मौर्य कला ~ Mauryan Art

मौर्य कला ~ Mauryan Art

मौर्य कला का विकास भारत में मौर्य साम्राज्य के युग में (चौथी से दूसरी शदी ईसा पूर्व) हुआ। सारनाथ और कुशीनगर जैसे धार्मिक स्थानों में स्तूप और विहार के रूप में स्वयं सम्राट अशोक ने इनकी संरचना की। मौर्य काल का प्रभावशाली और पावन रूप पत्थरों के इन स्तम्भों में सारनाथ, इलाहाबाद, मेरठ, कौशाम्बी, संकिसा और वाराणसी जैसे क्षेत्रों में आज भी पाया जाता है।

मौर्यकला के नवीन एवं महान रूप का दर्शन अशोक के स्तम्भों में मिलता है। पाषाण के ये स्तम्भ उस काल की उत्कृष्ट कला के प्रतीक हैं। मौर्ययुगीन समस्त कला कृतियों में अशोक द्वारा निर्मित और स्थापित पाषाण स्तम्भ सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण एवं अभूतपूर्व हैं। स्तम्भों को कई फुट नीचे जमीन की ओर गाड़ा जाता था। इस भाग पर मोर की आकृतियाँ बनी हुई हैं। पृथ्वी के ऊपर वाले भाग पर अद्भुत चिकनाई तथा चमक है। मौर्यकाल के स्तम्भों में से फाह्यान ने ६ तथा युवानच्वांग ने १५ स्तम्भों का उल्लेख किया है। गुहा निर्माण कला भी इस काल में चरम पर थी। अशोक के पौत्र दशरथ ने गया से १९ मील बाराबर की पहाड़ियों पर श्रमणों के निवास के लिए कुछ गुहाएँ बनवाईं। इनकी भीतरी दीवार पर चमकीली पालिश है। लोमश ऋषि की गुफा मौर्यकाल में सम्राट अशोक के पौत्र सम्पत्ति द्वारा निर्मित हुई। यह गुफा अधूरी है। इसके मेहराब पर गजपंक्ति की पच्चीकारी अब भी मौजूद है। ऐसी पच्चीकारी प्राचीन काल में काष्ठ पर की जाती थी। सारनाथ का मूर्ति शिल्प और स्थापत्य मौर्य कला का एक अतिश्रेष्‍ठ नमूना है। विनसेन्ट स्मिथ नामक प्रसिद्ध इतिहासकार के अनुसार, किसी भी देश के पौराणिक संग्रहालय में, सारनाथ के समान उच्च श्रेष्‍ठ और प्रशंसनीय कला के दर्शन दुर्लभ हैं क्‍योंकि इनका काल और शिल्प कड़ी छनबीन के बाद प्रमाणित किया गया है। मौर्य काल के दौरान मथुरा कला का एक दूसरा महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। शुंग-शातवाहन काल के काल में इस राजवंश की प्रेरणा से कला का अत्यंत विकास हुआ। बड़ी संख्या में इमारतें बनी, अन्य पौराणिक कलाएँ विकसित हुईं जो सारनाथ की पिछली पीढियों के विकास को दरशाती हैं। इस युग की मजबूत जड़ अर्ध वृत्तीय मन्दिर वाली उसी पीढ़ी की नींव पर टिकी है। कला क्षेत्र में विख्यात भारत-सांची विद्यालय मथुरा का एक अनमोल केन्द्र कहा जाता है। जिसकी अनेक छवियां इन विद्यालयों में आज भी देखने को मिलती हैं।


स्तम्भ:
अशोक द्वारा बनवाए गए स्तम्भ मौर्यकालीन कला के सर्वोत्तम नमूने हैं, जो कि उसने 'धम्म' के प्रचार के लिए बनवाए थे। उत्तर प्रदेश में सारनाथ, प्रयाग, कौशाम्बी तथा नेपाल की तराई में लुम्बिनी और निग्लिवा में अशोक के बनवाए स्तम्भ मिले हैं। इन स्थानों के अतिरिक्त साँची, लौरिया, नन्दनगढ़ आदि स्थानों पर भी अशोक के स्तम्भ हैं। ये स्तम्भ एकाश्मक (Monolith) हैं तथा चुनार के बलुआ पत्थर से निर्मित हैं। प्रत्येक स्तम्भ की ऊँचाई 40-50 फीट है। चुनार की चट्टानों से पत्थरों को काटकर निकालना, उन्हें स्तम्भों का स्वरूप देना तथा विशाल स्तम्भों को देश के विभिन्न भागों में पहुँचाना, निस्सन्देह शिल्पकला तकनीक का एक अनुपम उदाहरण है।अशोक के समय में कला श्रेष्ठता के उच्चतम शिखर पर पहुँच गई थी। अशोककालीन इन स्तम्भों पर अत्यधिक चमकीली पॉलिश है। ये स्तम्भ इतने चमकौले हैं कि अनेक विद्वानों ने इन स्तम्भों को धातु का बना हुआ समझा। 

अशोक स्तम्भ


इन स्तंभों के दो मुख्य भाग उल्लेखनीय हैं-(1) स्तंभ यष्टि या गावदुम लाट (tapering shaft) और शीर्ष भाग। शीर्ष भाग के मुख्य अंश हैं घंटा।भारतीय विद्वान् इसे अवांगमुखी कमल कहते हैं। इसके ऊपर गोल अंड या चौकी है। कुछ चौकियों पर चार पशु और चार छोटे चक्र अंकित हैं (जैसे सारनाथ स्तंभ शीर्ष की चौकी पर) तथा कुछ पर हंसपक्ति अंकित है। चौकी पर सिंह, अश्व, हाथी तथा बैल आसीन हैं। रामपुर में नटुवा बैल ललित मुद्रा में खड़ा है। सारनाथ के शीर्ष स्तंभ पर चार सिंह पीठ सटाए बैठे हैं। ये चार सिंह एक चक्र धारण किए हुए हैं। यह चक्र बुद्ध द्वारा धर्म-चक्र-प्रवर्तन का प्रतीक है। अशोक के एकाश्मक स्तंभों का सर्वोत्कृष्ट नमूना सारनाथ के सिहंस्तंभ का शीर्षक है।

