तु का विश्लेषण करता है, अर्थात् मानव अपने विवेक से सौन्दर्य को समझता है।

रस्किन के अनुसार, “धर्म, अर्थ और मोक्ष इस त्रिवर्ग का समन्वित रूप ही सौन्दर्य है। “अंग्रेजी में सौन्दर्य के वाचक के रूप में ब्यूटी (Beauty) शब्द का प्रयोग किया जाता है। Beauty शब्द Beau और ty का युग्म है जिसमें Beau का अर्थ प्रिय, रसिकता अथवा श्रृंगारी पुरुष है तथा ty भाव वाचक प्रत्यय है। इस प्रकार ब्यूटी का शाब्दिक अर्थ है सौन्दर्य, मनोहरता, रमणीयता या रसिक भाव। सौन्दर्य (ब्यूटी) का कार्य इन्द्रियों को आनन्द प्रदान करना है।

ग्रीक काल में वाह्य सुन्दरता को अधिक महत्त्व दिया गया और सुन्दर के लिए Beauty शब्द का प्रयोग किया गया। सौन्दर्य का सम्बन्ध सुन्दरता की उस जागरूकता या कला कार्य की उस गुणवत्ता या मानव निर्मित या प्राकृतिक स्वरूपों से है जो देखने वाले में उन्नत जानकारी की एक अनुभूति को उत्पन्न करते हैं।

सौन्दर्य की परिधि में प्रकृति से लेकर मानव निर्मित पदार्थ तक सभी शामिल होते हैं जिनके आधार पर इसको दो भागों में वर्गीकृत किया जाता है- (1) प्राकृतिक सौन्दर्य तथा (2) मानव-निर्मित (कृत्रिम) सौन्दर्य।

(1) प्राकृतिक सौन्दर्य (Natural Beauty)

प्रकृति ईश्वरीय कृति है जिसकी गोद में पल कर मनुष्य बड़ा होता है। प्रकृति ही मनुष्य में सौन्दर्य-भावना का विकास करती है। प्राकृतिक सौन्दर्य के भी दो भेद किये गये हैं- (i) सुन्दर ( Beautyful) और (ii) उदात्त (Lofty)

सामान्य आकार की वस्तुओं को देखकर उनके प्रति आकर्षण, माधुर्य, सम्मोहन और सुख की अनुभूति होती हो तो उन्हें सुन्दर कहा जाता है। यह अनुभूति दृश्यगत और बौद्धिक दोनों रूपों में हो सकती है। यह अनुभूति दृश्य एवं श्रव्य इन्द्रियों से होती है। व्यक्ति जिस वस्तु को देखता है यदि वह वस्तु उसकी ऐंद्रिक संवेदनाओं को सुन्दर लगती है तब वस्तु के प्रति उसके मन में आकर्षण उत्पन्न होता है, व्यक्ति उसकी समीपता प्राप्त करना चाहता है या उसे पास रखना चाहता है जिससे उसे सुख की अनुभूति होती है। यहीं से कला का प्रारम्भ होता है। कला में रूप-सौन्दर्य भावात्मक विवेक की देन है।

प्रकृति में विद्यमान विशाल आकार वाली वस्तुएँ, जैसे- पहाड़, समुद्र, आकाश आदि की विस्तृतता देखकर मनुष्य को अपनी लघुता का आभास होता है और इन्हें देखकर वह लस्तपस्त हो जाता है लेकिन मनुष्य उन वस्तुओं के साथ तारतम्य का भाव जागृत करके एक विशालता और उच्चता का अनुभव करने लगता है तो यह उदात्तता (Lofty) की अनुभूति है। भारतीय परम्परा में प्रकृति सौन्दर्य की देवी है। कलाकार और कवि इसी से प्रेरणा प्राप्त करता है। कला, संगीत, साहित्य का मौलिक सौन्दर्य प्रकृतिगत सौन्दर्य की अभिव्यक्ति ही है।

(ii) कृत्रिम सौन्दर्य (Artificial Beauty)

प्राकृतिक सौन्दर्य की प्रेरणा से ही कृत्रिम सौन्दर्य का विकास होता है। प्रकृति में प्राप्त वस्तुओं का प्रयोग करते हुए मनुष्य विभिन्न प्रकार की सुन्दर वस्तुओं का निर्माण करता है। इनमें से कुछ वस्तुएँ हमारी इन्द्रियों को कुछ समय के लिए ही सुख देती हैं तो उन्हें शिल्प कहा जाता है। दूसरी ओर प्रकृति से प्राप्त सामग्री का श्रेष्ठ संयोजन ऐसे रूपों में किया जाता है जो कलात्मक दृष्टि से अभिव्यंजनीय होते हैं तो वह कला कहलाती है।

कला में अनुभूति (Perception), अभिव्यक्ति (Expression) और रूप (Form) तीनों तत्त्व विस्तृत रूप में विद्यमान रहते हैं। कला में अभिव्यक्ति को सृजन (Creation) कहा जाता है। प्रकृति की रचनाओं व रंगों से अनुभूति प्राप्त होती है। अमूर्त अनुभूति को मूर्त रूप प्रदान करना कला की अभिव्यक्ति है। अभिव्यक्ति से रूप बनता है। रूप, बाह्य व आन्तरिक दो प्रकार का होता है। कला में बाह्य रूप की प्रधानता होती है। बाह्य रूप का लावण्य आकर्षक होता है तो सौन्दर्य को जन्म देता है उसी को कलात्मक सौंदर्य कहा जाता हैं।









कला और सौन्दर्य के संदर्भ में भारतीय विचारकों ने विभिन्न ग्रन्थों में उसके सृजन पक्ष का वर्णन करते हुए कला के सौन्दर्य पक्ष पर अप्रत्यक्ष रूप से अपने विचार प्रकट किये हैं। वात्स्यायन के कामसूत्र में सौन्दर्य सृजन के लिए छः अंग आवश्यक माने गये हैं-

रूप भेदः प्रमाणानि भाव लावण्य योजनम् ।

सादृश्यं वर्णिकाभंग इति चित्र षडंगकम् ॥

रूप- आकृति, प्रमाण- मान एवं अनुपात के अनुसार बनावट, भाव- आकृति की भाव भंगिमा, लावण्य- रूप निर्मिति में सौन्दर्य का समावेश, सादृश्य- मूल वस्तु से समानता, वर्णिका भंग- विभिन्न वर्णो का व्यवस्थित संयोजन।

भारतीय कला में सौन्दर्य को कला का प्राण माना गया है और सौन्दर्य को परमानन्द कहा गया है। कला और सौंदर्य का हमेशा सहचरी (companion) सम्बन्ध रहा है, दोनों का अस्तित्व एक साथ ही है। जिस कलाकृति में सौंदर्य नहीं उसको कला के अन्तर्गत नहीं रखा जा सकता है। कालाकार के सौन्दर्यमयी सृजन को ही कला माना गया है। इस प्रकार कला में रूप, भोग (Pleasure) और अभिव्यक्ति सौंदर्य के कारक हैं तथा ओज, माधुर्य और प्रसाद (सरल सुबोध) ये तीनों अभिव्यक्ति के गुण हैं। माधुर्य का सम्बन्ध सुखानुभूति से है और मानसिक दीप्ति (Brilliancy), ओज के द्वारा उत्पन्न होती है, इस प्रकार सौंदर्य का सृजन सम्भव माना गया है लेकिन विस्तृत संदर्भ में कलात्मक सौन्दर्य को सफल भावनात्मक अभिव्यक्ति के नाम से ही जाना जाता है। कला का चेतन माध्यम स्वयं कलाकार ही होता है इसलिए कलात्मक कार्य विषय-वस्तु, आन्तरिक चेतना और कलाकार के व्यक्तित्व का एक मिश्रित गुण होता है जिसमें रूप, भोग और अभिव्यक्ति की अनुभूति ही सौंदर्य आनन्द हैं।













