अशोक स्तम्भ, सारनाथ

 स्तूप व चैत्य :
स्तूप गोल आकृति के आधार पर स्थित पाषाण अथवा ईंटों का ठोस गुम्बद के आकार का होता था। बुद्ध या अन्य महान् बौद्ध सन्तों के अवशिष्ट स्मारकों पर समाधि बनाना अथवा किसी पवित्र स्थान को चिरस्मरणीय बनाना स्तूप निर्माण का प्रमुख उद्देश्य होता था। अतएव स्तूप को एक धार्मिक पवित्रता प्राप्त हो गई थी। अशोक ने अफगानिस्तान और भारत में लगभग 84,000 स्तूपों का निर्माण करवाया था। आज उनमें से बहुत से नष्ट हो चुके हैं। इनमें से कुछ, जो बाद में विस्तृत किए गए थे और जिनके चतुर्दिक बाड़ (Railing) लगाई गई थी, आज भी विद्यमान हैं। इनमें से सर्वाधिक प्रसिद्ध मध्य प्रदेश में विदिशा से कुछ दूर भोपाल के निकट साँचो का विशाल स्तूप है। इस वर्तमान स्तूप का व्यास 36-50 मीटर, ऊँचाई 23-25 मीटर और विशाल पाषण की चतुर्दिक बाड़ 3.30 मीटर ऊँची है। सर जॉन मार्शल के अनुसार अशोक द्वारा ईंटों का बनवाया हुआ मूल स्तूप का स्वरूप वर्तमान स्तूप का सम्भवतः आधे से अधिक नहीं था। मूल स्तूप को बाद में विस्तृत किया गया और शुंग काल में तोरण द्वार जोड़े गए। प्राचीन छोटी बाड़ के स्थान पर वर्तमान में पाषाण की बाड़ बनवाई गई। अशोक के मूल स्तूपों की भी यही दशा हुई। बोधगया में अशोक ने एक चैत्य (बौद्ध मन्दिर) का निर्माण करवाया था। उसके नष्ट हो जाने पर बाद में वहाँ बौद्ध मन्दिर निर्मित किया गया, जो आज भी विद्यमान है।

साँचो स्तूप, मध्य प्रदेश

मूर्तिकला एवं लोक कला:
विभिन्न स्थानों पर हुए उत्खननों से मौर्यकालीन अनेक मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, जिनसे पता चलता है कि मौर्य काल में मूर्तियाँ बनाने की कला अत्यन्त विकसित थी।
मौर्यकालीन मूर्तिकला में पशुओं की विभिन्न मूर्तियों का उल्लेख करना आवश्यक है। इन मूर्तियों के कलाकारों ने अद्भुत कृतियाँ प्रस्तुत की। सारनाथ के स्तम्भ के सिंहों की सजीवता तथा धौली का हाथी मूर्तिकला के उत्कृष्ट नमूने हैं। पशुओं की मूर्तियों के अतिरिक्त दीदारगंज (पटना) से प्राप्त यक्षिणी की मूर्ति मूर्तिकला का उत्कृष्ट नमूना है। इस चामर ग्राहिणी यक्षिणी की मूर्ति 6 फीट 9 इंच लम्बी है। इस यक्षिणी का मुख अत्यन्त सुन्दर है, अंग-प्रत्यंग सुगठित व मुद्रा दर्शनीय है। इस मूर्ति के अतिरिक्त भी अनेक यक्ष-यक्षिणियों की मूर्तियाँ विदिशा, कलिंग और पश्चिमी सूपरिक आदि स्थानों से प्राप्त हुई हैं। पाटलिपुत्र के भग्नावशेषों में जैन तीर्थंकरों की अनेक मूर्तियाँ मिली है, जो कि खण्डित अवस्था में हैं तथा इनके केवल धड़ ही प्राप्त होते हैं, जिन पर हार, मेखला आदि आभूषण बने हुए हैं। 
परखम ग्राम से प्राप्त यक्ष मूर्ति, पटना से प्राप्त यक्षमूर्ति-जिस पर ओपदार चमक है और एक लेख भी है-पटना शहर में दीदारगंज से प्राप्त चामरग्राहिणी यक्षी-जिस पर भी मौर्य शैली की चमक है-और बेसनगर से प्राप्त यक्षी विशेष उल्लेखनीय है। ये मूर्तियाँ महाकाय हैं और माँसपेशियों की बलिष्ठता और दृढ़ता उनमें जीवंत रूप से व्यक्त हुई है। वे पृथक् रूप से खड़ी है पर उनके दर्शन का प्रभाव सम्मुखीन है, मानों शिल्पी ने उन्हें सम्मुख दर्शन के लिए ही बनाया हो। उनका वेश है सिर पर पगड़ी, कंधों और भुजाओं पर उत्तरीय, नीचे धोती जो कटि में मेखला से कायबंधन से बँधी है। कानों में भारी कुँडल, गले में कंठा, छाती पर तिकोना हार और बाहुओं पर अंगद है। मूर्तियों को थोड़ा घटोदर दिखाया गया है, जैसे परखम की मूर्ति में देखने को मिलता है।
 
दीदारगंज की यक्षी, पटना


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