Theory of Rasa

रस का सिद्धांत

रस सिद्धान्त – भारतीय संस्कृति में सौन्दर्य का लक्ष्य बिन्दु सुन्दरता ना होकर ‘ रस ‘ है । यह काव्य का मूल आधार ‘ प्राणत्व ‘ अथवा ‘ आत्मा ‘ है । रस आनन्द का स्रोत है , जिसकी संगीत में उत्पत्ति शब्द , लय , स्वर एवं ताल से होती है । सभी कलाओं में व्याप्त होने के कारण इसे रसानुभूति आनन्दानुभूति प्राप्त कराने वाला ( लक्ष्य ) माना गया है ।
रस क्या है ?

रस – संगीत में सुन्दरता की वृद्धि के लिए ‘ रस ‘ एक आवश्यक तत्त्व है । रस काव्य का मूल आधार ‘ प्राणत्व ‘ अथवा ‘ आत्मा ‘ है । रस का सम्बन्ध सृ ‘ धातु से माना गया है , जिसका अर्थ है जो बहता है ‘ अर्थात् ‘ जो भाव रूप में हदय में बहता है ‘ उसे रस कहते हैं । एक अन्य मान्यता के अनुसार रस शब्द ‘ रस ‘ , घातु और ‘ अच् ‘ प्रत्यय के योग से बना है , जिसका अर्थ है जो बहे ‘ अथवा ‘ जो आस्वादित किया जा सकता है । साधारणतया हम ‘ रस ‘ का अनुभव कर ही भावाभिव्यक्ति करते हैं । किसी भी भावनात्मक प्रस्तुति के लिए रसोनिष्पत्ति आवश्यक होती है या किसी भी सन्दर्भ में भाव के साथ रस ‘ एक प्रभावी तथ्य होता है । साहित्यशास्त्र में रस ‘ का विस्तृत वर्णन है ।

भरतमुनि द्वारा प्रतिपादित ‘ नाट्यशास्त्र में रस के स्वरूप , उसकी निष्पत्ति एवं अनुभूति के विषय में रंग – मंच एवं अभिनय के माध्यम से सविस्तार वर्णन किया गया है ।
भरतमुनि के अनुसार रस सिद्धान्त

आचार्य भरतमुनि को रस सम्प्रदाय का मूल प्रवर्तक माना जाता है । भरतमुनि का नाट्यशास्त्र मुख्यतः काव्य और नाट्य से सम्बद्ध है । नाट्यशाला में अभिनेता भावों की निष्पत्ति कर प्रेक्षक के हृदय में ‘ रस ‘ संचार करके सौन्दर्य और आनन्द को अनुभूति कराता है । दृश्य – श्रव्य नाटक को सर्वोच्च कला माना गया है , जहाँ नेत्र और कर्ण दोनों का एक साथ वर्णन मिलता है ।

भरत द्वारा रचित नाट्यशास्त्र में सर्वप्रथम रस सिद्धान्त पर व्यवस्थित चर्चा का वर्णन मिलता है । भरतमुनि ने आठ ‘ रस ‘ एवं ‘ आठ स्थायी ‘ भाव माने हैं ।

” शृंगार हास्य करुण रौद्रवीर भयानकाः । वीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्ये रसाः स्मृता ।।

अर्थात् नाटक में रस आठ हैं , जो अग्रलिखित है – शृंगार , हास्य , करुण , रौद्र , वीर , भयानक , वीभत्स एवं अद्भुत । उपरोक्त आठ रसों में से यद्यपि भरत ने चार को ही प्रमुख माना है । ये चार है – शृंगार , करुण , वीर और वीभत्स रस , जिनसे रति , शोक , उत्साह व जुगुप्सा ( घृणा ) भाव की अनुभूति होती है ।


अन्य विद्वानों के अनुसार रस सिद्धान्त

अन्य विद्वानों के अनुसार रस सिद्धान्त प्राचीन समय से रस शब्द का संस्कृत भाषा में अनेक अर्थों में प्रयोग होता आया है । भारतीय वाङ्मय में ‘ रस ‘ का चार अर्थों में प्रयोग किया गया है , जो निम्नलिखित है

1. सामान्य अर्थ में आस्वाद से सम्बन्धित : पदार्थ का रस – पदार्थ के रस के अर्थ में प्रयुक्त होने से आशय यह है कि किसी भी पदार्थ , वनस्पति आदि को निचोड़ कर उससे निकाला हुआ तत्त्व जैसे – सन्तरे का ‘ रस ‘ और इसका आस्वादन भी रस ही है ।

2. आयुर्वेद तथा उपनिषदों में प्रस्तुत अर्थ – यदि हम वेदों के सन्दर्भ में देखें तो ‘ सामवेद ‘ तथा ‘ अथर्ववेद ‘ में ‘ रस ‘ का प्रयोग गौ – दुग्ध , मधु , सोम आदि के लिए हुआ है तथा उपनिषदों में इसे परम आनन्द के लिए प्रयोग किया गया है ।

3. साहित्य , नाट्य आदि का रस महाकाव्यों के सन्दर्भ में रस को ‘ ब्रह्मानन्द सहोदर ‘ कहकर व्याख्यायित किया गया है ।

4. भक्ति तथा मोक्ष का रस इस रस का भक्ति तथा मोक्ष के सन्दर्भ में भी प्रयोग होता है । ‘ कामसूत्र ‘ नामक ग्रन्थ में रस को रीति प्रेम आदि के लिए प्रयोग किया गया है ।

उपरोक्त वर्णन से यह ज्ञात होता है कि भारतीय साहित्य में रस के सम्बन्ध ( रस सिद्धान्त ) में गहनता से विचार किया गया है । भारतीय मनीषियों में ‘ रस ‘ सौन्दर्य एवं आनन्द का पर्याय माना है । रस को ‘ अखण्ड स्वप्रकाशानन्द ‘ , ‘ चिन्मय ‘ , ‘ ब्रह्मानन्द – सहोदर ‘ की संज्ञा दी गई है । भरत के समय तक ‘ रस ‘ का अर्थ बहुत विकसित हो चुका था । इसकी पुष्टि इस बात से मिलती है कि भरत ने अपने ग्रन्थ में कुछ पूर्ववर्ती आचार्यों के नामों का उल्लेख किया है , किन्तु पूर्ववर्ती आचार्यों द्वारा लिखे गए ग्रन्थ आज उपलब्ध नहीं हैं । अतएव नाट्यशास्त्र ही सर्वप्रथम उपलब्ध ग्रन्थ है , जिसमें रस की विवेचना की गई हैI

नाट्यशास्त्र के अनुसार - ” रसो वै सः । रसो वेसः रसहेन्वायं लब्ध्वाऽनंदी भवति । ”

अर्थात् वह रस रूप है , इसलिए रस पाकर , जहाँ का ‘ रस ‘ मिलता है , उसे प्राप्त कर मनुष्य आनन्दमग्न हो जाता है ।

भारतीय संस्कृति में सौन्दर्य का लक्ष्य बिन्दु सुन्दरता न होकर ‘ रस ‘ है । ‘ रस ‘ आनन्द का सीधा स्रोत है तथा सभी कलाओं में व्याप्त होने के कारण इसे ही लक्ष्य माना जाता है । ‘ रस ‘ के महत्त्व को दर्शाते हुए भरतमुनि कहते हैं ,

” न हि रसावेत कश्रिदप्यर्थः प्रवर्तते ”

अर्थात् ‘ रस ‘ के बिना कोई बात प्रारम्भ नहीं होती । ‘ रस ‘ के विषय में भरतमुनि स्वयं प्रश्न करते हैं – ‘ रस ‘ इति का पदार्थ अर्थात् रस क्या पदार्थ है ? इसके उत्तर में भरतमुनि कहते हैं – ‘ आस्वद्यात्वात् ‘ अर्थात आस्वाद्य पदार्थ है , अर्थात् यदि संगीत द्वारा प्राप्त अनुभूति की बात करें , तो इसका सम्बन्ध भाव तथा आनन्द से है और आनन्द , ‘ रस ‘ का मूर्त रूप है ।

रस के प्रकार

रस नौ हैं -


क्रमांक

रस का प्रकार

स्थायी भाव


1.

वीभत्स रस

घृणा, जुगुप्सा


2.

हास्य रस

हास


3.

करुण रस

शोक


4.

रौद्र रस

क्रोध


5.

वीर रस

उत्साह


6.

भयानक रस

भय


7.

शृंगार रस

रति


8.

अद्भुत रस

आश्चर्य


9.

शांत रस

निर्वेद


10.

भक्ति रस

अनुराग,देव रति


भक्ति रस को दसवाँ एवं वात्सल्य को ग्यारहवाँ रस भी माना गया है। वत्सल या संतान विषयक रति तथा भक्ति या भगवद्-विषयक रति इनके स्थायी भाव हैं।













Six Limbs of Indian Painting

भारतीय चित्रकला के छह अंग
षडंग

चित्रकार अपने निरंतर अभ्यास के द्वारा अपने भावों सम्वेदनाओं तथा अनुभवों के प्रकाशन हेतु एक प्रविधि को जन्म देता है। किसी भी आकृति की रचना करते समय भारतीय चित्रकार आकृति के बाहरी रूप को ही नहीं देखता वरन् उसके गुणों तथा उसके पीछे छिपे भावों को भी देखता है।

भारतीय चित्रकार ने रंगों की तकनीक में निरंतर विकास किया है। तूलिका निर्माण के नये-नये तरीके सुझाये हैं। चित्र भूमि की तैयारी में भी नये-नये प्रयोग किये हैं। चित्रोपम तत्वों के भिन्न-भिन्न संयोजनों में एक से एक उत्कृष्ट शैलियां निखर कर सामने आई हैं।

भारतीय शिल्प के झरोखे से हमें अपने भारतीय शिल्प के विविध मनमोहक रूप दिखाई देते हैं। भारत में चित्रकला की स्वस्थ परम्परा बहुत प्राचीन काल से विद्यमान थी। चित्रकला में प्रयुक्त प्रविधि व शैलीगत तत्वों के अनेक सन्दर्भों का भारतीय शिल्पशास्त्रों एवं साहित्य में उल्लेख मिलता है।

समरांगण सूत्रधार, विष्णुधर्मोत्तर पुराण, शिल्परत्नम् आदि शिल्प ग्रन्थों में तथा संस्कृत साहित्य में कला तत्वों के अनेक उल्लेख मिलते हैं। समरांगण सूत्रधार में आठ अंगों का उल्लेख किया गया है यथा-वर्तयाः, लेख्यं, वर्णक्रम, लेखनं, कृतबन्ध, रेखाक्रम, वर्तनाक्रम, आकृतिमान।

वात्स्यायन के कामसूत्र की 11वीं सदी में यशोधर पण्डित ने ‘जयमंगला’ नाम से टीका की। कामसूत्र के प्रथम अधिकरण के तृतीय अध्याय में वर्णित चौंसठ कलाओं में से आलेख कला के सन्दर्भ में यशोधर पण्डित ने आलेख्य के छः अंग बताये हैं

“रूपभेदाः प्रमाणनि भावलावण्ययोजनम् ।

सादृश्यं वर्णिकाभंग इति चित्र षडङ्गकम् ।।

अर्थात् रूपभेद, प्रमाण, भाव, लावण्ययोजना, सादृश्य व वर्णिका भंग – ये चित्र के छः अंग हैं।

उपरोक्त श्लोक के आधार पर भारतीय कलाचार्य श्री अवनीन्द्र नाथ टैगोर ने 1921 ई० में दी इण्डियन सोसायटी ऑफ ओरियन्टल आर्ट’ की प्रकाशन योजना के अन्तर्गत ‘सिक्स लिम्ब्स ऑफ पेन्टिंग’ नामक एक पुस्तिका का प्रकाशन कराया जिसमें छः अंगों की व्याख्या करने से पहले उनका अंग्रेजी अर्थ निरूपित किया। जो इस प्रकार है-

1.रूपभेद: भिन्न-भिन्न चित्रों में भिन्न-भिन्न रुप-Knowledge of appearance

2. प्रमाण: अंग-प्रत्यंग की सही नाप तथा सही अनुपात-Correct perception, measure, and structure of forms

3. भाव: करुणा, शांति, हास्य, प्रसन्नता आदि भावों का यथास्थान अंकन-The action of feelings on forms

4. लावण्य योजना: सौन्दर्य या सुन्दरता- Infusion of grace, artistic representation

5. सादृश्य: जिस व्यक्ति अथवा वस्तु का चित्र हो उसी की भाँति चित्र का दिखाई देना-Similitudes

6. वर्णिकाभंग: यथास्थान समुचित रंग भरना- Artistic manner of using the brush and colours

इन छः अंगों का विवेचन इस प्रकार किया गया है
1. रूपभेद

रूपभेद का अर्थ है, रूप में सत्य की अभिव्यक्ति अर्थात् रूप की पहचान अंकित करना। रूप अनन्त हैं। रूप का भेद छोटा-बड़ा, गहरा-हल्का, अलंकृत-साधारण, सुर-असुर, सज्जन- दुर्जन, रेशम – टाल, वृक्ष-लता, आकाश-भूमि आदि वस्तु के रंग, पोत, स्पर्शज्ञान, आकार, अर्थसार पर निर्भर करता है।

रूपों के परस्पर संयोजन में भिन्नता से भी रूप के भेद व बल का ज्ञान होता है। प्रत्येक मानवाकृति में वय, समाज एवं देश के अनुसार जो भिन्नता होती है, उनके रहन-सहन, पहनावा या हाव-भाव में जो अन्तर होता है; दुःख-सुख, उल्लास, प्रफुल्लता, दया, ममता, करूणा आदि मानवीय भावों की सृष्टि से उनके अंग-प्रत्यंग में जिन भाव भंगिमाओं का अभ्युदय होता है, इन सबका ज्ञान ही रूपभेद है।

भारतीय मूलमंत्र रूपभेद में बाह्य विभिन्नता के साथ आन्तरिक विभिन्नता को भी महत्व दिया है। रूप अनंत और असीम है।

रूप का साक्षात्कार दो प्रकार से किया जा सकता है एक तो चक्षु द्वारा तथा दूसरा आत्मा द्वारा चक्षु द्वारा देखा गया रूप बाहरी होता है जो बाह्य रूप, रंगों, आकृति की बनावट आदि से संबंधित होता है, किन्तु उस वस्तु के अन्तर में जो व्यापक सौन्दर्य का समावेश कलाकार करता है उसे हम मात्र चक्षुओं द्वारा नहीं अपितु अपने अन्तर्मन से अनुमान करके, चिन्तन-मनन करके आत्मा द्वारा पहचान सकते हैं।

रूप का निर्माण तथा चित्र में विभिन्न रूपों का आनन्ददायक संयोजन तभी सम्भव है, जब चित्रकार रूप-अर्थ एवं रूप-भेद में पारंगत हो। रूप की रचना में यह आवश्यक नहीं कि कोई दिखाई देने वाला सादृश्य रूप ही हो, रूप सूक्ष्म भी हो सकता है, चित्रकार रूप का उद्घाटन भी करता है।
2.प्रमाण

प्रमाण के अन्तर्गत समविभक्तता अनुपात, सीमा, लंबाई-चौड़ाई, शरीर-रचना आदि का विवरण आ जाता है। अनुपात के उचित ज्ञान को ‘प्रमा’ नाम से सम्बोधित किया गया है। पुरुष व स्त्री की लम्बाई में भेद, उनके अंगों की रचना किस क्रम में हो अथवा राक्षस या मनुष्य के आकार में दिखाना, यह सब प्रमाण द्वारा ही सम्भव है।

प्रमाण को सम्बद्धता का सिद्धान्त भी कहा जाता है। यह आकृतियों का माप या फैलाव तथा सभी आकृतियों का एक-दूसरे से सम्बन्ध निश्चित करता है। यद्यपि मधुर प्रमाण का कोई निश्चित सिद्धान्त नहीं बनाया जा सकता तो भी अपने अनुभव व प्रमा-शक्ति के बल पर ऐसी सीमायें स्वतः बन जाती हैं, जिनका अतिक्रमण करने पर अरुचिकर प्रमाण की उत्पत्ति होती है।

प्रमाण के द्वारा हम मनुष्य, पशु-पक्षी आदि की भिन्नता और उनके विभिन्न भेदों को ग्रहण कर सकते हैं। पुरुष और स्त्री की लम्बाई के मध्य अन्तर तथा उसके समस्त अवयवों का समावेश किस क्रम व अनुपात में होना चाहिए अथवा चित्रों में देवताओं और मानव के कद का क्या मान है, ये सभी बातें प्रमाण के द्वारा निर्धारित होती हैं।

विष्णुधर्मोत्तर पुराण के चित्रसूत्र प्रकरण में विभिन्न मानवाकृतियों के नख से शिख तक का मान, ताल एवं अंगुल में सुनिश्चित किया गया है। इसके अतिरिक्त उन सभी मान, उपमान तथा क्षय-वृद्धि पर प्रकाश डाला गया है जिससे आकृति अपनी पूर्णता प्राप्त कर सके।

भारतीय कला मनीषियो ने प्रमाण को ताल, कार्य-प्रमाण अथवा मानोत्पत्ति के नाम से भी सम्बोधित किया है।
3.भाव

भाव का तात्पर्य है आकृति की भव भंगिमा स्वभाव मनोभाव एवं व्यंग्यात्मक प्रक्रिया इत्यादि । भाव एक मानसिक प्रक्रिया है। भिन्न-भिन्न भावों की अभिव्यंजना से शरीर में भिन्न-भिन्न विकारों का जन्म होता है ये बदली हुई अवस्थाएँ ही भाव कहलाती है।

भारतीय चित्रकला में भावाभिव्यक्ति को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। आँखों की चितवन, भंगिमा हस्तमुद्राओं तथा वर्ण-व्यवहार एवं संयोजन-शैली से भव की एक सहज अभिव्यंजना सम्भव हो जाती है। अंडाकार चेहरा सात्विकता का भव प्रदान करता है, जबकि पान की पत्ती वाला चंचलता का द्योतक है।

इसी प्रकार मीनाकृति आँखे चंचलता को, खंजन नयन प्रसन्नता को, मृग के समान नयन सरलता व निरपराधिता के आदि भावों को अभिव्यक्त करते हैं। समभंग जहाँ सौम्यता का परिचायक है वहीं अन्य भंगिमाएँ यथा – अभंग, त्रिभंग तथा अतिभंग आदि प्रखरता व क्रियाशीलता का प्रतीक बन जाती हैं।

वस्तुतः रेखा, वर्ण, तान, वर्तना और अलंकार सबका पर्यावसान सुन्दर भावों की अभिव्यक्ति में ही है। अजंता के चित्र राहुल समर्पण, मरती राजकुमारी, बोधिसत्व पद्मपाणि इकसे उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
4.लावण्य योजना

जिस प्रकार भाव चित्र के आन्तरिक सौन्दर्य का व्यंजक है उसी प्रकार लावण्य चित्र के बाह्य सौन्दर्य का व्यंजक है। रूप, प्रमाण व भाव के साथ-साथ चित्र में लावण्य का होना भी अत्यावश्यक है।

भारतीय चित्रों के लिए सौन्दर्य से अधिक उपयुक्त संज्ञा लावण्य है, क्योंकि यह आन्तरिक भाव सौष्ठव का अभिव्यंजित रूप है। भाव द्वारा कभी-कभी चित्र में जो रूखापन आ जाता है उसे दूर करना ही लावण्य-योजना है।

जिस प्रकार नमक के न रहने पर भोजन बेस्वाद हो जाता है उसी प्रकार लावण्य के न रहने पर चित्र में कोई आकर्षण नहीं रह जाता। अजन्ता के चित्रों में भाव के साथ लावण्य की शोभा सर्वत्र व्याप्त है। किसी मूल वस्तु के साथ उसकी प्रतिकृति की समानता करना ही सादृश्य कहलाता है।

अवनीन्द्र नाथ टैगोर ने किसी रूप के भाव को किसी दूसरे रूप के द्वारा प्रकट करना ही सादृश्यता उत्पन्न करना माना है। भारतीय चित्र-शास्त्रों में सादृश्य का महत्वपूर्ण स्थान है। चित्रसूत्र में सादृश्य को चित्र की प्रधान वस्तु माना गया है-“चित्रे सादृश्यकरणं प्रधानं परिकीर्तिमम्।

” जिस चित्र की आकृति में दर्पण के प्रतिबिम्ब के समान सादृश्य होता है उसे बिद्ध चित्र कहते हैं-“बिद्धचित्रं तु सादृश्यं दर्पणे प्रतिबिम्बवत् ।”
5.सादृश्य

वस्तु की बाह्य आकृति की अपेक्षा उसके स्वभाव का अंकन अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसे भावगम्य सादृश्य कहा जाता है। भावगम्य सादृश्य हेतु प्राकृतिक उपमानों का सहारा लिया जाता है।

भारतीय कला में शरीर-रचना हेतु प्रधानतः जिन उपमानों को व्यवहार में लाया जाता है उनमें से कुछ हैं-


पुरुष की भौंह

नीम की पत्ती के समान


स्त्री की भौंह

धनुष के समान


अधर

अधर-पल्लव के समान


कान

गिद्धाकृति के समान


स्थिर मुख

अण्डाकृति के समान


चंचल मुख

पानाकृति के समान


भोले नेत्र

मृगनयन के समान


प्रसन्न नेत्र

खंजन पक्षी के समान


विलासी नेत्र

परवल की फाँक के समान


ठोड़ी

आम की गुठली के समान


कण्ठ

शंख के मुख के समान


स्त्री की कमर

डमरू के समान


पुरुष की कमर

सिंह की कमर जैसी


पुरुष के कंधे

गज मस्तक के समान


इस प्रकार स्पष्ट है कि भारतीय कला हूबहू यथार्थ प्रतिकृति के समान न होकर गुणों तथा भावों पर ही आधारित है।
6.वर्णिका भंग

वर्णिका भंग से तात्पर्य है नाना वर्णो की सम्मिलित भंगिमा वर्णिका भंग के अन्तर्गत रंगों का सम्मिश्रण, उनके प्रयोग करने की विधि तथा तूलिका( brush) के प्रयोग की विधि बतायी गयी है।

किस प्रकार के चित्र हेतु किस प्रकार के वर्णों का प्रयोग करना चाहिए, किस रंग के समीप किस रंग का संयोजन होना चाहिए आदि बातें वर्णिका भंग के अन्तर्गत आती हैं। रंगों की विभिन्नता से हमें वस्तुओं के अस्तित्व के साथ-साथ उनका अन्तर भी ज्ञात होता है।

लाल, पीला, नीला इन तीनों रंगों में श्ववेत रंगों के योग से तथा परस्पर इन सबके मिश्रण से अनेक रंग बनते हैं। यह मिश्रण कैसे होता है और कितनी मात्रा में किया जाय इसका पूर्ण ज्ञान वर्णिका-भंग में कुशलता का प्रतीक है।

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